भारत की सांस्कृतिक विरासत अद्भुत है। यहां कई ऐसे मंदिर व पुराने स्मारक हैं जो अपने इतिहास व स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। कई प्राचीन इमारतें तो ऐसी है जिसे जो देखता है बस देखता रह जाता है।

दक्षिण भारत में कई ऐसे मंदिर व प्राचीन इमारतें हैं जिनकी मूर्तिकला व नक्काशी देखते ही बनती है। तमिलनाडु का महाबलीपुरम भी अपने प्राचीन इतिहास व भव्य मंदिरों के लिए जाना जाता है। तमिलनाडु का यह शहर (महाबलीपुरम) समुद्र किनारे बसा है और इसकी सांस्कृतिक विरासत हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती है।

महाबलीपुरम के इन मंदिरों पर उकेरी गई मूर्तियां जैसे खुद अपनी शानदार विरासत को बयां करती है तभी तो जो कोई इन्हें देखता है, बस देखता रह जाता है। भारत के इतिहास के साक्षी रहे महाबलीपुरम के ये मंदिर जहां एकतरफ शानदार स्थापत्य कला के नमूने हैं तो दूसरी ओर यहां का प्राकृतिक सौंदर्य भी हर आने वाले को लुभाता है।

शायद इसीलिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां मुलाकात की, उन्हें अपने देश के इतिहास से परिचय कराया।

तो आइये यहां हम भी जानते हैं महाबलीपुरम और यहां के मंदिरों से जुड़ी खास बातें ...

ऐसे पड़ा यहां का नाम महाबलीपुरम ...

माना जाता है कि इस शहर का नाम महाबलीपुरम दानवीर असुर राजा महाबली के नाम पर रखा गया था। महाबली ने भगवान विष्णु के वामन अवतार में आकर मांगने पर तीन पग भूमि दान में दे दी थी।

वामन भगवान ने दो पग में त्रिलोक्य नाप लिया था और फिर पूछा कि राजन तीसरा पग कहां रखूं तो महाबली ने कहा था कि भगवन अब बस मेरा सिर ही बचा है आप उसी पर अपना पग रख लें।

महाबली की दानवीरता और सत्यता से प्रभावित होकर वामन भगवान ने उन्हें पाताल लोक का चिरंजीवी राजा बनाकर खुद वहां के पहरेदार बन गए। कहते हैं कि आज भी महाबली जिंदा हैं। आज भी केरल में उनकी पूजा होती है।

महाबलीपुरम 
महाबलीपुरम 

कहते हैं कि बाद में पल्लव राजा नरसिंह वर्मन, जिन्हें मामल्ला के नाम से जाना जाता था उन्होंने महाबलीपुरम का नाम मामल्लापुरम रख दिया था।

राजा नरसिंह वर्मन के द्वारा महाबलीपुरम का नाम मामल्लापुरम रखने पर भी आज लोग इस स्थान को महाबलीपुरम के नाम से ही ज्यादा जानते हैं।

महाबलीपुरम में 7 वीं और 10 वीं सदी में पल्लव राजाओं ने राज किया था। इनके द्वारा बनाए गए मंदिर अपनी शानदार स्थापत्य कला के लिए जाने जाते हैं। इन मंदिरों को देखने आज भी पर्यटक आते हैं और इन्हें काफी पसंद करते हैं।

कहते हैं कि कांचीपुरम पर राज करने वाले पल्लवों की महाबलीपुरम दूसरी राजधानी थी। गुप्त राजवंश के पतन के बाद पल्लव राजाओं ने दक्षिण भारत में राज किया।

इन राजाओं ने लगभग 3 वीं सदी से 9वीं सदी के अंत तक अपना दबदबा बनाए रखा। पल्लव राजाओं के शासन काल के दौरान कई महान कवि, नाटककार, कलाकार, कारीगर, विद्वान और संत हुए थे। कारीगरी के मामले में पल्लवों का साम्राज्य अग्रिम था।

यहीं हुआ था बोधिधर्म का जन्म :

पल्लव राजाओं के राज में ही महान भिक्षु बोधिधर्म ने जन्म लिया था। बोधिधर्म का जन्म दक्षिण भारत के पल्लव राज्य के कांचीपुरम के राज परिवार में हुआ था।

माना जाता है कि बोधिधर्म कांचीपुरम के राजा सुगंध के तीसरे पुत्र थे। छोटी आयु में ही उन्होंने राज्य छोड़ दिया और भिक्षुक बन गए। 22 साल की उम्र में उन्होंने संबोधि (मोक्ष की पहली अवस्था) को प्राप्त किया।

दुनिया के महान भिक्षुओं में से एक बोधी धर्म को जो नहीं जानता वह मार्शल आर्ट के इतिहास को भी नहीं जानता होगा।

