हैदराबाद : बिहार एसोसिएशन के बैनर तले कार्यरत साहित्य एवं शिक्षा वाक्पीठ की त्रैमासिक बैठक रामकोट स्थित महिला नवजीवन मंडल की कीमती सभागार में संपन्न हुई। यह बैठक हिंदी साहित्य के मशहूर रचनाकार रामवृक्ष बेनीपुरी पर केंद्रित थी। मंच का संचालन साहित्यकार अवधेश कुमार सिंह ने किया।

इस बैठक में वाक्पीठ के अध्यक्ष चंद्र मोहन कर्ण के साथ मंच की शोभा बढ़ा रही थी बहुचर्चित स्थानीय हिंदी साहित्यकार एवं बिहार एसोसिएशन के संस्थापक का डॉक्टर अहिल्या मिश्र जो सभा का सभापतित्व भी कह रही थीं। पूरा कार्यक्रम दो सत्रों में संपन्न हुआ। पहला सत्र बेनीपुरी की जीवनी एवं उनकी रचनाओं पर केंद्रित थी।

कार्यक्रम की शुरुआत श्रीमती ज्योति नारायण के निराला रचित सरस्वती वंदना वीणा वादिनी वर दे.. के गायन के साथ हुई। तत्पश्चात चंद्रमोहन कर्ण ने अपने स्वागत भाषण में सर्वप्रथम वाक्पीठ की गतिविधियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने रामवृक्ष बेनीपुरी के व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा करते हुए बताया कि रामवृक्ष बेनीपुरी का असली नाम रामवृक्ष शर्मा था। उनका जन्म 23 दिसंबर 1899 को बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बेनीपुर नामक छोटे से गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम कुलवंत शर्मा था। बचपन में ही माता पिता की मृत्यु हो जाने के कारण इनका जीवन कष्टमय रहा। इनकी पढ़ाई लिखाई ननिहाल में हुई। 16 वर्ष की उम्र में इनका विवाह उमारानी जी से हुआ।

यह भी पढ़ें:

हैदराबाद में बिखरी छठ की छटा, सक्रिय रहे बिहार एसोसिएशन के कार्यकर्ता

बिहार एसोसिएशन हैदराबाद कार्यकारिणी की अहम बैठक सम्पन्न

साल 1921 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के साथ ही देश के स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और इसके कारण 10 वर्ष से ज्यादा उन्हें जेल की यातनाएं सहनी पड़ी। यही से उनका लेखन कार्य शुरू हुआ। यह संपादन कार्य से भी जुड़े रहे। गांधीजी के ‘यंग इंडिया’ का हिंदी रूपांतरण ‘तरुण भारत’ से लेकर किसान मित्र, ‘युवक’, ‘लोक संग्रह’, ‘कर्मवीर’, ‘योगी’, आदि दर्जनभर पत्रिकाओं में संपादन का कार्य किया। साथ ही उपन्यास जीवनी या कहानी संग्रह संस्मरण आदि विधाओं में लगभग 80 पुस्तकों की रचना की। इन्हें कलम का जादूगर भी कहा जाता था। ‘अंबपाली’, ‘सीता की मां’, ‘संघमित्रा’, ‘अमर ज्योति’, ‘नेत्रदान’ आदि नाटकों के अतिरिक्त ‘पतितों के देश में’, ‘माटी की मूर्ति’, ‘चिता के फूल’, ‘गेहूं और गुलाब’, ‘मील के पत्थर’, ‘कैदी की पत्नी’, आदि संस्मरण तथा निबंध उनकी श्रेष्ठ कृतियों में गिनी जाती हैं।

उनकी रचनाएं देश प्रेम से लेकर मानवीय संवेदना की उन सूक्ष्म अनुभूतियों तक को अभिव्यक्ति देती हैं जो हर मनुष्य के जीवन में, जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने उनके लिए कहा था- “स्वर्गीय रामवृक्ष बेनीपुरी केवल साहित्यकार नहीं थे उनके भीतर केवल वही आग नहीं थी जो कलम से निकलकर साहित्य बन जाती है। वे उस आग के भी धनी थे जो राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों को जन्म देती हैं। मूल्यों पर प्रहार करती हैं जो चिंतन को निर्भीक एवं कर्म को तेज बनाती है। बेनीपुरी जी के भीतर बेचैन कवि वे चन्ना चिंतक बेचैन क्रांतिकारी और निर्भीक योद्धा सभी एक साथ निवास करते थे।”

