जयमंगलागढ़ : एशिया में ताजे पानी की सबसे बड़ी गोखुर झील ‘कावर झील पक्षी विहार' अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। छह हजार हेक्टेयर वाले इस परिक्षेत्र में अभी बमुश्किल करीब एक हजार एकड़ में जल है।

दूर देशों से आने वाले पक्षियों का बसेरा रही इस झील से लगे बड़े भूक्षेत्र पर स्थानीय लोग खेती, मछली पकड़ने एवं अन्य तरीकों से कब्जा कर रहे हैं। पानी की कमी और शिकार की वजह से यहां आने वाले पक्षियों की संख्या भी घट गई है।

बेगूसराय के जिला मजिस्ट्रेट एवं कलेक्टर राहुल कुमार ने इस बारे में पूछे जाने पर कहा कि कावर झील पक्षी विहार की स्थिति अच्छी नहीं है लेकिन यह मामला उच्च न्यायालय में लंबित होने के कारण अभी कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है।

कुमार ने ‘भाषा' से कहा कि यह झील छह हजार हेक्टेयर में फैली है । इसके आसपास आबादी वाला इलाका है। लोगों की मांग है कि पक्षी विहार क्षेत्र के दायरे को कम किया जाए, यहां मछली पकड़ने और आसपास निर्माण कार्य करने की अनुमति दी जाए, लेकिन वन्य प्राणी संरक्षण क्षेत्र होने के कारण ऐसा संभव नहीं है। इन्हीं मुद्दों पर मामला उच्च न्यायालय में चल रहा है।

उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय ने विकास आयुक्त के नेतृत्व में एक समिति गठित की। समिति ने दो जन सुनवाई करने के बाद अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंप दी है । सर्दियों में कावर झील पक्षी विहार में साइबेरियाई देशों... रूस, मंगोलिया, चीन आदि देशों से पक्षी बड़ी तादाद में पहुंचते हैं। नवंबर से आने वाले ये पक्षी मार्च में वापस लौट जाते हैं।

कांवर झील दुनिया का सबसे बड़ा वेटलैंड एरिया माना जाता है। इसे पक्षीविहार का दर्जा 1986 में बिहार सरकार ने दिया था । वन्य संरक्षण अधिनियम 1927 तथा वन्य जीव संरक्षण आश्रय स्थल अधिनियम 1972 के अंतर्गत चेरिया बरियारपुर प्रखंड में मंझौल, जयमंगलपुर, जयमंगलागढ़, गढ़पुरा, रजौड़, कनौसी और छौड़ाही, परोड़ा, नारायणपीपर तथा मणिकपुर क्षेत्र में कुल 6311.63 हेक्टेयर इलाके को संरक्षित किया गया है।

शिकार की वजह से यहां आने वाले पक्षियों की संख्या घट रही है। पानी कम होने के बाद स्थानीय लोग आसपास के क्षेत्र में गन्ना, गेहूं, धान की फसल लगा रहे हैं। अवैध रूप से मछली भी पकड़ी जा रही है।

यहां के चौर इलाके में पिछले करीब दो दशकों से पक्षियों पर शोध करने वाले पक्षी विशेषज्ञ अरविंद मिश्रा और वनस्पति विज्ञान के विशेषज्ञ डॉ. विद्यानाथ झा का मानना है कि कुशेश्वर स्थान के विभिन्न गांवों में फैले 14 हजार हेक्टेयर के चौर में प्रतिवर्ष भारी मात्रा में गाद जमा होने से जलग्रहण क्षमता कम होती जा रही है। इस वजह से चौर में पादप पल्वक और जन्तु पल्वक घटते जा रहे हैं जो प्रवासी पक्षियों का मुख्य आहार है। जमीन की कीमत तेजी से बढ़ने के कारण भू माफियाओं की भी नजर यहां की जमीन पर है। हालांकि वन्य जीव संरक्षण और स्थानीय लोगों का एक बड़ा तबका इस विरासत को बचाने के लिये सरकार से तत्काल प्रभावी कदम उठाने की मांग कर रहा है ।