240वें दिन की पदयात्रा डायरी, क्या चंद्रबाबू के राज में बूढ़ों को भी राहत नहीं मिलेगी?

डिजाइन फोटो - Sakshi Samachar

19.08.2018, रविवार

केन्विन स्कूल परिसर, विशाखापट्टनम जिला

उस दादी और दादा को देखकर मन दुख से भर आया...

बादल भरे मौसम में ही आज मेरी पदयात्रा जारी रही। पल-पल में काले घने बादल छा रहे थे। बारिश होने की संभावना थी। फिर भी लोग पूरे रास्तों में कतारों में खड़े थे। लोगों को किसी प्रकार की तकलीफ न हो इस बात को ध्यान रखते हुए पदयात्रा जारी रखी। बारिश होने से पहले अधिक से अधिक दूरी पूरी करूं इस उद्देश्य से पदयात्रा की।

मेहंदी भरे हाथों से स्वागत

आज पदयात्रा के दौरान लोगों का मेरे प्रति प्रेम देखकर मन आनंद भर आया। तम्मय्यापाले की अनिता, अनंतलक्ष्मी, मंगा, अश्विनी बहनों ने 'जय जगन अन्ना' नारे के हर एक अक्षर को मेहंदी से अपने हथेली पर लिख लिया था। इन बहनों ने मेहंदी भरे हाथों से मेरा स्वागत किया। बहुत अच्छा लगा। मेरे प्रति उनके दिल में जो प्यार है वो देखकर मन प्रफुल्लित हुआ।

यह भी पढ़ें :

वाईएस जगन की 241वें दिन की प्रजा संकल्प यात्रा जारी, कोटवुरट्ला में होगी आमसभा

कैसे पढ़ाऊं

पढ़ाई ही सब कुछ है। पढ़ाई से उच्च शिखरों तक पहुंच सकते हैं। मगर अनेक लोगों ने बताया कि वित्तीय समस्याएं उनकी पढ़ाई में किस तरह से आड़े आई है। पेदबोड्डेपल्ली के पास टूटे हाथ की कोला लक्ष्मी मुझसे आकर मिली। पति का सहयोग नहीं है। उसे एक बेटी है। दसवीं कक्षा में उस बेटी ने अच्छे अंक हासिल किये। मगर अब उस बेटी को उच्च शिक्षा भार बन गया है। बीमार और हाथ टूटी हुई लक्ष्मी बेटी को इंटर कैसे पढ़ाऊं कहकर मुझसे पूछने लगी। चंद्रय्यापालेम गांव के पास लक्ष्मी मंगा आकर मिली। उसने भी वैसी ही दीन गाथा सुनाई। एक साल पहले उसके पति की मौत हो चुकी है। दो बेटियां है। जब पति था, तब दोनों ने रोज-मजदूरी करके दोनों बेटियोंको पढ़ाया था। अब अकेली है। एक दिन गुजरना ही मुश्किल है। कहने लगी कि बेटियों को कैसे पढ़ाऊं?

बहन के सवाल का जवाब नहीं

इसी तरह की एक और घटना है। सुब्बरायुडूपालेम के पास चुक्का लक्ष्मी आकर मुझसे मिली। नौ साल की दिव्यांग बेटी को दिखाते हुए अपनी दुख भरी गाथा सुनाई। उसने बताया कि बेटी का इलाज के बाद अच्छी पढाई कराने के बारे में सोची थी। मगर इलाज के लिए लाखों रुपये खर्च होने की बात बताई गई। मेहनत करे तो ही दो वक्त की रोटी नशीब होती है। उसने सवाल किया कि लाखों रुपये मैं कहां से ले आऊंगी? बेटी को कैसे पढ़ा पाऊंगी? उस बहन के सवाल का जवाब किसी के पास है?

अम्मा ओडी को मिला बल

आसान सी बात नहीं है। अनेक गांवों में इस प्रकार की अनेक दुख भरी गाथाएं सुनने और देखने को मिली है। मेरा संकल्प और सपना है कि पढ़ाई किसी के लिए भी वित्तीय भार न हो। वाईएसआरसीपी की 'अम्मा ओडी' योजना ऐसी माताओं के लिए वरदान साबित होगी मेरे संकल्प को और बल मिला है।

वृद्धाश्रम केवल आश्वासन

सुब्बरायुडूपालेम निवासी कामिरेड्डी लच्चम्मा और एर्रय्या दम्पति की दयनीय गाथा सुनकर मेरा मन दुख से भर आया। दोनों की उम्र 80 साल के ऊपर ही है। एक झोपड़ी में रहते हैं। उस दादा को चलना मुश्किल है। साथ ही मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं है। उस दादी का भी पिछले साल हाथ टूटा था। ये दोनों को किस प्रकार का काम भी नहीं कर पाते। इन दोनों को बराबर दिखाई भी नहीं देता है। एक बेटा था। उसकी भी अस्वस्थता के कारण मौत हो चुकी है। आगे पीछे कोई नहीं है। आस-पास के लोगों की दया से बड़ी मुश्किल से जिंदगी की नाव को आगे ले जा रहे हैं। इस उम्र में इनको कितनी मुश्किले आई है? मुझे देखकर रो रहे इन्हें देख मेरा मन दुख से भर आया। आंखें नम हो गई।

मुख्यमंत्री से मेरा एक सवाल...

आपके चुनावी घोषणापत्र में मुख्य मुद्दे कहकर कुछ आश्वासनों को छापा गया है। इनमें एक आश्वासन यह भी है कि हर निर्वाचन क्षेत्र में एक वृद्धाश्रम स्थापित किया जाएगा। क्या इस आश्वासन के बारे में आपको याद है? सौ-हजार वृद्धाश्रमों की बात भगवान जाने। मगर कम से कम पूरे प्रदेश में एक वृद्धाश्रम को कहीं पर भी स्थापित किया है? क्या चंद्रबाबू नायुडू के राज में बूढ़ों को भी राहत नहीं मिलेगी?

-वाईएस जगन

Advertisement
Back to Top