बेनीपुरी जी का देहांत करीब 69 वर्ष की उम्र में 7 सितंबर 1968 को बिहार के मुजफ्फरपुर में हुआ। रामवृक्ष बेनीपुरी जी की रचनाधर्मिता पर श्रीमती ज्योति नारायण ने एक गंभीर आलेख का पाठ किया। उन्होंने बताया कि बेनीपुरी जी ने एक सफल निबंधकार के रूप में खूब नाम कमाया। किंतु उनको जीते जी वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे।

श्रीमती नारायण ने कहा किंतु अफसोस इस बात का है कि ऐसे बिहार के लाल को हमने कुछ नहीं दिया। श्रीमती एकता नारायण, श्रीमती अर्चना झा, डॉ आशा मिश्र, श्री दिलीप कुमार, श्री हरेराम सिंह, श्री उत्तम यादव, डॉ डीसी चौधरी आदि ने भी बेनीपुरी जी पर अपने अपने विचार प्रस्तुत किए।

श्री गुंजन श्री ने बेनीपुरी जी की रचनाओं को कालजई बताते हुए कहा कि वे एक ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने आंदोलनकारी होते हुए भी विपुल साहित्य का निर्माण किया। मंच संचालन करते हुए अनुभवी साहित्यकार अवधेश सिन्हा ने बेनीपुरी जी की साहित्यिक यात्रा का सविस्तार वर्णन किया। उन्होंने यह भी बताया कि एक सच्चे साहित्यकार के अतिरिक्त वे एक सच्चे पति पिता और दादा नाना भी थे।

प्रथम सत्र के समापन पर डॉक्टर अहिल्या मिश्र ने अपने बहुमूल्य दीर्घ वक्तव्य में बेनीपुरी की रचनाओं का जिक्र करते हुए उन्हें कालजई रचनाकार बताया और कहा कि उनकी रचनाओं में जहां एक ओर भाषिक सौंदर्य की प्रचुरता है तो दूसरी ओर उनके निबंध देश भक्ति के से लेकर मानवीय संवेदनाओं को भी अभिव्यक्ति देते हैं। फिर उन्होंने बिहारी युवाओं को संबोधित करते हुए उन्हें साहित्य से जुड़े रहने की अपील भी की।

दूसरे सत्र में एक बहुभाषी कवि सम्मेलन का आयोजन भी था जिसका शुभारंभ गुंजन श्री की मधुर आवाज में उनका ही लिखा एक हिंदी गजल से हुआ। श्री अमर कुमार झा, डॉ आशा मिश्र ‘मुक्ता’, श्री अवधेश कुमार सिन्हा, श्री चंद्रमोहन कर्ण आदि ने अपने-अपने स्वरचित कविताओं का पाठ किया।

अंत में श्रीमती अर्चना झा तथा श्रीमती ज्योति नारायण ने अपने अपने गीतों से दर्शकों को आह्लादित किया। इसके अतिरिक्त बिहार एसोसिएशन के अध्यक्ष मानवेंद्र मिश्र, महासचिव उत्तम कुमार यादव, उपाध्यक्ष हरेराम सिंह आदि ने भी अपनी अपनी बातें रखीं। श्री हरेराम सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

इस गोष्ठी में श्री उत्तम कुमार यादव, श्री हरे राम सिंह, श्री राम विनोद झा, श्री रवींद्र कुमार झा, श्री प्रेम शंकर नारायण, श्री मदन सिंह, श्री जटाधर झा, श्रीमती पिंकी सिंह, श्रीमती हेमा सिंह, श्रीमती मुन्नी सिंह, श्रीमती नूतन, श्री विजय झा, श्री भरत सिंह, आलोक सिंह, श्री बी के मिश्रा एवं ऊपर वर्णित साहित्यकारों के अतिरिक्त स्त्री पुरुष बाल बच्चे मिलाकर करीब 50 लोग उपस्थित थे ।