लेखक: रवि वल्लूरी

नई दिल्ली / ऊटी: "मुझे रेलगाड़ी पसंद है। मुझे उनकी लय पसंद है, और मुझे दो स्थानों के बीच खुली वादियां और उनके बीच की स्वतंत्रता पसंद है। इस पल के लिए मुझे पता है कि मैं कहां जा रहा हूं।", ये शब्द हैं मशहूर लेखक अन्ना फंडर के।

एक पर्यटक ही चमत्कारिक टॉय ट्रेन की सवारी करने के रोमांच को महसूस कर सकता है। जिसका मेट्टुपालयम से ऊटी तक की साढ़े तीन घंटे की यात्रा के दौरान आप भी आनंद उठा सकते हैं।

यह यात्रा एक सुरुचिपूर्ण और अद्वितीय ट्रेन में सफर का अनुभव प्रदान करती है। ऊटी, जो असंख्य शांत ठिकानों से भरा है, वास्तव में ये इलाका पर्यटकों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं।

नीलिगिरि माउंटेन रेलवे से जुड़ी तस्वीर 
नीलिगिरि माउंटेन रेलवे से जुड़ी तस्वीर 

ऊटी का सफ़र आप सड़क या रेल मार्ग से तय कर सकते हैं। हालाँकि, टॉय ट्रेन में सवार होना अपने आप में अनूठा अनुभव आपके लिए साबित हो सकता है।

इसलिए क्योंकि टॉय ट्रेन में सफर के दौरान आप हवाओं से बात करते हुए रोमांच का अनुभव करेंगे और आपको वसंत जैसा असहास होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो ये पहली नजर में प्यार जैसी बात होगी। जिस टॉय ट्रेन की हम बात कर रहे हैं वो ऊटी से केट्टी तक जाती है, ये वो इलाका है जो प्रसिद्ध नीलगिरि पर्वत पर स्थित है।

आपकी टॉय ट्रेन सुरंगों, घाटियों और पुलों के जरिए आगे बढ़ती है। मेट्टुपालयम की ऊंची चोटी से ऊटी के सफर में 46 किमी की दूरी तय करनी होती है। सफर के दौरान दिल को थामते हुए आप हरे चाय के बागानों, खड़ी घाटियों और जंगल का अद्भुत दृश्य निहार सकते हैं। इस जगह की इसी खासियत के चलते इसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर की मान्यता प्राप्त है।

नीलिगिरि माउंटेन रेलवे से जुड़ी तस्वीर 
नीलिगिरि माउंटेन रेलवे से जुड़ी तस्वीर 

नीलगिरि माउंटेन रेलवे दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु में भारतीय रेल का हिस्सा है। जिसका संचालन पहले मद्रास रेलवे द्वारा किया जाता था। नीलगिरि माउंटेन रेलवे दरअसल ब्रिटिश शासकों के मजबूत मैकेनिकल और सिविल इंजीनियरिंग वाली दक्षता की देन है। ये रेल अभी भी भाप इंजन पर छुक छुककर चलती है। सफर के दौरान आप रेल यात्रा की पुरानी यादों से जुड़ जाएंगे, जब भाप इंजिन लगी रेलगाड़ियों में आप सफर किया करते थे।

1899 के दौरान कुन्नूर और मेट्टुपालयम के बीच सबसे पहले इस टॉय ट्रेन सेवा की शुरुआत की गई थी। यह ब्रिटिश कालीन वेलिंगटन में बनी रेलवे संरचना के मुताबिक है। आजादी से पहले ये ब्रिटिश सेना को रसद पहुंचाने और उनके आने जाने का बेहतर साधन था।

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अंग्रेजों के लिए प्रशासन पर नियंत्रण का जरिया रेलवे, पुलिस और डाक प्रणाली ही थी। 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (जिसे 1857 का विद्रोह भी कहा जाता है) के बाद अंग्रेजों ने रेलवे के महत्व को जाना।

हालांकि इसका व्यावसायिक पक्ष जानने के बाद इस लाइन को साल 1908 में ऊटी तक बढ़ा दिया गया। ताकि अंग्रेज अपना साम्राज्य कुन्नूर से ऊटी तक पहुंचा सकें। ऊटी और कुन्नूर के बीच 15 अक्टूबर, 1908 को इस सेवा की शुरुआत की गई थी।

नीलिगिरि माउंटेन रेलवे से जुड़ी तस्वीर 
नीलिगिरि माउंटेन रेलवे से जुड़ी तस्वीर 

ऊटी, जिसे तमिल में उधगमंडलम के रूप में भी जाना जाता है, तमिलनाडु राज्य के दक्षिण में एक हिल स्टेशन है। यह घने जंगलों से ढका हुआ है जिसमें युकलिप्टस के पेड़ों की छटाएं आपका मन मोह लेती है। जंगल और पहाड़ से गुजरते हुए खुली हवा में सांस लेकर बीमार व्यक्ति भी भला चंगा हो जाय, वास्तव में ये यात्रा किसी जीवन दायिनी औषधि से कम नहीं।

