हैदराबाद : साहित्य सेवा समिति की 54वीं गोष्ठी डॉ. मोहन गुप्ता के आरोग्य अस्पताल, मोजमजाही मार्केट के हॉल हैदराबाद में संपन्न हुई। इस गोष्ठी में कवि, ग़ज़लकार, गीतकार, संवाद लेखक, पटकथाकार, निर्देशक, गुलज़ार के बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला गया। सत्र का संचालन सुनीता लुल्ला ने किया।

मुख्य वक्ता और थिअटर कर्मी सुहास भटनागर ने कहा कि गुलज़ार साहब की रबी पार कृति एक मायने में अब तक की सबसे मार्मिक कृति है। जिसमें विभाजन के दर्द को गहराई से व्यक्त किया गया है। जिसमें एक माता की गोद में दो शिशु होते हैं, उसमें से एक शिशु मर जाता है, लेकिन ग़लती से जो शिशु जीवित रहता है उसे नदी में फेंक दिया जाता है। जीवित शिशु को मरा हुआ समझकर नदी में फेंक दिया जाता है। जहां गिरते समय बच्चा रो पड़ता है। गुलजार ने लिखा है कि वह जो बच्चा फेंका गया था, वह शिशु मैं हूं, गुलज़ार हूं। यह किस्सा सभी पाठकों को दिल की गहराइयों तक भावुक कर जाता है।

यह भी पढ़ें:

साहित्य सेवा समिति की 53 वीं गोष्ठी आयोजित, यह रहा विषय

भक्ति एवं हास्य कवि सम्मेलन सम्पन्न, इन कवियों ने किया कविता का पाठ

कविता पाठ करती हुई शिल्पी भटनगार
कविता पाठ करती हुई शिल्पी भटनगार

सुहास भटनागर ने आगे कहा कि कबड्डी खेल के माध्यम से गुलजार ने विभाजन पर जो कविता लिखी वह भी दिल को छू लेने वाली है। गुलजार को सिनेमा की दुनिया में लाने वाले गीतकार शैलेंद्र रहे। शैलेंद्र बहुत कम लोगों के काम से प्रभावित होते थे, जिनमें से गुलजार एक थे। गुलज़ार का पूरा नाम संपूर्णानंद कालरा है।

गुलजार का गीत गाते हुए गजानन पांडेय
गुलजार का गीत गाते हुए गजानन पांडेय

सुहास भटनागर ने उनकी कुछ नज्में पेश कीं। उनके बेजोड़ साहित्यिक योगदान पर चर्चा की। उनके जीवन के अनछुए पहलुओं को छुआ। सुहास ने कहा कि उनके जीवन का कैनवास और अनुभव इतना बड़ा है कि जितना गहराते जाओ बढ़ता ही चला जाता है। किताबों पर लिखी गई गुलज़ार की मशहूर कविता का पाठ सुहास ने किया। गुलजार अभी भी पचासी साल की आयु में स्वस्थ रहते हैं, जिसका रहस्य है कि वे रोज़ाना टेनिस खेला करते हैं। बहुत सौभाग्य की बात है कि अब उनकी बेटी मेघना गुलजार भी अब सफल निर्देशिका बन चुकी है। वह अपनी और मेघना दोनों की सफलता को एन्जॉय कर रहे हैं। उनकी विरासत जारी रहेगी इससे यही पता चलता है।

कविता पाठ करते हुए दर्शन सिंह
कविता पाठ करते हुए दर्शन सिंह

कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ मोहन गुप्ता ने गुलज़ार के सात गीतों की सस्वर प्रस्तुति दी। डॉ गुप्ता ने कहा एक गीत मैंने स्वयं गुलजार के समक्ष प्रस्तुत किया तो वह डॉ गुप्ता का धन्यवाद देते हुए आश्चर्य में पड़ गए कि मेरे गीत बहुत सुने जाते हैं और मेरे सामने बहुत ही गर्व से लोग गुनगुनाते हैं। यह एक गीतकार की सबसे बड़ी विजय है।

गीत गाते हुए पुरुषोत्तम कडेल
गीत गाते हुए पुरुषोत्तम कडेल

देवीशरण भट्ट ने कहा कि गुलज़ार अपने पिता की सेवा नहीं कर पाए थे जिसका कर्ज उन्होंने निर्देशक बिमल राय की सेवा पूरे समर्पण के साथ करके उतारा। राखी और गुलज़ार का वैवाहिक जीवन केवल तीन ही वर्ष रहा और उस दर्द को गुलजार ने गीतों के माध्यम से पेश किया। पति पत्नी की टूटन गुलजार की फिल्मों कई कोणों से दिखाई देती है। देवीशरण ने कहा कि जब मैं गुलजार से मिला और पूछा कि आप बहुत सादा लिबास पहनते हैं तो गुलजार ने कहा मिट्टी का पुतला हूं, मिट्टी में ही मिल जाना है। तो दिखावा क्यों?

