विश्व हिंदी दिवस: तेलुगू राज्य होने के बावजूद तेलंगाना में हिंदी का बोलबाला क्यों?

Why do people in Telangana prefer and love to speak hindi - Sakshi Samachar

हैदराबाद: देश में हिंदी भाषा के प्रसार-प्रचार के लिए 14 सिंतबर 1949 के दिन संविधान (Constitution) सभा ने हिंदी (Hindi) को राजभाषा (Rajbhasha) का दर्जा दिया था। तब से इस दिन को 'हिंदी दिवस' के तौर पर मनाया जाता है। वहीं 10 जनवरी को 'विश्व हिंदी दिवस' (Vishwa Hindi Diwas) मनाने की परंपरा शुरू की गई। भारत में हिन्दी भाषा का इतिहास इंडो-यूरोपियन भाषा परिवार के इंडो-आर्यन शाखा से जुड़ा है। पूरे विश्व को हिंदी भाषा के जरिए एक सूत्र में बांधने के लिए हर साल 'विश्व हिंदी दिवस' का आयोजन 10 जनवरी को किया जाता है। इसी सिलसिले में हम तेलंगाना में हिंदी की स्थिति को लेकर यहां जानकारी दे रहे हैं। 

दक्षिण भारत के राज्यों में तेलंगाना (Telangana) ही एक ऐसा राज्य है जहां हिंदी में संवाद कायम करना किसी हिंदी भाषी के लिए सर्वाधिक सहज होता है। यहां मूल तेलुगूभाषी हिंदी के नाम पर नाक भौं नहीं सिकोड़ते हैं। तभी तो राज्य के बड़े मीडिया समूह 'साक्षी ग्रुप' ने हिंदी में दक्षिण भारत की केंद्रित खबरों के लिए hindi.sakshi.com शुरू किया। जिसे देशभर के लाखों पाठक पढ़ते हैं। उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों के लोगों में दक्षिण के समाचार हिंदी में जानने की ललक है। तो वहीं दक्षिण के कई राज्यों में हिंदी के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है। लिहाजा 'साक्षी समाचार' के पाठक पूरे देशभर में फैले हैं। साथ ही विदेशों में भी रुचिकर विषयों पर लिखे लेखों को लाखों लोग बड़े चाव से पढ़ते हैं। एक बार फिर हम विषय पर आते हैं कि आखिर तेलुगू राज्य होने के बावजूद तेलंगाना के लोगों में हिंदी के प्रति रुझान क्यों है? 

मुस्लिम शासकों ने तेलंगाना में रखी हिंदी की नींव 

आपको जानकर हैरानी होगी कि तेलंगाना के बड़े हिस्से पर कभी अंग्रेजों का आधिपत्य नहीं रहा। ज्यादातर मुस्लिम शासकों ने ही इलाके में एकछत्र राज किया। इसके बाद पीढी दर पीढी उनके वंशजों ने तेलंगाना की जनता पर शासन किया। मुस्लिम शासकों की राजकीय भाषा उर्दू हुआ करती थी, साथ ही शासन के दस्तावेज उर्दू में ही लिखे जाते थे। उर्दू और हिंदी बोल चाल के लिहाज से काफी मेल खाते हैं। यही वजह है कि तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में हिंदी नहीं समझने वालों की तादाद न के बराबर होती है। यहां तक कि तेलुगू भाषा में कुछेक उर्दू के शब्द भी समाहित हैं।  

तेलंगाना में सरकार ने भले ही तेलुगू को फर्स्ट लैंग्वेज के तौर पर पढ़ाना स्कूलों में अनिवार्य कर दिया हो। बावजूद इसके राष्ट्रभाषा हिंदी की अनदेखी नहीं की गई है। राज्य बोर्ड की दसवीं क्लास में हिंदी को द्वितीय भाषा के तौर पर बच्चे पढ़ते हैं। तेलुगू की बजाय तेलंगाना में बड़ी तादाद में छात्र हिंदी पढ़ने को प्राथमिकता देते हैं। उनकी सोच है कि देश के ज्यादातर राज्य में हिंदी ही आसानी से बोलने और समझने की भाषा है। लिहाजा मातृभाषा तेलुगू के साथ ही हिंदी पढ़नी भी उतनी ही जरूरी है।  

हैदराबाद के बाहर तेलंगाना के बाकी राज्यों में हिंदी की हालत 

हैदराबाद में हिंदी की जिस स्तर पर स्वीकार्यता है, उस हद तक राज्य के बाकी जिलों या फिर ग्रामीण इलाकों में हिंदी को मान्यता नहीं मिल पाई है। हैदराबाद से निकलने के बाद अगर आप तेलंगाना के ग्रामीण इलाकों में जाते हैं, तो वहां पढ़े लिखे लोग ही आपकी हिंदी समझ पाएंगे। इसके अलावा बिजनेस करने वाले भले राज्य के किसी हिस्से में क्यों न हों, व्यापार की बाध्यता के कारण टूटी फूटी हिंदी बोल ही लेते हैं। 

