किसान और देश के लिए बलिदान हुए सैरा नरसिम्हा रेड्डी, पीढ़ी ऐसे रखेगी याद 

‘सैरा नरसिम्मा रेड्डी’ में चिरंजीवी - Sakshi Samachar

मेगास्टार चिरंजीवी और बॉलीवुड के मेगास्टार अमिताभ बच्चन की आने वाली फिल्म ' सैरा नरसिम्मा रेड्डी' इन दिनों सुर्खियों में है। हाल ही में फिल्म सैरा नरसिम्हा रेड्डी का ट्रेलर रिलीज हुआ है। अब 2 अक्टूबर को सैरा नरसिम्हा रेड्डी देश विदेश में अनेक भाषाओँ में रिलीज होने के लिए पूरी तरह से तैयार है। फिल्म सैरा नरसिम्हा रेड्डी’ की कहानी स्वतंत्रता सेनानी उय्यलवाडा नरसिम्हा रेड्डी की जिंदगी पर आधारित है। चिंरजीवी इस फिल्म में उय्यलवाड़ा नरसिम्हा रेड्डी की भूमिका में नजर आने वाले हैं।

सैरा नरसिम्हा रेड्डी’ फिल्म को लेकर बहुत चर्चा चल पड़ी है। ऐसे में हर कोई यह जानने के लिए उत्सुक है कि आखिर ‘ सैरा नरसिम्हा रेड्डी’ फिल्म किसकी जिंदगी पर आधारित है। साथ ही उय्यलवाड़ा नरसिम्हा रेड्डी कौन थे? हम आपको उय्यलवाड़ा नरसिम्हा रेड्डी के बारे में बताते हैं। उय्यलवाड़ा नरसिम्हा रेड्डी का जन्म रूपानागुडी गांव उय्यलवाड़ा मंडल और कर्नूल जिले (आंध्र प्रदेश) में हुआ था। उय्यलवाड़ा नरसिम्हा रेड्डी का जन्म तेलुगु परिवार में हुआ था। पांच भाई-बहनों में नरसिम्हा सबसे छोटे थे। इनकी शादी सिद्दम्मा से हुई थी।

उय्यलवाडा नरसिम्हा रेड्डी

नरसिम्हा रेड्डी जब बगावत पर उतरे, तो अंग्रेजो को भारत में आकर सैंकड़ो साल हो चुके थे। धीरे-धीरे अंग्रेजी हुकुमत पैर पसार रही थी। किसानों पर उनके जुल्म दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे थे। इसी दौर में नरसिम्हा रेड्डी ने किसानों के लिए लड़ाई लड़ने का फैसला किया।

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मद्रास प्रेसिडेंसी जो आज आंध्र प्रदेश का हिस्सा है, वहां अंग्रेजों ने रैयतवाड़ी व्यवस्ता की शुरूआत की, इस व्यवस्ता के जरिए अंग्रेजो को कर के रूप में खूब सारा पैसा मिलने लगा। जिसके बाद मुनरों ने इसे साल 1820 में पूरे मद्रास में लागू कर दिया। इसके तहत किसानों और कंपनी के बीच सीधा समझौता होता था।

राजस्व के निर्धारण और लगान वसूली में किसी जमींदार और बिचौलियें की भूमिका नहीं होती थी। कैप्टन रीड और थॉमस मुनरों द्वारा हर पंजीकृत किसानों को भूमि का स्वामी माना जाता था, लेकिन कर ना देने पर उन्हें अपनी जमीन देनी पड़ती थी। इस व्यवस्था के चलते किसानों को बहुत नुकसान पहुंचता था। इसके चलते अनेक किसानों ने खुदकुशी कर ली।

उपस्थित प्रशंसकों को संबोधित करते हुए चिरंजीवी

नरसिम्हा रेड्डी से किसानों की ये हालत देखी नहीं गई। उन्होंने सबको एकजुट करके अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ने का फैसला लिया। पहले तो किसानों को एकजुट करने में नरसिम्हा रेड्डी को बहुत ही मुश्किलों का सामना करना पड़ा। कुछ समय बाद अंग्रेजों से प्रताड़ित किसान नरसिम्हा के साथ आंदोलन में शामिल हो गये। लगभग पांच हजार किसानों को साथ लेकर नरसिम्हा रेड्डी हक की लड़ाई लड़ने लगे। नरसिम्हा रेड्डी अंग्रेजों के खजाने को लूटकर गरीबो में बांटने लगे।

नरसिम्हा रेड्डी के आंदोलन देख अंग्रेजों ने उन्हें जान से मारने की कोशिश की। अंग्रेजों ने नरसिम्हा की टोली के एक हजार लोगों के खिलाफ गिरफ्तार वारंट जारी किया गया था। इनमें से 412 लोगो को बिना कोई मामला दर्ज किये छोड़ दिया गया। कुछ लोगों को जमानत पर छोड़ा गया। 112 लोगो को मौत की सजा सुनाई गई, जिसमें नरसिम्हा रेड्डी भी शामिल थे।

22 फरवरी 1847 को अंग्रेजों ने सरेआम आस-पास गांव के दो हजार लोगों के सामने नरसिम्हा रेड्डी को फांसी पर लटकाया गया। नरसिम्हा रेड्डी को अंग्रेजों ने भले ही फांसी पर लटका दिया था, लेकिन लोगों के दिल में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने की चिंगारी जलाकर गए थे। साल 1857 का विद्रोह ही लोगों के दिलों में जल रहे इसी आग का नतीजा था।

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