- एपीआईडीई में संशोधन का प्रस्ताव आज मंत्रीमंडल के सामने

- सभी संशोधनों का होगा अनुमोदन.. तत्काल जारी होगा अध्यादेश

- इनफ्रा अथॉरिटी के अधिकारों में कटौती

- स्विस चैलेंज को अब नहीं होगी कोई रोक-टोक!

साक्षी, हैदराबाद: आंध्रप्रदेश राज्य सरकार आज 'आंध्रप्रदेश इनफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट' (एपीआईडीई) कानून के कई अनुच्छेदों व धाराओं में संशोधन करने वाली है जो कथित तौर पर स्विस चैलेंज की नीति के अमल में रोड़ा बने हुए हैं। मंत्रीमंडल आज कई संशोधनों पर स्वीकृति का मुहर लगाने वाला है। गौरतलब है कि स्विस चैलेंज की नीति पर और एपीआईडीई कानून की धाराओं के खिलाफ राज्य सरकार के रवैये को लेकर उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को कई बार कोसा था। इसी के मद्देनज़र अब राज्य सरकार कानून में ही फेरबदल करने का निर्णय ले ले चुकी है। इस कानून में कौन-कौन से संशोधन किए जाएंगे इस पर 'साक्षी' लगातार रिपोर्टें प्रकाशित करती आ रही है।

यह भी गौरतलब है कि जहां एक ओर राज्य सरकार द्वारा एपीआईडीई कानून की कई धाराओं के साथ छेड़छाड़ को लेकर उच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है तो दूसरी ओर राज्य सरकार इस कानून में संशोधन करने जा रही है। इन कानूनी संशोधनों के जरिए मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायुडू खासतौर पर इनफ्रास्ट्रक्चर अथॉरिटी के अधिकारों में कटौती करने का फैसला ले चुके हैं जिसमें राज्य सरकार के मुख्य सचिव की अगुवाई में कई विभागों के सचिव सदस्य के तौर पर रहते हैं। प्रस्तावित संशोधन न्याय विभाग की जांच के बाद प्रदेश के बुनियाधी ढांचे के विभाग से मुख्यमंत्री के समक्ष लाए गए। इन संशोधनों पर शुक्रवार को ही सीएम की मुहर लग गई थी।

मंगलवार को प्रस्तावित मंत्रीमंडल की बैठक में मसौदा विधेयक लाए जाने का आदेश मुख्यमंत्री ने दिया था। इसका फाईल शनिवार को राज्य सरकार के मुख्य सचिव के पास आ गई। मुख्यमंत्री के अनुमोदन से मुख्य सचिव ने इसे मंत्रीमंडल के एजेंडे में जोड़ने का निर्णय ले लिया। सूत्रों ने बताया कि मंत्रीमंडल का अनुमोदन मिलते ही अध्यादेश जारी करने का फैसला लिया गया है।

ताकि कोई सवाल न करे, न कोई बाधा आए...

एपीआईडीई कानून में इनफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट अथॉरिटी (आईडीए) का खासा महत्व है। इस कानून के जरिए अपनाई जाने वाली हर परियोजना का हर छोटे से छोटा काम भी इस संस्था के जरिए ही किया जाना तय है। किसी परियोजना में अगर काम संतोषजनक तरीके से नहीं चला तो उसकी पुनःसमीक्षा करने का अधिकार भी इस संस्था को प्राप्त है। लेकिन राज्य सरकार के मुखिया सिंगापुर कन्सॉर्श्यम के साथ-साथ खुद को भी अनुचित फायदा पहुंचाने की मंशा से इस इनफ्रा अथॉरिटी को कमज़ोर बना रहे हैं। एपीआईडीई कानून में संशोधन लाकर इस संस्था के अधिकारों में सेंध लगाना चाह रहे हैं। जिन-जिन मुद्दों पर कानून में इनफ्रास्ट्रक्चर अथॉरिटी को व्यापक अधिकार दिए गए हैं, जिन-जिन बातों पर इस अथॉरिटी से संपर्क करने का प्रावधान है, उन सभी जगहों पर इनफ्रा अथॉरिटी का नाम हटाकर ‘सरकार’ शब्द जोड़ा गया।

अधिकारों में कटौती

कौनसी परियोजना महत्वपूर्ण है, इसे तय करने का अधिकार धारा 2(एफएफ) के तहत इनफ्रा अथॉरिटी के पास था। लेकिन अब इस धारा को पूरी तरह हटा दिया गया है। जरूरत के मुताबिक कई क्षेत्रों के विशेषज्ञों के साथ कमेटियों का गठन करने का अधिकार भी अथॉरिटी को था। लेकिन अब संशोधन के जरिए उसे भी खत्म कर दिया गया है। किसी भी परियोजना के मामले में सलाह, सुझाव और सिफारिशें देने का अधिकार अबसे इनफ्रा अथॉरिटी को नहीं रहेगा। इतना ही नहीं, परियोजना के अमल के मामले में सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं या डेवलपर को आदेश जारी करने के अधिकारों से भी अथॅरिटी को वंचित किया जा रहा है। बैठकों का आयोजन करने का अधिकार भी उसे नहीं रहेगा। अथॉरिटी को अधिकार देने वाली धारा 11 और 12 को हटाया जा रहा है। यहां तक कि डेवलपर पर जुर्माना लगाने का अधिकार भी अबसे अथॉरिटी के पास नहीं होगा।

उच्च न्यायालय की आपत्तियों की अवहेलना

दरअसल, सिंगापुर कन्सॉर्श्यम के प्रस्तावों पर प्रतिस्पर्धात्मक प्रस्तावों को आमंत्रित करते हुए सरकार द्वारा जारी अधिसूचना और संशोधित अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर उच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश देते हुए सरकार की नीति को गलत ठहराया। लेकिन सरकार अपनी गलतियों को सुधारने की बजाए उन तमाम धाराओं को कानूनी संशोधन के जरिए हटाने पर तुली हुई है जिन्हें वह अपने हितों के खिलाफ मानती हैं। नए संशोधन के तहत सिर्फ वो लोग ही बोली लगा सकेंगे जो योग्य हैं न कि वो तमाम लोग जो इसमें रुचि रखते हैं। उच्च न्यायालय ने यह भी माना था कि सिंगापुर के प्रस्तावों के मामले में सरकार ने सब कुछ ‘उलटफेर’ कर दिया। जहां प्रस्तावों को सीआरडीए और इनफ्रा अथॉरिटी से होते हुए सरकार के पास जाना था, सरकार ने इसके खिलाफ जाते हुए कन्सॉर्श्यम से प्रस्तावों को स्वीकार किया, जिसकी अदालत ने जमकर आलोचना की। ऐसे में सरकार के मुखिया जो अब तक ये दावे कर रहे थे कि सरकार और सीआरडीए में कोई फर्क नहीं है, अब वो इनफ्रा अथॉरिटी के तमाम अधिकार छीनने लगे हैं जो इन दोनों के बीच में है।