 गोष्ठी में उपस्थित डॉ श्रीलक्ष्मी डॉ वसंता व अन्य
गोष्ठी में उपस्थित डॉ श्रीलक्ष्मी डॉ वसंता व अन्य

देवीशरण ने कहा कि गुलजार को जो ऑस्कर अवॉर्ड मिला वह बस एक राजनीति का हिस्सा भर था, लेकिन गुलजार ऑस्कर से कहीं ऊंचे दर्जे के गीतकार रहे। इस पर किसी को शक नहीं करना चाहिए। देवीशरण ने कहा कि जब गुलजार ने हमने देखी है। इन आँखों की महकती ख़ुशबूगीत लिखा तब उनकी आलोचना हुई थी। आंखों की खुशबू कैसे हो सकती है? लेकिन उस गीत को जनता ने तहेदिल से स्वीकारा यही उसका जवाब है। साहित्य सेवा समिति के निर्वतमान अध्यक्ष एवं उनके समकालीन फिल्म गीतकार डॉ दयाकृष्ण गोयल ने कहा कि गुलजार दो सदियों से लगातार सक्रिय हैं।

मंच पर आसिन सुहास भटनागर, सुनीता लुल्ला और अन्य
मंच पर आसिन सुहास भटनागर, सुनीता लुल्ला और अन्य

गीतकारों और गीतों का जीवन अकसर लंबा नहीं होता लेकिन यह महारत गुलज़ार ने कठिन परिश्रम से हासिल की। नई पीढ़ी के हरेक गीतकारों के गीतों में गुलजार की महक निश्चित रूप से दिखाई देती है। बस गुलजार के गीतों की कॉपी करके ही कई लोग अपना जीवन चला रहे हैं। 2014 से तीन वर्ष तक वह क़रीब पंद्रह फिल्मों में लगातार गीत लिखते रहे, यह उनकी सक्रियता को दर्शाता है। नयी फिल्में जिनमें वीर, युवराज, स्लमडॉग मिलेनियर, अशोका, जब तक है जान, हैदर, झूम बराबर झूम, अक्स हैं… गिनती ख़त्म हो जाएगी लेकिन गुलजार के गीत ख़त्म नहीं होंगे। वे जनप्रिय गीतकार रहे, गंभीर गीतकार रहे, बच्चों के लिए हल्के फुल्के गीत भी लिखे। उनके गीतों में दार्शनिकता बहुतायत से मिल जाया करती है।

समिति के अध्यक्ष नीरज कुमार ने कहा कि मैंने जब गुलजार का साक्षात्कार किया तब गुलजार ने कहा ईश्वर मुझे मृत्यु के बाद भी पांच लोगों के साथ ज़रूर रखे। वे हैं संजीव कुमार, किशोर कुमार, आरडी बर्मन, लताजी और आशाजी। इसी साक्षात्कार में गुलजार से जब पूछा गया कि परिचय फिल्म में जीतेंद्र को नौकरी मिलने के बाद भी मुसाफिर हूं यारों गीत गाया था क्या यह सही था? तो गुलज़ार ने कहा, हां यह गीत नौकरी मिलने से पहले होता तो ठीक होता। जब उनसे पूछा गया कि क्या जीतेंद्र जो चश्मा गुलज़ार की फिल्मों में पहनते थे क्या वह चश्मा गुलज़ार का ही रहा, तो वे मुस्कुराकर चुप हो गये। फिर रुककर कहा हम दोनों के चश्मे का नंबर अलगथा। फ्रेम एक सरीखा था।

नीरज कुमार ने कहा कि गुलजार का पहला गीत मोरा अंग लै ले मोहे श्याम रंग दै दे। इस गीत से मीना कुमारी इतनी प्रभावित हुई कि वे हर बार नहाते समय यही गीत गाती रही। आज भी गुलजार और अभिनेत्री तब्बू रमजान के समय मीना कुमारी के लिए एक दिन रोज़ा ज़रूर रखते हैं। गुलजार के गीत पंचम दा को हमेशा मात्र संवादों की तरह लगा करते थे। और उन गीतों को धुनों में ढालना पंचम दा के लिए बेहद मुश्किल हो जाया करता था। गुलजार ने विशाल भारद्वाज को पंचम दा का आईना बताया है।

सुनीता लुल्ला ने कहा कि गुलज़ार बेहद संजीदा किस्म के इंसान और साहित्यकार रहे हैं। उन्होंने दर्द की टीस की हूबहू सच्चाई से पेश किया है। एक जगह बीड़ी जलइले गीत में उन्होंने काट का निशान छोड़ दे जुमले का इस्तेमाल किया जो बेहद खूबसूरत है, यही गुण सबसे अलग करता है गुलजार को। गुलजार से ही प्रेरणा लेकर मेरे नानाजी फिल्म निर्माता बने और उन्होंने अनुपमा फिल्म बनाई थी। गुलजार के गीत हमेशा अर्थपूर्ण रहे, उनके बच्चों पर लिखे गये हमेशा याद किये जाते हैं। हिंदी सिनेमा में उच्चकोटि के गीत लिखने वालों में गुलजार का नाम अग्रणी रहा है।

जावेद नसीम ने कहा कि एक ही गोष्ठी में गुलजार को समझा नहीं जा सकता है। उनके गीतों और साहित्य पर गहन चर्चा का एक और सत्र रखा जाना चाहिए। जावेद ने गुलजार की तीन नज्में पेश की। इस अवसर पर गजानन पांडेय ने गीत वो शाम कुछ अजीब थी, रवि वैद ने गीत, मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है, पुरुषोत्तम कडेल ने गीत आनेवाला पल जाने वाला है, विजयबाला स्याल ने गीत, मोरा गोरा रंग लै ले, मोहे श्याम रंग दैदे, शिल्पी भटनागर ने गीत, तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी हैरान हूं मैं, नीरज कुमार ने गुलजार के पंद्रह चर्चित गीतों के मुखड़े गाए, दर्शन सिंह ने गीत हमको मन की शक्ति देना मन विजय करे।

सुषमा बैद ने गीत नाम गुम जायेगा चेहरा ये बदल जायेगा। टी वसंता ने तेरे बिना जिंदगी से शिकवा तो नहीं गीत गाया। कवियों में शकील अहमद, चंद्रप्रकाश दायमा, डॉ श्रीलक्ष्मी, तसनीम जौहर, के राजन्ना, लक्ष्मीकांत एम जोशी, डॉ राजीव कुमार सिंह ने गीतों और विचारों से अपना सहयोग दिया। कार्यक्रम की अंतिम रील में रवि वैद ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।