हैदराबाद : महिला पहलवान के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाने वाली गीता फोगाट आज अपना 29वां जन्मदिन मना रही है। उनका जन्म 15 दिसंबर 1988 को हरियाण के भिवानी के जीले के बिलाली गांव में हुआ था। गीता फोगाट का बचपन बहुत संघर्ष भरा रहा। पर कहते हैं ना कि अगर इरादें मजबूत हो और हौसले बुलंद हो तो दुनियां की कोई भी ताकत आप को आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती है।

ऐसे ही गीता और उसके पिता को भी कोई नहीं रोक पाया और आगे चल कर गीता ने कुश्ती में वो कीर्तिमान स्थापित किये जैसे आज तक किसी भारतीय महिला ने नहीं कायम किये थे। साल 2000 के सिडनी ओलंपिक में जब कर्णम मल्लेश्वरी ने वेट लिफ्टिंग में कांस्य पदक जीता तो वह ओलंपिक में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गयीं। दोहा में आयोजित वर्ष 2015 के एशियन चैंपियनशिप में उन्होंने तीसरा स्थान प्राप्त किया और कांस्य पदक जीता था।

इस जीत का गीता के पिता महावीर सिंह फोगाट पर गहरा असर हुआ उन्हें लगा जब कर्णम मल्लेश्वरी मैडल जीत सकती है तो मेरी बेटियां भी मैडल जीत सकती हैं। और यहीं से उन्हें अपने बेटियों को चैंपियन बनाने की प्रेरणा मिली।

इसके बाद ही उन्होंने गीता-बबीता को पदक जीतने के लिए तैयार करना शुरू कर दिया। महावीर जी ने कसरत से लेकर खाने-पीने हर चीज के नियम बना दिए और गीता-बबीता को पहलवानी के गुर सिखाने लगे

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गीता के पिता 80 के दशक के एक बेहतरीन पहलवान थे और अब वह गीता के लिए एक सख्त कोच भी थे। गीता ने कहा था, "पापा मुझसे अक्सर कहते थे कि तुम जब लड़कों की तरह खाती-पीती हो, तो फिर लड़कों की तरह कुश्ती क्यों नहीं लड़ सकती? इसलिए मुझे कभी नहीं लगा कि मैं पहलवानी नहीं कर सकती।"

गीता का कुश्ती का सफर :

गांव के दंगल से आगे बढ़ते हुए गीता फोगाट ने जिला और राज्य स्तर तक कुश्ती में सभी को पछाड़ा और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के लिए खुद को तैयार करने लगीं। गीता कहती है कि पिता ने हमेशा मुझे इस बात का एहसास कराया कि मैं लड़कों से कम नहीं हूं। गांव वालों को बेटियों का पहलवानी करना कत्तई पसंद नहीं था। लेकिन पापा ने कभी उनकी परवाह नहीं की।”

2009 में राष्ट्रमंडल कुश्ती चैपियनशिप में गीता ने स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद गीता ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। साल 2010 में दिल्ली के राष्ट्रमंडल खेलों में फ्री स्टाइल महिला कुश्ती के 55 किग्रा भार वर्ग में गोल्ड मेडल हासिल किया। और ऐसा करने वाली वो पहली भारतीय महिला बन गयीं। इसके अलावा साल 2012 में इन्होंने एशियन ओलंपिक टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया था।