हैदराबाद : तेलंगाना विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। तेलंगाना के साथ चार अन्य राज्यों के चुनाव की भी घोषणा हो चुकी है। मगर देश और दुनिया की नजर इस समय तेलंगाना की ओर लगी है। इस बात पर भी चर्चा हो रही है कि मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) का समय से पहले चुनाव कराने का दाव सही साबित होगा या फेल हो जाएगा।

इस बात पर चर्चा के कई कारण बताए जा रहे हैं। एक तो सत्ताधारी तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) ने विधानसभा भंग करके समय से पहले चुनावी जंग में उतरी है। हालांकि विधानसभा भंग करने से पहले मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और राज्यपाल से भी मुलाकात की। केसीआर को अपने काम से ज्यादा ज्योतिष्य पर भरोसा है । इसीलिए पहले मूहुर्त निकाला और शुभ घड़ी देखकर तेलंगाना विधानसभा भंग करवा दी।

विधानसभा भंग

हमारे देश के संविधान के अनुसार पांच साल में एक बार चुनाव होना चाहिए। दूसरी ओर संविधान में यह भी प्रावधान है कि यदि सत्तापक्ष चाहे तो किसी भी समय विधानसभा भंग कर सकती है। विधानसभा भंग होने के छह महीने के भीतर चुनाव आयोग को अधिसूचना जारी करनी होती है। मगर विधानसभा तब ही भंग की जाती है, जब सत्तापक्ष पर अनेक आरोप लगे। सरकार के लिए दल बदलू सिरदर्द बने। जनता का सरकार पर से विश्वास उठ जाए। तभी राज्य के राज्यपाल और मुख्यमंत्री विधानसभा भंग का सहारा ले सकते है। इतना नहीं राज्य के राज्यपाल को भी लगे कि सत्तापक्ष की सरकार अल्पमत में है या संविधान का हनन हो रहा है। ऐसे समय में मुख्यमंत्री या राज्यपाल के पास एक मात्र विकल्प रह जाता है कि विधानसभा भंग किया जाएं।

बहुमत फिर भी भंग

मगर तेलंगाना विधानसभा में टीआरएस को संपूर्ण बहुमत था। टीआरएस सरकार के खिलाफ न ही ऐसा कोई बड़ा आरोप लगा। न ही दल-बदलू की कोई परेशानी थी। जिससे विधानसभा भंग की जाए। फिर भी केसीआर ने सब कुछ ठीक रहते हुए ही विधानसभा को भंग कर दी। केसीआर को इस बात का भरोसा है कि विपक्ष कमजोर है और अभी चुनाव होने से उनको लाभ होगा।

ज्योतिष पर ज्यादा भरोसा

केसीआर को ज्योतिष्य पर पूरा विश्वास है। दूसरी और सबसे मुख्य बात है यह है कि वर्ष 2014 के चुनावी घोषणापत्र में टीआरएस ने जो आश्वासन दिये थे, उनमें से अधिकतर आश्वासन पूरा नहीं किये। इतना ही नहीं, टीआरएस ने जो आश्वासन दिये वो तो पूरे नहीं किये और जो आश्वासन नहीं दिये वो करते गये। वो आश्वासन क्या है, जिसे केसीआर किये यह तेलंगाना की जनता अच्छी तरह से जानती है। ऐसा माना जा रहा था कि लोकसभा चुनाव के साथ चुनाव होने पर लाभहानि का गणित बैठाकर और ज्योतिषियों की बात पर भरोसा करके केसीआर ने समय से पहले चुनाव में जाने का जोखिम लिया।

तेलंगाना आंदोलन का लक्ष्य फेल

तेलंगाना आंदोलन और गठन अनेक अपेक्षाओं की जननी है। देश की आजादी के लिए लड़े गये आंदोलन से भी बड़ा आंदोलन तेलंगाना में लड़ा गया । निजाम निरंकुश शासन के खिलाफ और स्वतंत्र भारत में भी तेलंगाना की जनता ने अपने स्वाभिमान के लिए प्राणों की बाजी लगानी पड़ी। इस प्रकार अनेक उतार-चढ़ाव के बाद तेलंगाना राज्य बना। इस प्रकार बने राज्य के प्रति लोगों को अनेक अपेक्षाएं थी और हैं।

मुख्य रूप से तेलंगाना आंदोलन तीन मुद्दों- जल, निधि और नौकरियों (निल्लु, निधुलु और नियमाकालु) के लिए लड़ी गई। टीआरएस के नेतृत्व में चले इस आंदोलन में लगभग 1200 लोगों ने बलिदान देना पड़ा। पृथक तेलंगाना बनने के बाद केसीआर ने आंदोलन पार्टी (टीआरएस) को राजनीति पार्टी में बदल दिया। इस प्रकार केसीआर के नेतृत्व वाली टीआरएस सरकार अपने लक्ष्य से बहुत दूर होती गई। लोगों की अपेक्षाएं मात्र जैसी की जैसी ही रह गई।

