हैदराबाद : कादंबिनी क्लब हैदराबाद के तत्वावधान में हिंदी प्रचार सभा परिसर, नामपल्ली में डॉ मदनदेवी पोकरणा की अध्यक्षता में क्लब की 326वी मासिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। प्रेस विज्ञप्ति में जानकारी देते हुए डॉ अहिल्या मिश्र (क्लब अध्यक्षा) एवं मीना मुथा (कार्यकारी संयोजिका) ने संयुक्त रूप से बताया कि इस अवसर पर प्रथम सत्र में साहित्यकार सत्यप्रसन्न (कोरबा मप्र) मुख्य अतिथि के रूप में तथा रुद्रनाथ मिश्र (राजभाषा प्रबंधक (एनएमडीसी) तथा डॉ अहिल्या मिश्र मंचासीन हुए।

ज्योति नारायण द्वारा सरस्वती वंदना की प्रस्तुति दी गई। डॉ अहिल्या मिश्र ने सभा में उपस्थित सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि क्लब की निरंतरता में नियमित रूप से उपस्थिति दे रहे लेखक, लेखिकाएँ एवं नवांकुरों का सहयोग महत्वपूर्ण है। आज की पीढ़ी हमारे धरोहरों को जाने-पढे-समझे यही प्रथम सत्र का प्रयास रहा है। इसी कड़ी में आज साहित्यकार कुँवर नारायण पर चर्चा होगी।

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संगोष्ठी सत्र का संचालन करते हुए डॉ आशा मिश्र ‘मुक्ता’ ने कहा कि कुँवर नारायण का जन्म 19 सितंबर 1927 को फ़ैज़ाबाद जिला में हुआ। पढ़ाई के उपरांत लेखन में खास सहयोग नहीं मिला। किताबें पढ़ने का शौक था। फिल्म संगीत में रुचि रखते थे। वे मानते थे कि फिल्म और कविताओं की रचना प्रक्रिया में साम्य है। अपनी प्रयोगधर्मिता के कारण उन्होंने साहित्य जगत में अपना विशेष स्थान बनाया। कुँवर नारायण सच्चे देशभक्त थे, देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए कहा था देश अभी भी पूर्णतः स्वाधीन नहीं हुआ है।

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उन्होंने कहा कि संवेदना के साथ जीवन के आलोक को कुँवर ने दर्शाया। साहित्य और राजनीति में गठबंधन वांछनीय नहीं है, यह उनकी सोच रही। चक्रव्यूह, तीसरा सप्तक, आत्मजयी प्रबंध काव्य, अपने सामने आदि प्रमुख कृतियाँ रहीं। साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ, पद्मभूषण आदि सम्मानों से आपको सम्मानित किया गया। अयोध्या, सुबह हो रही थी, कभी पाना मुझे, एक यात्रा के दौरान, लापता का हुलिया आदि कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं। 15 नवंबर 2017 को उनका देहावसान हो गया।

ज्योति नारायण ने अपने प्रपत्र में कहा कि तीसरा सप्तक के कवि कुँवर नारायण पूरी काव्य यात्रा में मानवीय संबंधों को बड़ी सुंदरता से दर्शाते हैं। कविता एक ऐसी दृष्टि है जो संसार को जानने में मदद करती है। कविता आपबीती है, जगबीती है। कुँवर के लेखन की मूल विधा कविता रही है लेकिन गद्य में भी उन्होंने लेखन किया है। भाषा के प्रति सजग और जागरूक रहे। सरल, छोटी कविताएँ निश्चित ही आकर्षक बन पड़ी हैं।

सुनीता लुल्ला ने अयोध्या कविता का पाठ किया। ‘हे राम जीवन एक कटु यथार्थ है और तुम एक महाकाव्य’ इन पंक्तियों के साथ कुछ अंश को सुनाया। डॉ॰ रामा द्विवेदी ने ‘रात मीठी चाँदनी है, मौन की चादर तनी है’ गीत को सस्वर प्रस्तुत किया। मंजुलता जैन ने कहा कि सूचना क्रांति, यातायात के त्वरित साधनों ने पूरे विश्व को बाज़ार बना दिया। वैश्वीकरण की इस नई संस्कृति को कवि ने बाजारीकरण कहा है।

