हैदराबाद : देश के लिए कुछ कर गुजरने का दावा करने वालों के लिए मेजर ध्यानचंद एक मिसाल हैं। देशभक्ति का जज्बा उनके अंदर इतना था कि जर्मनी के तानाशाह हिटलर को भी उन्होंने न कह दिया था। हिटलर के प्रस्ताव को ठुकराने के लिए विशेष तौर पर उन्हें याद किया जाता है। तीन दिसंबर को उनकी पुण्यतिथि है, इस मौके पर जानते हैं उनसे जुड़ा यह दिलचस्प वाकया।

हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद अपने करिश्माई खेल के लिए पूरे विश्व में जाने जाते थे। आम हॉकी प्रेमी से लेकर जर्मनी के तानाशाह हिटलर उनके खेल के मुरीद थे। बात साल 1936 की है। बर्लिन ओलंपिक में ध्यानचंद के शानदार प्रदर्शन से प्रभावित होकर हिटलर ने उन्हें डिनर पर आमंत्रित किया।

इस तानाशाह ने उन्हें जर्मन फौज में बड़े पद पर ज्वाइन करने का न्यौता दिया था। हिटलर चाहता था कि ध्यानचंद जर्मनी के लिए हॉकी खेलें। लेकिन ध्यानचंद ने इस ऑफर को सिरे से ठुकरा दिया। उन्होंने कहा, 'हिंदुस्तान ही मेरा वतन है और मैं जिंदगीभर उसी के लिए हॉकी खेलूंगा।'

ध्यानचंद का जीवन

राजपूत परिवार में जन्में ध्यानचंद रूपसिंह नाम के हॉकी खिलाड़ी के बड़े भाई थे। उनके पिता समेश्वर सिंह ब्रिटिश इंडियन आर्मी में थे और आर्मी के लिए हॉकी खेलते थे। उनके पिता के बार बार होने वाले ट्रांस्फर के चलते ध्यानचंद को कक्षा छह के बाद पढाई छोड़नी पड़ी। उनका परिवार आखिर में उत्तर प्रदेश के झांसी में ही बस गया।

ध्यानचंद का करियर

बचपन में ध्यानचंद का हॉकी पर कोई ध्यान नहीं था और उन्हें पहलवानी पसंद थी। 16 साल की उम्र में ध्यानचंद ने भारतीय आर्मी ज्वाइन की। वह चांदनी रात में खेल की प्रेक्टिस करते थे। उस दौर में बाहर लाइट नहीं हुआ करती थी। चांद के इंतजार के कारण ही उनके दोस्त उन्हें चंद पुकारने लगे और उनका नाम ध्यानचंद पड़ा।

1922 से 1926 के बीच ध्यानचंद ने सिर्फ आर्मी हॉकी और रेजिमेंट गेम्स खेले। बाद में उन्हें इंडियन आर्मी टीम के लिए चुन लिया गया जिसे न्यूजीलैंड जाकर खेलना था। इस टीम ने 18 मैच जीते, 2 ड्रा हो गए और एक मैच टीम हार गई। खेल देखने आए सभी दर्शक टीम के प्रशंसक हो गए। भारत लौटते ही ध्यानचंद को लांस नायक बना दिया गया था।

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ध्यानचंद की पुण्यतिथि : खिलाड़ियों का होना चाहिए एकमात्र लक्ष्य सर्वश्रेष्ठ तथा ऐतिहासिक प्रदर्शन

साल 1928 में एमस्टरडैम में हुए ओलंपिक में भारतीय टीम के पहले ही मैच में ध्यानचंद ने ऑस्ट्रिया के खिलाफ 3 गोल दागे। अगले दिन भारत ने बैल्जियम को 9-0 से हराया हालांकि ध्यानचंद ने सिर्फ एक गोल दागा था। अगला मैच भारत ने डेनमार्क के खिलाफ जीता जिसमें कुल 5 में से 3 गोल ध्यानचंद ने किए थे। दो दिन बाद, ध्यानचंद ने स्विट्जर्लैंड के खिलाफ 4 गोल किए और भारतीय टीम को जीत दिलाई।