केसीआर को प्रचार पर भरोसा

केसीआर एक चतुर नेता है। केसीआर ने इन पांच साल में लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करने में नाकाम रहे। इन्हें छिपाने के लिए प्रसारण माध्यमों में बड़े-बड़े विज्ञापन दिये। सभाएं आयोजित की और अंत में विधानसभा ही भंग कर दी। इस तरह आय वाले राज्य को कर्ज वाला राज्य बना दिया। तेलंगाना आंदोलन, नेता और आंदोलन से जुड़ा साहित्य संसार के किसी भी देश में नहीं मिलता। ऐसे ऐतिहासिक तेलंगाना में अनेक चेहरे सामने आये। कुछ चेहरे सामने नहीं आये।

गद्दर से उम्मीद

अब इस बार तेलंगाना चुनाव 2018 में एक मुख्य चेहरा सामने आ रहा है। शायद किसी ने भी इस चेहरे की कल्पना तक नहीं की होगी। स्वयं केसीआर ने भी इस चेहर की कल्पना तक नहीं की होगी। वह चेहरा है-गद्दर उर्फ गुम्मडी विट्ठल राव। गद्दर जन नाट्य मंडली के संस्थापक है। गद्दर की रीड़ की हड्डी में अब भी एक बुलेट है। यह बुलेट अप्रैल 1997 में उनके ऊपर किये गये जानलेवा हमले के दौरान लगी थी।

गद्दर एक अच्छे लोक गीतकार है। स्वयं गाते हैं। अभिनय करते हैं। सबसे बड़ी और मुख्य बात यह है कि गद्दर माओवादी विचारधारा अर्थात भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवाद-लेनिवाद और माओवादी विचारधारा से संबंध रखते हैं।

हाल ही गद्दर ने कांग्रेस के प्रमुख सोनिया गांधी और राहुल गांधी से दिल्ली में मुलाकात की है। मुलाकात के दौरान गद्दर की पत्नी और उनका बेटे भी साथ थे। इस अवसर कांग्रेस प्रमुखों ने गद्दर से आने वाले चुनाव में धर्मनिरपेक्ष वाले दलों को समर्थन करने का आग्रह किया है। इन नेताओं ने गद्दर से कांग्रेस पार्टी में शामिल होने का भी आग्रह किया। मगर गद्दर ने किसी भी पार्टी में शामिल होने से इंकार किया। हां, इस अवसर पर गद्दरने कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए चुनावी क्रांति आवश्यक है। अर्थात गद्दर ने चुनाव लड़ने के संकेत मात्र दिये है। इसके लिए उन्होंने कुछ शर्ते भी रखी। अब सभी दल और नागरिक समाज गद्दर को केसीआर के खिलाफ गज्वेल निर्नाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने का आग्रह कर रहे है।

गद्दर vs केसीआर

दूसरी ओर केसीआर के बेटे के. टी. रामाराव के खिलाफ अरुणोदया समाख्या की प्रमुख विमलक्का को चुनाव लड़ने का आग्रह कर रहे है। यह तो वक्त ही बताएगा कि गद्दर और विमलक्का चुनाव लड़ेंगे या नहीं। फिर भी गद्दर और विमलक्का चुनाव लड़ते है तो तेलंगाना चुनावी वातावरण ही बदल जाएगा। क्योंकि केसीआर ने कभी कल्पना तक नहीं है कि गद्दर और विमलक्का चुनावी जंग में कदम रखेंगे और वह भी उनके और उनके बेटे के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे। यदि ऐसा हुआ तो केसीआर को आने वाले चुनाव में जरूर चने चबाने पड़ेंगे।

विमलक्का vs केटीआर

दूसरी ओर तेलंगाना के तेज तर्रार मंत्री के टी रामाराव के खिलाफ अरुणोदय समाख्या की प्रमुख्य विमलक्का को लड़ाने कोशिश जारी है। यदि विमलक्का चुनाव लड़ती है तो केसीआर की तरह ही केटीआर को भी चने चबाने पड़ सकते है। विमलक्का भी गद्दर की तरह की गीत लिखती है। गाती है और अभिनय करती है। तेलंगाना के लोग गद्दर को जितना सम्मान करते है, उतना ही विमलक्का को चाहते है। तेलंगाना में विमलक्का और गद्दर की अपनी एक अलग सी पहचान है। आदर है। सम्मान है। तेलंगाना के लोगों में गद्दर और विमलक्का से बहुत सी उम्मीदे हैं।

- के. राजन्ना