हैदराबाद : बिहार के मुजफ्फरपुर में एक्यूट एंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (दिमागी बुखार) से अब तक 109 बच्चों की मौत हो चुकी है। अब इस बीमारी को लीची से जोड़ा जा रहा है। इसके साथ ही फलों की रानी के तौर पर पहचाने जाने वाला रसीला फल 'लीची' विवादों के केंद्र में आ गया है। चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ-साथ बिहार सरकार के मंत्रियों तक ने कहा की बच्चों की मौत के पीछे उनका लीची खाना भी एक कारण हो सकता है।

लीची इस रोग की वजह क्यों?

चमकी बुखार वास्तव में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस ) है। इसे दिमागी बुखार भी कहा जाता है। यह इतनी खतरनाक और रहस्यमयी बीमारी है कि अभी तक विशेषज्ञ भी इसकी सही वजह का पता नहीं लगा पाए हैं। चमकी बुखार में वास्तव में बच्चों के खून में सुगर और सोडियम की कमी हो जाती है। इसे क्षेत्रीय बोली में 'चमकी बुखार' कहा जाता है।

मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार के कहर के बीच न्यूरोलॉजिकल बीमारी के संदर्भ में हुए एक शोध में खुलासा हुआ है कि इस रोग का प्रमुख कारण लीची का सेवन करना है। द लेनसेट ग्लोबल हेल्थ मेडिकल जनरल में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, इंस्लोपैथी यानी दिमागी बुखार के फैलने में लीची ज़िम्मेदार होती है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक, इस बीमारी की चपेट में आए इलाकों में जिन बच्चों ने रात का खाना स्किप किया है और लीची ज्यादा खा ली हो, उनके हाइपोग्लैसीमिया के शिकार होने का खतरा ज्यादा हो जाता है। लेकिन क्या लीची वाकई इतना खतरनाक फल है? नहीं, बिहार में जो बच्चे इसका सेवन करने से बीमारी के शिकार हुए, उनमें कुपोषण के लक्षण देखे गए।

विशेषज्ञों के अनुसार जिन बच्चों ने लीची खाने के बाद पानी कम पिया या काफी देर तक पानी पिया ही नहीं, उनके शरीर में सोडियम की मात्रा कम हो गई, जिसके चलते वो दिमागी बुखार के शिकार हो गए।

लीची में विषैला तत्व

छह साल पहले राज्य सरकार ने दो सदस्यीय एक टीम को लीची में कुदरती तौर पर मौजूद एक किस्म के ज़हर के बारे में शोध के लिए बुलाया था। इस विषैले तत्व का नाम methylenecyclopropylglycine यानी मिथाइलीनसाइक्लोप्रॉपिलग्लाइसीन (MCPG) है, जिसे आसान भाषा में हाइपोग्लाइसीन ए (hypoglycin A) के नाम से जाना जाता है।

2017 में एक भारतीय अमेरिकी टीम ने इसकी पुष्टि भी की। दो सदस्यीय टीम ने यह भी देखा कि लीची खाने से वो बच्चे अगली सुबह बीमारी के शिकार हुए, जो कुपोषण से ग्रस्त थे और लीची खाने के बाद खाली पेट ही सो गए थे।

लीची कैसे हुई खतरनाक

साल 2014 में भारतीय अमेरिकी टीम ने ही इस बीमारी के शिकार 74 फीसदी बच्चों को एक आसान तरीके से बचाने में भी मदद की थी। AES बीमारी के लक्षण दिखने के चार घंटों के भीतर ही पीड़ित बच्चों की नसों के जरिए 10 फीसदी डेक्स्ट्रोज़ का डोज़ दिया गया, जिससे रोकथाम संभव हो सकी। इसके बाद बचाव के मकसद ये सिफारिश जारी की गई कि इस बात का प्रचार किया जाए कि बच्चे भूखे पेट न सोए।

इस सिफारिश के बाद अभियान के तौर पर प्रभावित इलाके में रोकथाम संबंधी ये प्रचार किया गया। इसका असर ये हुआ कि साल 2015 में इस बीमारी के पीड़ितों में काफी कमी देखी गई थी। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल हालात ये रहे कि राज्य और प्रशासन बचाव के लिए ये जागरूकता फैला पाने में नाकाम रहा। यहां तक कि कुछ डॉक्टरों ने इस बीमारी के फैलने के बारे में गलत थ्योरी पेश की। कहा गया कि हीट वेव' से ये बीमारी फैलती है। जिसके कारण लोगों में जागरुकता नहीं फैली।

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लीची के फायदे

- लीची में विटामिन सी एंटिऑक्सीडेंट होते हैं, जो तनाव कम करने और आर्थराइटिस जैसे रोगों से बचाने में सहायक होते हैं।

-लीची में विटामिन बी कॉम्प्लेक्स होता है।

- लीची अस्थमा से बचाने में असरदार है।

- लीची में मैंगनीज़, मैग्नीशियम, तांबा, आयरन जैसे खनिज भरपूर मात्रा में होते हैं जो ब्लड प्रेशर को संतुलित रखते हैं।

- लीची में फाइबर और विटामिन बी कॉम्प्लेक्स होता है।

- जल्दी बुढ़ापे की निशानियों से बचाने में लीची मददगार है।

- लीची में पौटेशियम होता है जो शरीर में सोडियम और द्रव के लेवल दुरुस्त रखने में मददगार है। इससे हाई ब्लड प्रेशर और दिल के दौरे के खतरा कम होता है।

लीची सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है, लेकिन इसे खाली पेट न खाएं। इसे खाने के बाद ज़्यादा देर भूखे प्यासे न रहें और भूखे पेट न सोएं।