वसंत पंचमी का त्योहार मां सरस्वती को समर्पित है और इस दिन उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। माना जाता है कि वसंत पंचमी को ही देवी सरस्वती का जन्म हुआ था। वहीं सरस्वती को विद्या और बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी भी माना जाता है इसीलिए इनकी पूजा मंदिर में ही नहीं बल्कि घर व शिक्षण संस्थानों में भी विशेष रूप से की जाती है।

इस बार वसंत पंचमी का पर्व 29 जनवरी, बुधवार को मनाया जाएगा और इसी दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाएगी। इस दिन जहां देवी सरस्वती की पूजा की जाती है वहीं बच्चों से भी पूजा करवाई जाती है ताकि उन्हें विद्या का वरदान मिल सके साथ ही कुछ उपाय भी करवाए जाते हैं जिससे देवी सरस्वती उन पर प्रसन्न हो सके।

वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती के मंदिर में भी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है वहीं इस खास मौके पर हम आपको देवी सरस्वती के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताते हैं जो बेहद प्राचीन है और जिसकी कथाएं महाभारत काल से जुड़ी है।

सोशल मीडिया के सौजन्य से 
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भारत में वैसे तो सरस्वती माता के कई मंदिर है लेकिन तेलंगाना के निर्मल जिले के बासर गांव में स्थित मंदिर को सरस्वती माता का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर को ऋषि वेद व्यास द्वारा बनाया गया था। गोदावरी के तट पर बने इस मंदिर जैसा ही एक अन्य मंदिर जम्मू कश्मीर के लेह में है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां शारदा का निवास दंडकारण्य और लेह में माना जाता है।

यह मंदिर ज्ञान सरस्वती मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल है जो दक्षिण की गंगा कही जाने वाली गोदावरी के तट पर स्थित है। सफेद पत्थरों से निर्मित इस मंदिर के बारे में तरह-तरह की किंवदंतियां प्रचलित हैं।

इस मंदिर में मां सरस्वती माता की 4 फुट ऊंची भव्य प्रतिमा स्थापित है। यह मूर्ति यहां पद्मासन मुद्रा में हैं। लक्ष्मी जी की भी प्रतिमा यहां विराजमान हैं। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसके एक स्तंभ से संगीत के सातों स्वर सुनाई देते हैं। कोई भी व्यक्ति इस ध्वनि को ध्यानपूर्वक कान लगाकर सुन सकता है।

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प्राचीन कथाओं के अनुसार, मां सरस्वती के मंदिर से थोड़ी दूरी पर दत्त मंदिर स्थित है, जहां से होते हुए गोदावरी नदी तक एक सुरंग जाती थी, जो अब बंद है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां शारदा का निवास दंडकारण्य (वर्तमान के बासर गांव) में माना जाता है। कहते हैं महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास जब महाभारत के बाद मानसिक उलझनों से घिरे थे, तब शांति के लिए तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े।

अपने मुनि वृंदों सहित उत्तर भारत की तीर्थयात्रा कर वह दंडकारण्य पहुंचे और गोदावरी नदी के तट पर स्थित इस स्थान पर कुछ समय के लिए रुक गए। यहां उन्हें अपार मानसिक शांति मिली। उसके बाद उन्होंने मां सरस्वती का विग्रह स्थापित कर यहां मंदिर बनवाया।

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दूसरी कथा के अनुसार, वाल्मीकि ऋषि ने रामायण लिखने से पहले यहीं मां सरस्वती की आराधना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया था। उसके बाद रामायण लेखन शुरू किया। इस मंदिर के निकट ही वाल्मीकि जी की संगमरमर की समाधि बनी है।

इतिहासकारों का मानना है कि चालुक्य राजाओं ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। प्रति वर्ष इस मंदिर में वसंत पंचमी और नवरात्रि जैसे त्योहार धूमधाम से मनाए जाते हैं।

हिंदुओं का एक प्रसिद्ध रिवाज अक्षर ज्ञान भी इस मंदिर में मनाया जाता है। यह एक महत्वपूर्ण हिंदू रिवाज है, जो एक बच्चे के जीवन में औपचारिक शिक्षा के प्रारंभ को दर्शाता है। मंदिर के निकट ही महाकाली का एक विशाल मंदिर है और लगभग एक सौ मीटर दूर एक गुफा है।

इस गुफा में एक विचित्र अनगढ़ (खुरदुरी) चट्टान है, माना जाता है कि यहां सीता जी के आभूषण रखे थे। पास में ही वेद व्यास गुफा भी है। यह मंदिर मां सरस्वती के पांच शक्तिपीठों में से एक है। यहां प्रत्येक बारह वर्ष पर पुष्कर (पुण्य स्नान) उत्सव का आयोजन किया जाता है।

कहते हैं कि मां सरस्वती के मंदिर से थोडी दूर स्थित दत्त मंदिर से होते हुए मंदिर तक गोदावरी नदी में कभी एक सुरंग हुआ करती थी, जिसके द्वारा उस समय के महाराज पूजा के लिए आया-जाया करते थे।

मंदिर में गर्भगृह, गोपुरम, परिक्रमा मार्ग आदि बहुत ही सुंदर हैं। बासर गांव में 8 ताल हैं जिन्हें वाल्मीकि तीर्थ, विष्णु तीर्थ, गणेश तीर्थ, पुथा तीर्थ कहा जाता है।

वसंत पंचमी पर विशेष रूप से होती है अक्षराभ्यास पूजा

वसंत पंचमी पर यहां भक्तों की काफी भीड़ होती है। वहीं जो लोग अपने बच्चे को अगले साल स्कूल में दाखिल करवाएंगे वे लोग विशेष रूप से इस दिन यहां आकर अक्षराभ्यास पूजा करवाते हैं जिससे कि मां सरस्वती का उसे आशीर्वाद मिल सके।

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यह पूजा मंदिर में बड़े पैमाने पर आयोजित की जाती है। बच्चों के हाथों से यहां पहली बार ऊं लिखवाया जाता है फिर उसके हाथों से दूसरे बच्चों में पुस्तकें, स्लेट, पेंसिल व कलम जैसी चीजें दान भी करवाई जाती है जिससे कि मां सरस्वती प्रसन्न हो और उसे विद्या का वरदान दे दे।

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इस पूजा के बाद बच्चे को प्रसाद में हल्दी का लेप खाने को दिया जाता है। माना जाता है कि इससे मां सरस्वती का आशीर्वाद बच्चे को प्राप्त होता है और उसकी जिह्वा पर मां सरस्वती स्वयं विराजमान हो जाती है।