कादंबिनी क्लब की 331वीं गोष्ठी में इस साहित्यकार के साहित्य पर की गई चर्चा

कादंबिनी क्लब की मासिक गोष्ठी में उपस्थित साहित्यकार, कवि और लेखक - Sakshi Samachar

हैदराबाद : कादंबिनी क्लब हैदराबाद के तत्वाधान में शुभदा वांजपे की अध्यक्षता में मदन देवी क़ीमती सभागार रामकोट में कादंबिनी क्लब की 331वीं मासिक गोष्ठी का सफल आयोजन संपन्न हुआ। प्रेस विज्ञप्ति में जानकारी देते हुए डॉ अहिल्या मिश्र (क्लब अध्यक्षा एवं मीना मुथा कार्यकारी संयोजिका) ने बताया कि इस अवसर पर प्रथम सत्र में प्रो शुभदा वांजपे, अतिथि साहित्यकार कुमार अंबुज (भोपाल), डॉक्टर अहिल्या मिश्र, अवधेश कुमार सिन्हा (संगोष्ठी सत्र संयोजक) मंचासीन हुए। मां शारदे की छवि पर माल्यार्पण किया गया तथा दीप प्रज्वलित किया गया।

ज्योति नारायण ने निराला रचित सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। तत्पश्चात मंचासीन प्रो शुभदा वांजपे व कुमार अंबुज का अंगवस्त्र माला से क्लब की ओर से सम्मान किया गया। इसमें डॉक्टर रमा द्विवेदी, ज्योति नारायण, डॉ हरजिंदर सिंह लाल्टू, प्रदीप भट्ट, सुहास भटनागर, अवधेश कुमार सिन्हा ने सहयोग दिया ।

डॉ अहिल्या मिश्र ने स्वागत भाषण में कहा कि संस्था ने रजत जयंती के बाद प्रथम सत्र में “सदन के समक्ष साहित्यकार” यह एक नया प्रयोग पटल के सामने लाया और सभा में इसे सराहना भी मिल रही है। सभी का साथ ही क्लब के लिए प्रेरणा का स्रोत है। संगोष्ठी का संचालन करते हुए अवधेश कुमार सिन्हा ने कुमार अंबुज के परिचय में कहा कि मध्य प्रदेश के गुना जिले के मंगवार गांव में 13 अप्रैल 1957 को कुमार अंबुज का जन्म हुआ।

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सर्वाधिक महत्वपूर्ण काव्य में शामिल समकालीन हिंदी के प्रख्यात एवं सुपरिचित कवि, लेखक, आलोचक, विचार तथा देश के कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित पुरुषोत्तम कुमार सक्सेना जिन्हें साहित्य जगत कुमार अंबुज के नाम से जानता है। वनस्पति शास्त्र, क़ानून की पढ़ाई, नौकरी बैंक की, साधना कविता की ऐसे सम्मिश्रित व्यक्तित्व के अम्बुज ने कविता, आलोचना, वैचारिक लेख आदि विभिन्न विधाओं में लेखन के साथ सम्पादन भी किया। कविता संग्रह किवाड़, क्रूरता, अतिक्रमण, अनंतिम, अमीरी रेखा के अलावा प्रतिनिधि कविताओं का संकलन भी प्रकाशित हुआ। विभिन्न साहित्यकारों से सम्मानित आप सिनेमा एवं संगीत में भी रुचि रखते हैं।

प्रवीण प्रणव ने वार्तालाप का आरंभ करते हुए अम्बुज से पूछा कि अक्सर हम यादों के झरोखों में झांक लेते हैं आप अपने बचपन के बारे में क्या कहेंगे? बैंक प्रबंधन में रहते हुए आपने कविता को कैसे साधा? अलग-अलग क्षेत्र के अलग-अलग अनुभव के साथ लेखन की ओर कैसे मुड़े, आज के साहित्यकारों से आपकी क्या अपेक्षा है? मौलिकता की परिभाषा क्या होती है? आज लेखन की होड़ लगी है इसमें बेहतर साहित्य की गुंजाइश कितनी है? आपने किन किन साहित्यकारों को पढ़ा? साहित्य में दर्शन होना चाहिए इस बात को आप दृढ़ता से स्वीकारते हैं क्या? आने वाले लेखक इसका अनुसरण करेंगे? कुमार अंबुज ने प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा कि 60 वर्ष पूर्व कस्बाई जीवन में शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सुविधाओं का अभाव था। अंधविश्वास की भरमार थी।

मैं हमेशा छोटी-छोटी जगहों के प्रति आकर्षित रहा हूं। हमें अपना स्वयं का वातावरण भी बनाना पड़ता है। खिड़कियों को खोलना होगा। हम जितना अनुशासन और अनुभव से गुजरते हैं, अधिक से अधिक समाज से साक्षात्कार करते हैं, उतना ही पूर्णता की ओर बढ़ते हैं। हमारे बेसमेंट में कई चीजें पड़ी होती हैं पर हमें पता ही नहीं होता .. जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। नदी के बहने में और कवि कर्म में फर्क है। मार्क्सवाद साहित्यकार को कभी नहीं कहता कि दुनिया को समझें। परिवार स्त्री के शोषण का केंद्र है.. इसका विरोध हुआ.. दृष्टि कुछ क्षीण हुई पर खत्म नहीं हुई।

