हैदराबाद : कादंबिनी क्लब हैदराबाद के तत्वावधान में हिन्दी प्रचार सभा परिसर में क्लब की 325वी मासिक गोष्ठी का आयोजन डॉ ऋषभदेव शर्मा की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। प्रेस विज्ञप्ति में जानकारी देते हुए डॉ अहिल्या मिश्र (क्लब अध्यक्षा) एवं मीना मुथा (कार्यकारी संयोजिका) ने बताया कि ज्योति नारायण द्वारा सरस्वती वंदना की प्रस्तुति से प्रथम सत्र का आरंभ हुआ। डॉ ऋषभदेव शर्मा, प्रदीप देवीशरण भट्ट और मदनदेवी पोकरणा मंचासीन हुए। डॉ ऋषभदेव शर्मा ने उपस्थित सदस्यों का स्वागत किया।

संगोष्ठी सत्र का संचालन करते हुए प्रवीण प्रणव ने राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त के जीवनी एवं रचना संसार पर अपनी बात रखते हुए कहा कि मैथिली शरण गुप्त का जन्म मध्य प्रदेश के चिरगाँव [झाँसी] में पिता रामचरण जी और माता काशी देवी के यहाँ 3 अगस्त 1886 को हुआ। इनकी आरंभिक शिक्षा बस प्राथमिक विद्यालय तक ही हुई लेकिन घर पर ही इन्होंने हिन्दी, संस्कृत, बांग्ला आदि भाषाओं की पढ़ाई की। गुप्तजी ने 12 वर्ष की अवस्था में ब्रजभाषा में कविता रचना आरम्भ किया। बाद में वे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आये और तब से खड़ी बोली में ही रचनाएं लिखी और उसके प्रचार प्रसार में लगे रहे। आरंभ में गुप्तजी ने कनकलता, रसिकेन्द्र और विदग्ध हृदय नाम से कविताएं लिखी।

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गुप्त जी का जीवन दुख भरा रहा। 18 वर्ष की आयु में उनके माता-पिता दोनों का देहांत हो गया। उनकी पहली शादी सिर्फ 9 वर्ष की आयु में हुई थी, शादी के 8 वर्ष बाद पत्नी का भी निधन हो गया। दूसरी शादी 18 वर्ष की आयु में हुई लेकिन 10 वर्षों का दांपत्य साथ निभा कर दूसरी पत्नी भी चल बसी। 1917 में तीसरा विवाह हुआ लेकिन इनके सात संतानों को अकाल मृत्यु झेलना पड़ा। इनका आठवाँ पुत्र जीवित बचा। मैथिली शरण गुप्त के साहित्यिक सफर की बात करते हुए प्रवीण प्रणव ने कहा कि उन्होंने लगभग 60 पुस्तकें लिखीं जिनमें साकेत, भारत-भारती, यशोधरा, जयद्रथ वथ, पंचवटी आदि प्रमुख हैं।

महात्मा गांधी ने इन्हें राष्ट्र कवि की उपाधि दी। गुप्तजी की साहित्य सेवाओं के उपलक्ष्य में आगरा विश्वविद्यालय तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने इन्हें डी. लिट. की उपाधि से विभूषित किया। 1953 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इसके बाद 1954 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

इसके अतिरिक्त उन्हें हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कार, 'साकेत' पर 'मंगला प्रसाद पारितोषिक' तथा 'साहित्य वाचस्पति' की उपाधि से भी अलंकृत किया गया। सन् 1952 में उन्हें राज्यसभा के सदस्य के रूप में नामित किया गया और वह इस गरिमामय पद पर सन् 1964 तक यानी कुल 12 वर्षों तक रहे। 12 दिसम्बर 1964 को 79 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

सुनीता लुल्ला ने ‘माँ कह एक कहानी’ कविता की बात करते हुआ कहा कि यह कविता संवादात्मक शैली में है और संवेदनशील है। उन्होंने इस कविता का प्रभावी पाठ किया। ज्योति नारायण ने भारत-भारती की बात करते हुए कहा कि मैथिली शरण गुप्त ने पहले हमारे स्वर्णिम दौर की बात की और फिर वर्तमान समय में जो पतन हुआ है उसके बारे में विस्तार से लिखा। कई दशक पहले लिखी ये रचना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