बोधिधर्म का जन्म 
बोधिधर्म का जन्म 

बोधिधर्म ने ही चीन में मार्शल आर्ट और कुंग फू जैसी विद्या को सिखाया था। प्रबुद्ध होने के बाद राजमाता के आदेश पर उन्हें सत्य और ध्यान के प्रचार-प्रसार के लिए चीन भेजा गया था।

यह भी कहा जाता है कि ह्वेनसांग ने जब भारत की यात्रा की थी तो वे महाबलीपुरम आए थे और यहीं रहकर उन्होंने बौद्ध धर्म के बारे में जानकारियां जुटाई थीं।

महाबलीपुरम के मंदिर :

कहा जाता है कि यहां प्राचीनकाल में सैकड़ों मंदिर थे। यह स्थान कई भव्य मंदिरों, स्थापत्य और सागर-तटों के लिए बहुत प्रसिद्ध था।

महाबलीपुरम के बारे में माना जाता है कि इसके तट पर 17वीं शताब्दी में 7 मंदिर स्थापित किए गए थे और एक तटीय मंदिर को छोड़कर शेष 6 मंदिर समुद्र में डूब गए थे।

शोर मंदिर-

महाबलीपुरम के समुद्र तट पर स्थित यह मंदिर प्राचीन वास्तु कला का उदहारण है। भगवान शिव और विष्णु को समर्पित शोर मंदिर का निर्माण लगभग 700-728 ईस्वी के समय हुआ था। इस स्टोन टेम्पल इसलिए कहते हैं क्योंकि मंदिर वाला भाग ग्रेनाइट पत्थर से बना हुआ है जो देखने में बहुत ही सुंदर दिखता है। मंदिर के प्रांगण में सात पगोडा की पत्थर की मूर्तियां हैं जिन्हें देखना अद्भुत है। इस मंदिर की अलग ही कथा है।

महाबलीपुरम के मंदिर 
महाबलीपुरम के मंदिर 

पंच रथ मंदिर-

महाबलीपुरम के समुद्री तट पर दूसरा मंदिर पंच रथ या पंच पांडवों का रथ नामक मंदिर है। यह एक सुन्दर स्मारक परिसर है जिसका निर्माण 7वीं सदी में महेंद्र वर्मन प्रथम और बेटे नरसिंह वर्मन प्रथम ने करवाया था।

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पंच रथ के पांच स्मारकों को पूरी तरीके से रथ के समान बनाया गया है जो सभी ग्रेनाइट पत्थर को खोद-खोद कर बनाए गए हैं। इसमें महाभारत की कहानी को दर्शाते हुए कलाकृतियां देखने को मिलती हैं। यह सभी रात बड़े से छोटे आकार में इस प्रकार से हैं- धर्मराज रथ, भीम रथ, अर्जुन रथ, नकुल एवं सहदेव रथ और द्रौपदी रथ।

गंगा अवतरण का स्मारक-

यह गंगा अवतरण के स्मारक महाबलीपुरम के कोरोमोंडल तट पर कांचीपुरम जिले में स्थित हैं। 96X43 फीट का यह स्मारक सुंदर कलाकारी को दर्शाता है। यह एक बड़ा पत्थर है जसमें खोद-खोद कर गंगा की उत्पत्ति का बहुत ही अद्भुत चित्रण किया गया है।

टाइगर गुफाएं-

यह गुफाएं महाबलीपुरम की सबसे बेहतरीन कलाकृतियां हैं। इनके बाहर पत्थर में उभरे हुए शेर की मूर्तियां हैं। यह भी पल्लव राजाओं द्वारा बनाया गया था।

स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना 
स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना 

कृष्ण की मक्खन गेंद-

दक्षिण भारत के महाबलीपुरम में 1200 वर्ष पुराना एक पत्थर बहुत ही अजीबोगरीब तरीके से रखा हुआ है। इसे देखकर लगता है कि यह जरा से टल्ले में नीचे गिर पड़ेगा, लेकिन ऐसा नहीं है। इस पत्थर की चौड़ाई 5 मीटर तथा ऊंचाई 20 फीट है।

सन् 1908 में इस पत्थर पर उस समय के मद्रास गवर्नर आर्थर की नजर पड़ी तो उनको लगा कि यह पत्थर किसी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है इसलिए उन्होंने इस पत्थर को उसके स्थान से हटवाने के लिए 7 हाथियों से खिंचवाया पर यह पत्थर अपनी जगह से 1 इंच भी नहीं खिसका।

ग्रेविटी के नियमों की उपेक्षा करते हुए यह पत्थर एक ढलान वाली पहाड़ी पर 45 डिग्री के कोण पर बिना लुढ़के टिका हुआ है। लोग इस पत्थर को 'कृष्ण की मक्खन गेंद' भी कहते हैं क्योंकि उनका मानना है की यह पत्थर मक्खन की गेंद है जिसको कृष्ण ने अपनी बाल्य अवस्था में नीचे गिरा दिया था।