मौलिकता जड़ चेतन के सापेक्ष हैं। समाज खराब दशा दिशा की ओर जा रहा है, आज हम अधिक भयावह स्थिति में आ गए हैं। जो जीवन विवेक है वही साहित्य विवेक भी है। आपकी कविता कहां पढ़ी जाएगी आपको पता नहीं। जीवन के प्रांगण में ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना चाहिए। पुरस्कार के उद्देश्य बड़े होते हैं, कई संस्थाएं पुरस्कारों की उठापटक में लगी रहती है।

मैंने तुलसी-दास को बचपन में पढ़ा तो लगा यह तो एक कथा मात्र है फिर कुछ बड़े होने पर पुनः पढ़ा तो रूपक अलंकारों का इस्तेमाल प्रभावित कर गया। कविता किसी लय की मोहताज नहीं होती। शमशेर बहादुर सिंग, विष्णु खरे, श्रीकांत वर्मा, केदारनाथ सिंह, यहूदा मिखाई, फर्नांडो पेसो, धूमिल आदि को पढ़ा।

अहिल्या मिश्र ने पूछा कि आपके लेखन में लयता क्षयता झलकती है आपका अपना जीवन दर्शन क्या है? डॉक्टर रमा द्विवेदी ने पूछा कि क्या छंदबद्ध कविताएं, गीत आज की समस्याओं को दर्शा सकते हैं?

ज्योति नारायण ने पूछा कि साहित्यकारों में राजनीति बहुत है यह कहां तक सही है? सुभाष भटनागर ने जानना चाहा कि कविता लिखने के बाद क्या अंबुज रिलीफ़ फील करते हैं या भारीपन महसूस करते हैं? श्रीवास ने पूछा कि क्या साहित्य सृजन में कठिन शब्दों का चयन जरूरी है? डॉ सुरेश कुमार मिश्र ने पूछा कि क्या कविता का बाजारीकरण जरूरी है? कविता क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर में अम्बुज ने कहा कि कविता संवेदनाओं का रूप है।

कोई भी भाषा रोजगार की भाषा नहीं होनी चाहिए। बंधन तोड़ते हैं तो हम चुनौती लेते हैं। हम जितना सोचते हैं उससे कम ही लिख पाते हैं। आपका साहित्य किस श्रेणी में आता है इसका निर्णय पाठक करता है। किवाड़, क्रूरता एक आदमी जंगल में, कोई नहीं मरना चाहता, माँ जेब में सिर्फ दो रुपए आदि कविताओं का पाठ अंबुज ने किया जिसे सभा ने खूब सराहा।

डॉ शुभदा वांजपे ने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि कुमार अंबुज का साहित्य यथार्थमुखी है। उसमें मिट्टी की सुगंध नहीं बल्कि मिट्टी का दर्द प्रकट होता है। हमारे इर्द-गिर्द कई विषमताएँ हैं और उस पंक में कुमार अंबुज खिले हैं। उनकी भाषा में सरलता है। इस नौवें दशक के कवि में अवलोकन की जबरदस्त क्षमता है। मानव के संघर्षपूर्ण जीवन को, विशेषत: मां की वेदना को, रिश्तों को, गहराई से चित्रित करते हैं। क्लब के प्रयास हेतु भी प्रोफेसर शुभदा ने साधुवाद दिया। सत्र का आभार मीना मुथा ने दिया। प्रवीण प्रणव ने साक्षात्कार सत्र का सफल संचालन किया।

दूसरे सत्र में डॉ प्रदीप चित्रांशी, फरीद जियाई मंचासीन हुए। कवि गोष्ठी में रमाकांत श्रीवास्तव, गजानंद पांडे, सुहास भटनागर, भावना पुरोहित, रवि बैद्य, दर्शन सिंह, डॉक्टर सुरेश कुमार मिश्रा, डॉक्टर अहिल्या मिश्र, गोविंद मिश्र, ज्योति नारायण, डॉक्टर गीता जांगिड़, सूनीता लुल्ला, बाला प्रसाद गोयल, चंद्रलेखा कोठारी, चंद्रप्रकाश दायमा, शिल्पी भटनागर, अवधेश कुमार सिन्हा, प्रवीण प्रणव, सरिता सुराणा जैन ने रचनायें सुनाई।

मंच की ओर से फरीद जी ने इस साहित्यक प्रयास के लिए आशीष दिया। डॉक्टर चित्रांशी ने अध्यक्षीय काव्य पाठ किया। मीना मूथा ने कवि गोष्ठी का संचालन करते हुए आगामी 15 मार्च को साहित्य गरिमा पुरस्कार आयोजन की जानकारी दी । सत्र का आभार शिल्पी भटनागर ने दिया। ज्ञानेश्वर मोहित, सुख मोहन अग्रवाल, भूपेंद्र मिश्रा, कुंज बिहारी गुप्ता, सूरज प्रसाद सोनी, संपत देवी मुरारका, आदि की उपस्थिति रही ।

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