उन्होंने कहा कि गुप्तजी सिर्फ कवि नहीं थे। उन्होंने कई नाटक लिखे और अनुवाद के क्षेत्र में बहुत काम किया। ज्योति नारायण ने भारत-भारती की कुछ पंक्तियों का पाठ भी किया। गजानन पाण्डेय ने भी भारत-भारती पर अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत-भारती हमें अपनी सभ्यता, अपने स्वर्णिम अतीत पर गर्व करना सिखलाती है लेकिन साथ ही आज के दुर्दशा के कारणों का उल्लेख भी करती है। गुप्तजी ने कभी हार न मान कर आगे बढ़ते रहने की सलाह दी – ‘नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ काम करो’। शिल्पी अग्रवाल ने ‘जयद्रध वध’ से ‘अर्जुन की प्रतिज्ञा’, दर्शन सिंह ने ‘नर हो न निराश करो मन को’, भावना पुरोहित ने ‘पंचवटी’ से कुछ अंश और गीता जांगिड ने ‘मनुष्यता’ कविता का पाठ किया।

प्रदीप देवीशरण भट्ट ने कहा कि मैथिली शरण गुप्त को महात्मा गांधी द्वारा राष्ट्र कवि की उपाधि दी गई। उनकी रचनाओं में स्त्री पात्रों का बहुत ही संवेदनशील चित्रण हुआ है जिसे साकेत, यशोधरा आदि में देखा जा सकता है। उन्होंने ‘सखी वे मुझसे कह कर जाते’ कविता का पाठ किया। डॉ॰ मदनदेवी पोकरणा ने कहा कि हम सबने गुप्तजी की कविताओं को अपने पाठ्यक्रम में पढ़ा है। इनकी रचनाओं में सभी अलंकारों का प्रयोग रहते हुए भी रचनाएँ सरल हैं और याद रह जाती हैं। मैथिली शरण गुप्त जैसे कवियों के वजह से हिन्दी साहित्य का गौरव विश्व भर में बढ़ा है, इनकी कई कविताओं का अँग्रेजी सहित कई अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हुआ।

अध्यक्षीय सम्बोधन में डॉ॰ ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि हालांकि मैथिली शरण गुप्त खुद छंद के मर्मज्ञ थे लेकिन उन्होंने मुक्त छंद कविता का समर्थन किया। अंग्रेजों द्वारा मजदूरों को जबरन गन्ने की खेती के लिए फ़िजी ले जाए जाने के विरोध में लिखी कविता के अंश उन्होंने पढ़ कर सुनाए। डॉ॰ शर्मा ने मैथिली शरण गुप्त के विभिन्न काव्य संकलनों से कवितांश पढ़ कर उनकी रचना प्रक्रिया, देश भक्ति, स्त्री विमर्श, मनुष्यता, कवि कर्म आदि विषयों पर गुप्तजी के विचारों से श्रोताओं को अवगत करवाया। डॉ॰ आशा मिश्र ‘मुक्ता’ ने प्रथम सत्र का धन्यवाद ज्ञापन किया।

दूसरे सत्र में रवि वैद्य की अध्यक्षता में तथा भँवरलाल उपाध्याय के संचालन में कविगोष्ठी हुई। डॉ॰ ऋषभदेव शर्मा और विश्वनाथ पेंढारकर भी मंचासीन हुए। काव्य गोष्ठी में मीना मुथा, प्रदीप देवीशरण भट्ट, विश्वनाथ पेंढारकर, दीपक दीक्षित, विजयबाला स्याल, कंचन वाकलीवाल, सुनीता लुल्ला, प्रवीण प्रणव, गजानन पाण्डेय, कुंजबिहारी गुप्ता, ज्योति नारायण, उमादेवी सोनी, शीतल अग्रवाल, चंद्रप्रकाश दायमा, दर्शन सिंह, आशा मिश्र ‘मुक्ता’, शिव कुमार तिवारी कोहिर, सीताराम माने, पुरुषोत्तम कड़ेल, भावना मयूर पुरोहित, गीता जांगिड, सुषमा वैद्य, जुगल बंग जुगल आदि ने काव्य पाठ किया। रवि वैद्य ने अध्यक्षीय काव्यपाठ किया। मीना मुथा के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।