तेलंगाना चुनावी सर्वे : सोशल मीडिया में ऐसे हो रहे हैं अपनी जीत व दूसरे की हार के दावे

कांसेप्ट फोटो - Sakshi Samachar

हैदराबाद : तेलंगाना चुनाव में सारे दलों के नेता अपनी अपनी सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं और चुनावी रैलियों में दूसरे दलों पर जमकर कीचड़ उछाल रहे हैं। इतना ही चुनावों नए-पुराने और भावी संबंधों को भी लेकर जमकर बयानबाजी हो रही है। कुछ दल तो चुनाव आयोग के निर्देश को धता बताकर अपने पक्ष में सर्वे करवा कर सोशल मीडिया में जीत हार का दावा कर रहे हैं।

तेलंगाना चुनाव में 7 दिसंबर को मतदान होना है और उसके पहले तेलंगाना राष्ट्र समिति और महाकूटमी गठबंधन के साथ साथ भारतीय जनता पार्टी के नेता भी तेलंगाना में येनकेन प्रकारेण सरकार बनाने की फिराक में देखे जा रहे हैं। सबका दावा है कि अबकी बार उनकी सरकार बनने जा रही है, लेकिन सबके मन में जनता की खामोशी का डर भी है। तभी नेता व राजनीतिक दल तमाम तरह के सर्वे को भी मतदान के पहले प्रचारित व प्रसारित कराकर अपनी बढ़त को दिखाने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं।

पिछले दिनों जब निर्वाचन आयोग ने सर्वे से मतदान की निषप्क्षता को प्रभावित होने की आशंका दिखी तो उसने मीडिया से इस तरह के सर्वे न दिखाने या प्रकाशित करने की अपील की। लेकिन राजनीतिक दल अपनी चालबाजी से बाज नहीं आ रहे हैं और सोशल मीडिया के द्वारा अपने पक्ष में सर्वे को प्रचारित प्रसारित कर रहे हैं।

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पल्स ऑफ वोटर के एक सर्वे में टीआरएस को आगे दिखाया जा रहा है और वह सभी दलों को पछाड़ते हुए सरकार बनाते दिख रही है। इतना ही नहीं, इस सर्वे में जिलेवार आंकड़े भी देकर मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश की जा रही है।

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वहीं, दूसरी ओर, एक ऐसे मैसेज वायरल हो रहा है जिसमें कई एजेंसियों के सर्वे को एकसाथ क्लिप बनाकर प्रचारित और प्रसारित किया जा रहा है, जिसमें महाकूटमी सबसे आगे दिख रही है, जबकि टीआरएस को काफी पीछे दिखाया जा रहा है।

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निर्वाचन आयोग को इस तरह के समय समय पर वायरल हो रहे मैसेज पर नजर रखनी चाहिए। यह मतदान के पहले वोटरों को प्रभावित कर सकता है।

अस तरह के मतदान पूर्व सर्वे दिखाने से हारने वाले राजनीतिक दल परेशान होते हैं, जबकि जीत रहे दल के पक्ष में माहौल बन जाता है। खुद कई राजनीतिक दल, वह इसे मतदाता को प्रभावित करने वाला मानते हैं। किसी भी चुनावी सर्वे के परिणाम अगर संबंधित दल के पक्ष में नहीं होते हैं तो वो इस पर अपना विरोध जताना शुरू कर देते हैं।

इसी तरह के आरोप प्रत्यारोप के बाद चुनाव आयोग द्वारा 1999 में एक आदेश जारी कर ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके बाद एक समाचार पत्र ने इसका विरोध किया और कोर्ट में चुनौती दे दी। इसके बाद कोर्ट ने इस पर लगे प्रतिबंध को हटा लिया था। 2009 में भी इसके विरोध में आवाज उठी थी जिसके बाद कानून मंत्रालय ने जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन किया था। इसके बाद यह नियम लागू किया गया कि जब तक चुनावी प्रक्रिया का अंतिम वोट न डल जाए किसी भी चुनावी सर्वे को न तो दिखाया जा सकता है और न ही प्रकाशित किया जा सकता है।

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