हैदराबाद : भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक भैया दूज का त्यौहार दिवाली के दूसरे दिन मनाया जाता है। भैया दूज पर बहनें भाई के घर जाती हैं और उनकी लंबी आयु की कामना करती हैं। यह त्यौहार कार्तिक मास की द्वितीया को मनाया जाता है। भैया दूज से जुड़ी कई किवदंतियां हैं, जो इस पर्व की महत्ता को दर्शाते हैं।

भैया दूज से जुड़ी कथा

भगवान सूर्य की पत्नी छाया ने दो बच्चों को जन्म दिया, जिन्हें यमुना और यमराज के नाम से जाना गया। दोनों भाई-बहन में बहुत स्नेह था। यमुना अक्सर यमराज से कहा करती थीं कि वह उनके घर आए और भोजन करें, लेकिन यमराज कभी नहीं गए।

एक बार फिर बहन यमुना के आग्रह पर यमराज ने फैसला किया कि वह उनके घर जाएंगे। यमराज ने जिस दिन जाने का फैसला किया, वह कार्तिक मास की द्वितीया तिथि थी। यमराज ने जाते वक्त यमलोक में जितने जीव कष्ट भोग रहे थे, सभी को छोड़ दिया।

यमराज ने बहन यमुना के घर भोजन किया। प्रसन्न होकर उन्होंने यमुना से वर मांगने को कहा। बहन यमुना ने वर मांगते हुए कहा कि आज के दिन जो बहन अपने भाई का आदर-सत्कार करके उसका टीका करे, उसे आपका भय न हो। यमराज ने भी यह वरदार यमुना को दे दिया।

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भैया दूज से जुड़ी परंपरा

भैया दूज को भातृ द्वितीया के नाम से भी जानते हैं। परंपरा के अनुसार, इस दिन बहनें अपने भाई के तेल मलती हैं और उन्हें यमुना स्नान कराती हैं। यमुना स्नान के वक्त बहने यह आशीर्वाद मांगती हैं कि उनके भाई से कभी भी यमराज की मुलाकात न हो। एक अन्य परंपरा के अनुसार, इस दिन गोधन कूटने की प्रथा है। गोबर की मानव मूर्ति बना कर छाती पर ईंट रखकर स्त्रियां उसे मूसलों से तोड़ती हैं।

भैया दूज का महत्व

धार्मिक पुराणों में भैया दूज पर्व का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन बहन के घर भोजन करने का अपना खास महत्व है। भाई बहनों के घर जाते हैं और बहन उनका टीका करके भोजन कराती हैं। भोजन में चावल जरूर शामिल करना चाहिए। इस दिन यमराज तथा यमुना जी के पूजन का भी विशेष महत्व है।

- अनूप कुमार मिश्र, सीनियर सब एडिटर