वसंत पंचमी 2020: इस मंदिर में अनूठे तरीके से होता है देवी सरस्वती का अभिषेक, ये है मान्यता

डिजाइन फोटो  - Sakshi Samachar

वसंत पंचमी का पर्व इस बार दो दिन बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। जहां कुछ लोगों ने इसे 29 जनवरी बुधवार को मनाया वहीं कई लोग 30 जनवरी को भी मना रहे हैं। माना जाता है कि इस दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का जन्म हुआ था इसीलिए इस दिन उनकी विशेष पूजा-अर्चना करके ज्ञान व बुद्धि का आशीर्वाद मांगा जाता है।

देवी सरस्वती की पूजा मंदिरों के अलावा भक्तजन अपने घरों व शिक्षण संस्थानों में भी करते हैं। वहीं सरस्वती पूजा को शुभ मुहूर्त में ही किया जाता है।

इस मंदिर में खास तरीके से होता है सरस्वती का अभिषेक

मध्यप्रदेश के उज्जैन में ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माता सरस्वती का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर वाग्देवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। वाग्देवी मंदिर में देवी नील सरस्वती के रूप में विराजमान है। यहां वसंत पंचमी पर विद्धार्थी स्याही से उनका अभिषेक करते हैं और विशेष पूजन होता है।

सिंहपुरी के समीप बिजासन पीठ के सामने स्थित इस मंदिर में परीक्षा के दिनों में बड़ी संख्या में विद्यार्थी नील सरस्वती के दर्शन करने आते हैं।

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मान्यता है अभिषेक-पूजन करने से शीघ्र सफलता मिलती है। इसी मान्यता के चलते मंदिर में स्थानीय के साथ बड़ी संख्या में दूर-दूर से भक्त बच्चों को माता के दरबार लेकर पहुंचते हैं।

वसंत पंचमी पर वाग्देवी को वासंती फूलों के साथ नीलकमल व अस्तर के फूल अर्पित करने का भी विधान है।

शास्त्रों में कहीं-कहीं माता सरस्वती को नीलवर्णी कहा गया है। भगवान विष्णु से आदेशित होकर नील सरस्वती भगवान ब्रह्मा के साथ सृष्टि के ज्ञान कल्प को बढ़ाने का दायित्व संभाले हुए हैं। इसका उल्लेख श्रीमद् देवी भागवत में मिलता है।

नील सरस्वती के पूजन में नीलकमल और अस्तर के नीले फूलों का उपयोग होता है। इन फूलों के अर्क से देवी का अभिषेक किया जाता है। समय के साथ परिवर्तन आया और अब फूलों के अर्क का स्थान नीली स्याही ने ले ले ली है।

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नील सरस्वती की मूर्ति अत्यंत दर्शनीय है। विक्रम विश्वविद्यालय की पुरातत्व अध्ययन शाला के अधीक्षक डॉ. आरके अहिरवार के अनुसार परमारकालीन मूर्ति करीब 1000 साल पुरानी है।

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