तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राज्यों की सीमा पर स्थित भद्राचलम में भगवान श्रीराम और देवी सीता का विश्वप्रसिद्ध मंदिर है। रामायण ग्रंथ से भद्राचलम और विजयनगरम के करीबी संबंध होने के संकेत मिलते हैं। भद्राचलम से 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पर्णशाला में भगवान श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के कुछ समय बिताने के भी यहां संकेत मिलते है।

गोदावरी नदी तट पर स्थित भद्रगिरि नामक पहाड़ के पास श्रीराम ने श्रीलंका में कैद देवी सीता की रक्षा करने के लिए जाने के दौरान रास्ते में इस नदी को पार किया था।मेरु पर्वत और मेनका का बेटा ही भद्र (भद्रगिरि) है। इस भद्रु की इच्छानुसार भद्रगिरि पर रुके भगवान श्रीराम बाद में भद्राद्री रामुडू बन गए। इस भद्रगिरी चट्टान पर स्थित भगवान श्रीराम का मंदिर ही श्री सीतारामचंद्रस्वामी देवस्थानम है।

भद्राचलम में श्रीराम नवमी पर कोदंडराम का कल्याणोत्सव 
भद्राचलम में श्रीराम नवमी पर कोदंडराम का कल्याणोत्सव 

मुस्लिम समुदाय में जन्में संत कबीर दास के भी इस मंदिर से करीबी संबंध होने के संकेत मिलते हैं। कहा जाता है कि एक बार इस मंदिर में प्रवेश कर रहे कबीर दास को रोका गया तो मंदिर में स्थित दिव्य दृश्य अचानक गायब हो गए और जब उन्हें मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई तो दिव्य दृश्य फिर से प्रकट हो गए।

विश्व प्रसिद्ध यह मंदिर दुनियाभर के लाखों लोगों को विशेष रूप से आकर्षित करता है। पावन गोदावरी नदी इस भद्राद्री पहाड़ के दक्षिण दिशा में प्रवाहित होते हुए प्राकृतिक सौंदर्य बिखेरती है और प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र के रूप में भद्राचलम की खूबसूरती को और बढ़ाती है।

मेरु पर्वत और मेनका को मिले वर की बदौलत जन्मा बालक ही भद्र पर्वत है। इस भद्रु (छोटा पहाड़) के कारण ही इस पहाड़ को भद्रगिरि के नाम से जाना गया और यहां बसे गांव का भद्राचलम नाम पड़ा।

भद्राद्री में कोदंडराम के कल्याणोत्सव का दौरान निकाली गई शोभायात्रा
भद्राद्री में कोदंडराम के कल्याणोत्सव का दौरान निकाली गई शोभायात्रा

इस सीतारामचंद्र स्वामी मंदिर में भगवान श्रीराम की मूर्ति दो हाथों के साथ मनुष्य के रूप में है। परंतु भद्राचलम मंदिर के भीतर श्रीराम की मूर्ति के चार हाथ हैं, जिनमें वे दाहिने हाथ में धनुष और बाएं हाथ में बाण पकड़े हुए हैं और विष्णु की भांति दाएं हाथ में शंख और बाएं हाथ में चक्र धारण किए हुए हैं।

यहां भद्रु की इच्छानुसार वैकुंठ से पधारे विष्णुमूर्ति चार भुजाओं के साथ दर्शन देते हैं इसलिए यहां उन्हें वैकुंठराम के नाम से जाना जाता है।

अन्य मंदिरों में सीता देवी भगवान श्रीराम के बगल में खड़ी दिखाई देती हैं जबकि इस मंदिर में वे श्री राम की जंघा पर बैठी हुई भक्तों को दर्शन देती हैं। वहीं आमतौर पर देखा जाता है कि मंदिरों में लक्ष्मण श्रीराम के दाहिने तरफ खड़े होते हैं, लेकिन यहां वे भगवान राम के बाएं तरफ खड़े होते हैं।

इस मंदिर में होने वाले उत्सव में सबसे महत्वपूर्ण है श्रीरामनवमी के दिन होने वाला कल्याणोत्सव, जो देशभर में अत्यंत प्रसिद्ध है। इस कल्याण महोत्सव में लाखों भक्त भाग लेते हैं। राज्य सरकार की तरफ से मुत्याल तलंब्रालु और रेशम के कपड़े इस मंदिर को प्रति वर्ष भेजे जाते हैं।

माना जाता है कि यहां वैकुंठ से विष्णुमूर्ति सीधे पधारे और भद्रु को दर्शन दिए इस कारण यहां वैकुंठ एकादशी पर्व पर उत्तर द्वारदर्शन किए जाते हैं और वह काफी प्रसिद्ध भी है।

तमिलनाडु के श्रीरंगम से रामदासु द्वारा लाए गए छह वंशों के श्रीवैष्णव आचार्य के परिवार आज भी भद्राचलम में प्रति दिन पूजा करते हैं। रामानुजावार के साथ श्रीरंगम में निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक ही यहां के मंदिर में भी पूजा होती है।

पर्णशाला :

यह भद्राचलम से 35 किलो मीटर की दूरी पर है। माना जाता है कि सीता-राम-लक्ष्मण ने अपने वनवास के दौरान यहां विश्राम किया था। वनवास के कुछ सुंदर दृश्य यहां चित्र, शिल्पकलाओं के रूप में दिखाई भी देते हैं।