आजादी से पहले ऊटी में पूरी तरह अंग्रेजों का ही दबदबा था। मद्रास प्रेसीडेंसी की गर्मी और उमस से दूर ऊटी में अंग्रेज आराम फरमाते थे। अल्फ्रेड टेनिसन ने इस जगह को "नीलगिरी की मीठी अंग्रेजी हवा" के रूप में बताया था। लॉर्ड लिटन, भारत के तत्कालीन वायसराय को भी ऊटी की छटाएं बेहद भाती थी।

नीलिगिरि माउंटेन रेलवे से जुड़ी तस्वीर 
नीलिगिरि माउंटेन रेलवे से जुड़ी तस्वीर 

शानदार पर्वत श्रृंखला, कुन्नूर में एक हॉप और अंत में अद्भुत रैक और पिनियन रेल प्रणाली, ये सब ऊटी की यात्रा में आपको देखने को मिलता है। कुछ साल पहले कुन्नूर और ऊटी के बीच ट्रेन के धंसने से स्टीम से लेकर डीजल तक के ट्रैक्शन में बदलाव हुआ था। जिसका स्थानीय लोगों ने विरोध भी किया था। लोग किसी भी हाल में अतीत की विरासत को मिटने नहीं देना चाहते थे।

पर्यटकों के लिए नीलगिरि माउंटेन रेलवे बड़ा आकर्षण है। तकरीबन हर साल पांच लाख पर्यटक इस ट्रेन की सवारी का आनंद उठाते हैं। ट्रेन मेट्टूपालेम से छूटती है। शुरुआत में डेढ़े मेढ़े रास्तों और वादियों के बीच चलती ट्रेन की रफ्तार 12 km प्रति घंटा आपको रोमांचित करती है।

इस ट्रेन को महज 46 किलोमीटर का सफर तय करने में पांच घंटों का वक्त लगता है। इस दौरान ये ट्रेन कुनूर, वेलिंगटन, अरुवंकाडु, केट्टी, लावेडेल जगहों से होकर गुजरती है। अगर ट्रेन यात्रा के दौरान किसी कारण से थोड़ देर के लिए रुकती है तो रोमांचित पर्यटक उतरकर पेड़ों से फूल तोड़ने के रोमांच को रोक नहीं पाते हैं।

पहाड़ी ढलानों पर हर बार आगे बढ़ने के लिए इंजन को झटका देना पड़ता है। कई बार तो 3-4 किलोमीटर सफर के बाद ही ट्रेन रुक जाती है। ऐसा भी होता है कि कोई युकेलिप्टस का पेड़ पटरियों पर आकर गिर जाय और आपकी यात्रा थोड़ी देर के लिए बाधित हो जाय। हालांकि इस दौरान आपको खतरे का कम और रोमांच का अनुभव अधिक होता है। टॉय ट्रेन का बार बार रुकना आपके रोमांच को और लबरेज करता है।

नीलिगिरि माउंटेन रेलवे से जुड़ी तस्वीर 
नीलिगिरि माउंटेन रेलवे से जुड़ी तस्वीर 

पुराने भाप इंजन के जरिए छुक छुककर यात्रा करने के दौरान किसी भी शख्स के चेहरे पर हड़बड़ी नजर नहीं आता है। नीलगिरि माउंटेन रेलवे द्वारा यात्रा के दौरान आप ब्रिटिशकालीन भारत के मूलरूप का दीदार कर सकते हैं। पहले दो स्टेशन, लवडेल और केट्टी, जंगल में पूरी तरह घिरे मिलेंगे। लंबे, घने पेड़ इस रमणीय स्टेशन को चारों ओर से घेरे हुए है।

स्टेशनों के नाम ब्रिटिशकालीन ही हैं। रास्ते में आधुनिक सिग्नल की जगह पुरातन सेमाफोर सिग्नल ही लगाए गए हैं। हर स्टेशन पर ड्राइवर के हाथ में एक बांस का डंडा होता है इसके साथ ही एक धातु की चीज। वास्तव में ये इशारा होता है कि ट्रेन अब आने वाली है, या फिर आगे रास्ता खुला हुआ है।

कुन्नूर में वेलिंगटन स्टाफ कॉलेज भी है, ये कॉलेज आपको आधुनिक भारत से रूबरू करवाता है। दोपहर होने के बाद ही ट्रेन रेंगती हुई आपको ऊटी स्टेशन पहुंचाती है। इस दौरान आपके मन पर नीलगिरि वादियों की अमिट छाप पड़ चुकी होती है।