गजानन पाण्डेय ने कहा कि कवि संवेदनशील होता है। स्मृतियों में बंध कर रचनाओं का सृजन करता है। अपने अंदर के इंसान को ईमानदारी से निभाना उनके व्यक्तित्व का गुण था। डॉ गीता जांगिड ने ‘कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने’ कविता की प्रस्तुति दी। भावना पुरोहित ने ‘सुबह हो रही थी’, रवि वैद ने ‘नीली सतह पर’, मीना मुथा ने ‘बीमार नहीं वह’ का पाठ किया।

डॉ अहिल्या मिश्र ने कहा कि कुँवर नारायण मानवीय संबन्धों को गहराई से छूते हैं। अपने लेखनी के माध्यम से वे सर्वश्रेष्ठ कवि थे। आज आशा मिश्र ने पहली बार ऐसे सत्र का संचालन किया है, उनके प्रयास को साधुवाद देती हूँ। साक्षी समाचार के पत्रकार के॰ राजन्ना ने भी सत्र संचालन के लिए बधाई दी।

रुद्रनाथ मिश्र ने हिन्दी दिवस के संदर्भ में कहा कि राजभाषा सरकारी काम-काज की भाषा है। हिंदी घर-घर पहुंचे यह प्रयास होना चाहिए। मौलिक हिंदी पुस्तक लेखक को भी पुरस्कृत किया जाना चाहिए। राजभाषा, साहित्यिक भाषा में बैर नहीं है। भाषा को जबतक रोजी-रोटी से नहीं जोड़ा जाएगा, तरक्की नहीं होगी। सत्यप्रसन्न जी ने कहा कि भारत में 43 फीसदी लोग हिंदी बोलते हैं इसके बावजूद भी हम हिंदी को सर्वमान्य भाषा नहीं बना सके। दुराग्रह रहेगा तो भाषा पल्लवित नहीं होगी।

डॉ॰ मदनदेवी पोकरणा ने अध्यक्षीय टिप्पणी में कहा कि कुँवर नारायण का व्यक्तित्व बहुमुखी था। उनके कार्यों को समझना कठिन जरूर है। मनुष्य परिस्थिति के चक्र में बंद है। कुँवर ने सरल शब्दों में कठिन समस्याओं का समाधान अपनी कविताओं के माध्यम से देने की कोशिश की। आशा मिश्र ने कम समय में इस विशाल व्यक्तित्व को हमारे सामने प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर रुद्रनाथ मिश्र, सत्यप्रसन्न को रजतजयंती पत्रिका भेंट की गई व उन्हें सम्मानित किया गया। डॉ। अहिल्या मिश्र को उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य में क्लब की ओर से पुष्पगुच्छ भेंट किया गया और शुभकामनाएँ दी गईं। मीना मुथा ने सत्र का आभार व्यक्त किया।

दूसरे सत्र में रुद्रनाथ मिश्र की अध्यक्षता में और भंवरलाल उपाध्याय के संचालन में कविगोष्ठी संपन्न हुई। रवि वैद, सत्यप्रसन्न और डॉ अहिल्या मिश्र मंचासीन हुए। मंजुला दूसी, गजानन पाण्डेय, विश्वनाथ पेंदारकर, सत्यनारायण काकड़ा, संतोष रज़ा, लीला बजाज, भावना मयूर पुरोहित, देवा प्रसाद मायला, सरिता सुराणा, सविता सोनी, मिलन श्रीवास्तव, डॉ रामा द्विवेदी, ज्योति नारायण, सुनीता लुल्ला, डॉ गीता जांगिड, आशा मुक्ता, डॉ॰ अहिल्या मिश्र, रवि वैद, सत्यप्रसन्न आदि ने समसामयिक रचनाएँ प्रस्तुत की।

उमा सूरज प्रसाद सोनी, सुखमोहन अग्रवाल, भूपेन्द्र मिश्र की भी उपस्थिति रही। देवा प्रसाद मायला ने सत्र का धन्यवाद दिया। रुद्रनाथ मिश्र ने अध्यक्षीय काव्य पाठ किया।