योगराम मंदिर में भगवान श्रीराम और लक्ष्मण के साथ शबरी
योगराम मंदिर में भगवान श्रीराम और लक्ष्मण के साथ शबरी

उदाहरण के तौर पर सीता का अपहरण करने के लिए एक महिला के अवतार में पहुंची हरीचु को बोम्मा और पर्णशाला के निकट स्थित सीतम्मा वागु (नहर) के पास सीता द्वारा सुखाई गई साड़ी के चिन्ह, उनके द्वारा संग्रहित हल्दी और कुमकुम के रंगीले पत्थरों के कुछ अवशेष यहां आज भी मौजूद हैं।]

नदी किनारे रावण के रथ के अवशेष भी देखे जा सकते हैं। यहीं पर रावण ने सीता का अपहरण किया था। सीता से दूर हो चुके भगवान श्रीराम शोक में डूबे भीसदिखाई देते हैं। भद्राचलम में स्थित राम की मूर्ति के चेहरे पर दिखने वाला तेज पर्णशाला में भगवान श्रीराम के चेहरे पर नहीं दिखता। श्रीराम नवमी के दिन यहां भी कल्याणोत्सव का आयोजन होता है।

यह भद्राद्री से 2 किलो मीटर की दूरी पर है। माना जाता है कि सीताहरण के समय जटायु ने रावण का सामना कर सीता की रक्षा करने के दौरान यहीं इसी जगह पर अपने प्राण न्यौछावर किए थे। बताया जाता है जटायू का एक पंख यहां से 55 किलो मीटर की दूरी पर स्थित वी.आर.पुरम मंडल के रेखपल्ली गांव में गिरा था।

भगवान श्रीराम के पट्टाभिषेक का  दृश्य
भगवान श्रीराम के पट्टाभिषेक का  दृश्य

पापीकोंडा, पूर्व कनुमलला स्थित घने जंगलों में पर्वतों की श्रेणी है। यह खम्मम जिला, पश्चिमी गोदावरी और पूर्वी गोदावरी जिलों के बीच सटे हुए हैं। यहां गोदावरी नदी और पहाड़ियों से घिरा बड़ा ही खुशनुमा वातावरण होता है। भद्राचलम से नाव के रास्ते यहां पहुंचने की सुविधा है। पापीकोंडा पहाड़ियों में आमतौर पर पेड़ के पत्ते नहीं झड़ते।

यह शांत, सुंदर और बहुत ही खुशनुमा क्षेत्र है। गर्मी के दिनों में भी पापीकोंडा क्षेत्र ठंडा होता है। पापीकोंडा पहाड़ियों व जंगल में विभिन्न जीव-जंतु,पक्षी और जहीरीले कीड़े होते हैं। साथ ही हजारों प्रकार के औषधीय पौधे और पेड़ भी यहां पाए जाते हैं।

भद्राचलम के पास मुनिवाटम नामक इलाके में एक झरना है। यहां एक शिवलिंग सांप की छाया में स्थित दिखाई देता है। पापीकोंडा के दो पहाड़ों के बीच से गोदावरी गुजरती है और यह बहुत ही सुंदर दृश्य दिखाई देता है।

योगराम मंदिर

यह गोदावरी नदी के निचले हिस्से में 55 किलो मीटर की दूरी पर स्थित है और यहां एक पहाड़ पर योग राम का मंदिर है। भद्राद्री से सिर्फ पांच किलो मीटर की दूरी पर स्थित गर्म पानी का कुंड है जहां गर्म पानी से बुलबले निकलते हुए देखे जा सकते हैं। यहां नदी के किनारे कहीं पर भी खोदने पर गर्म पानी ही मिलता है। माना जाता है कि यहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश सर्दियों में स्नान करने आते हैं।

यह भी माना जाता है कि यहां एक भीषण युद्ध हुआ था जिसमें भगवान श्रीराम ने 14,000 से अधिक राक्षसों का वध किया था और उन्हीं राक्षसों की राख पर यह गांव बसा है, इसलिए इस गांव का नाम दुम्मुगुड़ेम (धूल का गांव) ही पड़ गया। यहां भगवान श्रीराम को आत्माराम के नाम से जाना जाता है। यह गांव भद्राचलम से दो किलो मीटर की दूरी पर है।

भक्त श्रीरामदास

माना जाता है कि भक्त श्रीरामदास यानि कंचर्ला गोपन्ना को 17वीं शताब्दी के दूसरे हिस्से में कंचर्ला गोपन्ना के भद्राचलम के तहसीलदार रहते हुए सरकार की जानकारी के बिना ही इस मंदिर के निर्माण के लिए सरकारी खजाने से धन खर्च करने की शिकायत पर गोलकोंडा स्थित एक तहखाने में बंद कर दिया गया था।

माना जाता है कि कंचर्ला गोपन्ना की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीराम उन्हें तहखाने से छुड़वाने के लिए गोलकोंडा संस्थान के प्रमुख सुल्तान के सपने में आए और उनसे गोपन्ना को रिहा करने के लिए कहा और उसके बाद मंदिर निर्माण में हुए खर्च का वहन मीर उस्मान अली खान ने किया था।

बंदीगृह से रिहा हुए गोपन्ना ने भगवान श्रीराम की भक्ति में ही अपना जीवन गुजारा और भजन-कीर्तन करने लगे। उनके द्वारा रचित तेलुगु भजन आज भी काफी प्रसिद्ध है। यह भी ज्ञात हो कि तभी से गोपन्ना को रामदासु के नाम से पुकारा जाने लगा।