तेलुगू से डब हिंदी फिल्मों का बड़ा बाजार

हैदराबाद में बड़ी संख्या में तेलुगू फिल्में हिंदी में डब होती हैं। इसका करोड़ों का बाजार है। तेलुगू भाषी राज्यों में लोगों का फिल्मों के प्रति गहरा लगाव होता है। वास्तव में तेलुगू भाषा संपन्न विरासत के साथ काफी समृद्ध है। तेलुगू के कई बड़े लेखक और संगीतकार हुए हैं। जिनके बारे में लोग हिंदी में भी पढ़ने और समझने की ललक दिखाते हैं। तभी तो तेलुगू में बनने वाली करीब साठ फीसदी फिल्मों को हिंदी में डब किया जाता है। जिसे उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों में बड़े चाव के साथ देखा जाता है। 

तेलुगूभाषी कृष्णदेव राय की कहानियां हिंदी में लोकप्रिय 

वर्तमान तेलुगू राज्य आंध्र प्रदेश के विजयनगरम के राजा कृष्णदेवराय का साम्राज्य तेलंगाना में भी फैला था। जिनकी कहानियां हिंदी में भी बच्चे बड़े चाव से पढ़ते हैं। कृष्णदेव राय भाषा, कला और संस्कृति के पोषक थे। उनके जमाने में भी हिंदी के विद्वानों को तेलुगू बहुल इलाके में बड़ा आदर मिलता था। हालांकि कृष्णदेवराय की मान्यता थी कि भारत में तेलुगू ही सर्वश्रेष्ठ भाषा है। 

तेलंगाना के इन जिलों में हिंदी का प्रसार 

जिलावार तेलंगाना में हिंदी के प्रचार प्रसार की बात की जाय तो हैदराबाद के अलावा रंगा रेड्डी, नलगौंडा, खम्मम, वरंगल और आदिलाबाद में बड़ी तादाद में लोग हिंदी बोल और समझ लेते हैं। खासकर इन जिलों में अगर कोई हिंदी भाषी जाता है तो उसे भाषा के कारण असहज स्थितियों का सामना नहीं करना होता है। ये अलग बात है कि तेलंगाना में मूल निवासी टूटी फूटी हिंदी बोल पाते हैं। जबकि तेलंगाना के कुछ हिंदी विद्वानों की हिंदी पर पकड़ किसी उत्तर भारतीय से भी कहीं अधिक होती है। 

सत्ता के प्रभाव में अपनी मूल भाषा नहीं छोड़ी

तेलंगाना में करीब 600 सालों तक मुस्लिम शासकों का राज था। इस दौरान उर्दू को प्राथमिकता मिलती रही लेकिन यहां के मूल लोगों ने कभी भी तेलुगू की जगह उर्दू या फिर हिंदी को तरजीह नहीं दी। तेलंगाना में हिंदी और उर्दू ने सहज परिस्थितियों में अपनी जगह बनाई। तेलुगू भाषियों ने कभी भी भाषा के नाम पर जोर जबरदस्ती बर्दाश्त नहीं की। साथ ही यहां भाषा के नाम पर तकरार से भी लोग परहेज करते हैं। तेलुगूभाषियों की सबसे बड़ी खासियत है कि वो राष्ट्रभाषा के नाते हिंदी का कभी अनादर करना स्वीकार नहीं किया। जरूरत के मुताबिक तेलुगू के साथ इन्होंने हमेशा हिंदी बोलने की पूरी कोशिश की है। 

'तेलुगू सीखें हिंदी सिखाएं'

तेलंगाना में उत्तर भारतीय मूल के लोग बड़ी तादाद में बसे हुए हैं। खासकर हैदराबाद में तो इनकी कई पीढ़ियां गुजर चुकी हैं। इन हिंदी भाषियों ने अपना संगठन भी बना लिया है। इनसे बात करने पर ये खुलकर बताते हैं कि भाषा के लिहाज से हैदराबाद या फिर आस पास के जिलों में इन्हें कभी दिक्कत नहीं हुई। मजे की बात ये कि जमीन जायदाद के साथ बसे उत्तर भारतीयों ने तेलंगाना की मूल भाषा तेलुगू भी सीख ली है और ये फर्राटे के साथ यहां के लोगों के साथ संवाद स्थापित कर पाते हैं। उत्तर भारतीय मूल के लोग जो तंलागाना में रह रहे हैं उन्होंने एक नारा दिया है, 'तेलुगू सीखें हिंदी सिखाएं!'। मतलब ये कि हिंदी भाषी भी खुले मन से तेलुगू को स्वीकार कर रहे हैं। साथ ही इनकी कोशिश है कि तेलंगाना में रहने वाले लोग जिनका राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति झुकाव है, वो हिंदी भी जरूर सीखें। 

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