हैदराबाद / पटना: साल 1983 का चर्चित बिहार के 'बॉबी सेक्स स्कैंडल' ने कांग्रेस की राजनीति की चूलें हिला दी थी। इस मामले में हालांकि अंतिम अनुसंधान सीबीआई का रहा। जिसको लेकर आज भी लोग सीबीआई पर उंगली उठाते हैं। वहीं उस दौर में पटना के एसएसपी रहे किशोर कुणाल की सख्त जांच ने नेताओं को सकते में डाल दिया था।

कुणाल को जब बॉबी के मर्डर का पता चला तो इसे संदिग्ध मानते हुए उन्होंने रातों-रात कब्र से लाश निकलवा ली थी। इसके बाद शव का दोबारा पोस्टमॉर्टम कराया गया तो विसरा में मेलेथियन जहर पाया गया। जाहिर था बॉबी की हत्या की गई थी। जबकि प्रभावशाली लोगों के असर से इस हत्या को छिपाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी गई थी।

हैदराबाद पहुंचे किशोर कुणाल ने साक्षी संवाददाता से बातचीत में बॉबी हत्याकांड को लेकर बातचीत की। कुणाल के मुताबिक आज भी ये केस कौतूहल का विषय है। लिहाजा उन्होंने 'कहानी कुणाल की' नाम से एक किताब लिखने का फैसला किया है। जिसमें वे पूरे घटनाक्रम का विस्तृत ब्यौरा देंगे।

चर्चित महिला बॉबी जिनकी हत्या कर दी गई थी
चर्चित महिला बॉबी जिनकी हत्या कर दी गई थी

पूर्व आईपीएस किशोर कुणाल को हालांकि इस बात का मलाल है कि कड़ी मेहनत और मुकम्मल जांच के बाद भी वो इस मामले में दोषियों को सजा नहीं दिलवा सके थे। दरअसल किशोर कुणाल की ईमानदारी और तेज तर्रार छवि से डरे सहमे नेताओं ने तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र पर दबाव डाला कि ये केस कुणाल (पटना पुलिस) के हाथों से लेकर सीबीआई को सौंप दिया जाय।

किशोर कुणाल ने कहा कि करीब चालीस विधायक और दो मंत्री सीएम के पास पहुंचे और धमकी दी कि अगर केस सीबीआई को नहीं दिया गया तो सरकार गिरा दी जाएगी। तब मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने कुणाल को तलब कर केस की बाबत जानकारी चाही थी। कुणाल ने उन्हें हिदायत दी कि ये ऐसा शोला है जिसमें अगर मुख्यमंत्री हस्तक्षेप करेंगे तो वो भी लपेटे में आ सकते हैं। इसके बाद सीएम ने किशोर कुणाल पर किसी तरह का दबाव नहीं दिया। उन्हें पता था कि ईमानदार छवि वाले कुणाल पर किसी बात का असर नहीं होगा।

तब बिहार सरकार ने फैसला लेते हुए केस सीबीआई को रेफर कर दिया। कहा तो ये भी जाता है कि मामला तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के संज्ञान में भी गया। खुद प्राईम मिनिस्टर नहीं चाहती थीं कि इस सेक्स स्कैंडल में दर्जनों कांग्रेसी नेताओं की पोल खुले। अगर बात आगे बढ़ती तो बिहार में कांग्रेस की सरकार गिरनी तय मानी जा रही थी।

कौन थी बॉबी?

बिहार विधानसभा सचिवालय में बॉबी टाइपिस्ट थीं। दिखने में बेहद खूबसूरत बॉबी का असली नाम श्वेत निशा त्रिवेदी था। साथ ही बिहार विधान परिषद की तत्कालीन सभापति और कांग्रेसी नेता राजेश्वरी सरोज दास की गोद ली हुई बेटी भी थीं। लिहाजा बॉबी की सचिवालय में तूती बोलती थी। इनकी कहानी दरअसल राजनीति में महिलाओं के शोषण और इस्तेमाल से जुड़ी है।

7 मई 1983 को बॉबी की मौत के बाद डॉक्टरों से जाली सर्टिफिकेट लेकर आनन फानन में उन्हें दफना दिया गया। विधान परिषद की तत्कालीन सभापति सरोज दास पर भी इस मौत में लीपापोती का आरोप लगा। इस मौत में एक डॉक्टर ने लिखा था कि आंतरिक रक्त स्राव से बॉबी की मौत हुई, जबकि दूसरे ने मौत की वजह हार्ट अटैक लिखा।

बात जब पटना पुलिस तक पहुंची तो तत्कालीन एसएसपी किशोर कुणाल ने तनिक भी देरी नहीं की। अपनी जांच में कुणाल ने साबित तो कर दिया कि ये आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या का मामला है। अब किशोर अपनी जांच का दायरा बढ़ाते हुए आरोपियों की गिरेबां तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। जिसमें बिहार के कई कद्दावर कांग्रेसी नेताओं के घेरे में आने की पूरी संभावना थी। कुणाल ने हिम्मत दिखाई और किसी तरह के समझौते से इनकार कर दिया।

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कुणाल की तेजतर्रार कार्रवाई से खौफ खाकर सरकार ने 25 मई 1983 को इस केस की जांच का भार सीबीआई को सौंप दिया। कहते हैं सीबीआई पर भी इस केस को रफा दफा करने का दबाव था। बकौल कुणाल सीबीआई के कुछ अच्छे अफसरों ने पटना पुलिस की जांच की सराहना की थी। ईमानदार सीबीआई अधिकारियों को भी एक एककर किनारे लगा दिया गया। बाद में कथित तौर पर सीबीआई के कुछ भ्रष्ट अफसरों ने मुख्यालय में ही बेसिर पैर की कहानी गढ़कर फाइनल रिपोर्ट तैयार कर ली। जिसमें सीबीआई ने इसे आत्महत्या का मामला करार दिया था।

हैरानी ये कि केस के अनुसंधान के दौरान सीबीआई ने पटना पुलिस से संपर्क करने तक की जहमत नहीं उठाई। किसी फिल्म की स्क्रिप्ट की ही तरह केस की रिपोर्ट तैयार कर कोर्ट में दाखिल की गई थी। सरकारी वकील ने भी सीबीआई रिपोर्ट का विरोध नहीं किया और कोर्ट ने क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया।

कांग्रेस पार्टी के कुछ वयोवृद्ध नेता आज भी मानते हैं कि अगर तब बिहार सरकार ने साहस दिखाया होता। तो कई नामचीन नेता सलाखों के पीछे होते। साथ ही हाल के दिनों का मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड करने की किसी में हिम्मत नहीं होती।