Independence day 2020 : आजाद भारत में भी देश का यह हिस्सा रहा गुलामी का शिकार

Independence day 2020 Special Story  - Sakshi Samachar

आजादी के बाद भी हैदराबाद पर था निजामों का कब्जा

भारतीय संघ में शामिल होने का निजाम कर रहे थे विरोध

नई दिल्ली : पूरा देश आजादी के रंग में रंगा हुआ है। कोरोना संकट के बीच इस बार स्वतंत्रता दिवस बेहद सादगी से मनाया जा रहा है, बावजूद इसके लोगों में उत्साह कम नहीं है। घरों पर ही रहकर लोग आजादी का जश्न मनाएंगे। हम आपके लिए ऐसी दिलचस्प जानकारी लाए हैं, जिसे आप घर बैठे जरूर जानना चाहेंगे। साल 1947 में 15 अगस्त जब पूरा देश गुलामी से निकलकर आजादी की सांस ले रहा था तो कुछ हिस्सों में लोग अभी भी भारत सरकार के अधीन नहीं आए थे। इनमें तेलंगाना भी शामिल था। जब देश आजाद हुआ था तब ये प्रांत निजाम के तानाशाही शासन के अधीन थे।

15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तब यहां पर तेलंगाना विद्रोह आंदोलन (तेलंगना वेट्टी चाकिरि उद्यमम, तेलंगाना बंधुआ श्रम आंदोलन, वैकल्पिक तेलंगना राज्य रैतु पोराटम, तेलंगाना किसान सशस्त्र संघर्ष जैसे अनेक आंदोलन) चल रहे थे। ये आंदोलन तेलंगाना क्षेत्र के सामंती प्रभुओं के खिलाफ एक विद्रोह था और बाद में यह विद्रोह 1946 और 1951 के बीच हैदराबाद राज्य के खिलाफ लड़ा गया।

हैदराबाद स्टेट के खिलाफ जब लड़ाई जारी थी तब कम्युनिस्ट आश्चर्यचकित थे, क्योंकि हर कोई अपने प्रयासों को देखने के लिए जमीन के विद्रोह और वितरण के आयोजन में सफल रहा। भारत की आजादी की घोषणा के बाद भी निजाम के साथ कम्युनिस्टों ने अपना अभियान बढ़ाया और कहा कि भारतीय संघ का ध्वज हैदराबाद के लोगों का झंडा भी था, जो सत्तारूढ़ असफ जाही की इच्छाओं के खिलाफ था और बहुमत यह लोगों के भी खिलाफ भी।

घटनाक्रम

विद्रोही सामंती प्रभुओं के खिलाफ 1946 में विद्रोह शुरू हुआ और लगभग चार हजार गांवों के अलावा वरंगल और बीदर जिलों में तेजी से फैल गया। किसानों और मजदूरों ने स्थानीय सामंती मकान मालिकों (जगीरदार और देशमुख) के खिलाफ विद्रोह किया। ये जगीरदार और देशमुख गांवों पर शासन कर रहे थे। जिन्हें 'सम्स्थान' कहा जाता था। इन सम्स्थानों को ज्यादातर रेड्डी और वेलामा द्वारा शासित किया जाता था। इन्हें 'दोरलु' के नाम से जाना जाता था।

ये दोरलु गांव में समुदायों पर शासन करते और कर (राजस्व) संग्रह करने में कामयाब रहे और उस क्षेत्र में लगभग पूरी भूमि पर इनका ही स्वामित्व हुआ करता था। राजधानी हैदराबाद को छोड़कर निजाम के इन क्षेत्रों पर नियंत्रण था।

रजक (धोबी) जाति से संबंधित चाकली एइलम्मा ने ज़मीनदार रामचंद्र रेड्डी के खिलाफ विद्रोह किया, क्योंकि जमीनदार न उसकी चार एकड़ भूमि लेने की कोशिश की थी। एइलम्मा के विद्रोह ने अनेक लोगों को आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।

दूसरी ओर, कम्युनिस्टों के नेतृत्व में चलाया गया आंदोलन सामंती प्रभुओं से तीन हजार से ज्यादा गांव लेने में सफल रहा और लगभग दस लाख एकड़ कृषि भूमि को भूमिहीन किसानों में वितरित की गई। सामंती निजी सेनाओं से लड़ने वाले इस संघर्ष में लगभग चार हजार किसानों ने अपनी जान गंवा दी।

बाद में यह संघर्ष निजाम उस्मान अली खान व असिफ़ जह VII के खिलाफ एक लड़ाई बन गई। शुरुआती दौर में आंदोलन का लक्ष्य बंधुआ श्रम के नाम पर इन सामंती प्रभुओं द्वारा अवैध और शोषण को दूर करना था। मगर बाद में सबसे गंभीर मांग उन किसानों के सभी ऋणों के लेखन के लिए थी जो सामंती प्रभुओं द्वारा छेड़छाड़ कर लिखी की गई थी।

निजाम का विरोध

1945 के बाद हैदराबाद के प्रशासन में असफल होने के साथ, निजाम मुस्लिम अभिजात वर्ग के दबाव में आ गये और रजाकार आंदोलन शुरू कर दिया। साथ ही निजाम हैदराबाद राज्य को भारतीय यूनियन में लाने के लिए भारत सरकार के प्रयासों का विरोध कर रहे थे।

सरकार ने सितंबर 1948 में हैदराबाद राज्य को भारतीय संघ में जोड़ने के लिए सेना भेजी थी। कम्युनिस्ट पार्टी ने पहले ही किसानों को रजाकारों के खिलाफ गुरिल्ला रणनीति का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया था और लगभग तीन हजार गांव (लगभग 41,000 वर्ग किमी) किसान शासन के अधीन आये थे। मकान मालिकों को या तो मार दिया गया था या बाहर निकाला गया था और भूमि को फिर से वितरित किया गया था।

आंदोलन को सबसे आगे ले जाने वाले प्रसिद्ध व्यक्तियों में रवि नारायण रेड्डी, मद्दीकायला ओमकर, मददिकाला लक्ष्मी ओमकर, पुच्चलपल्ली सुंदरय्या, पिल्लीपल्ली पापीरेड्डी, सुद्दाला हनमंतु, चंड्रा राजेश्वर राव, बोम्मगानि धर्म भिक्षम, मखदूम मोहिउद्दीन, हसन नासिर, मंत्राला आदि रेड्डी, भीमरेड्डी नरसिम्हा रेड्डी, नंद्यला श्रीनिवास रेड्डी, मल्लु वेंकट नरसिम्हा रेड्डी, लंकाला राघव रेड्डी, कुकुडल जंगारेड्डी, अरुथला रामचंद्र रेड्डी, कृष्णा मूर्ति, अरुथुला कमलादेवी और बिकुमल्ला सत्यम। इनके द्वारा किया आंदोलन का हिंसक चरण 1951 में समाप्त हुआ, जब तेलंगाना क्षेत्र में आखिरी गुरिल्ला दल समाप्त हो गये थे।

हैदराबाद राज्य पर कब्जा

विद्रोह और बाद में की गई पुलिस कार्रवाई ने 17 सितंबर 1948 को निजाम के शासन से हैदराबाद राज्य पर कब्जा कर लिया। निजाम शासन को आखिर भारतीय संघ में विलय कर दिया गया। इस प्रक्रिया में हजारों लोगों ने अपनी जिंदगी खो दी। हजारों सैनिक की भी इस आंदोलन के दौरान शहीद हुए। मारे गये लोगों में अधिकतर मुसलमान थे।

सुंदरलाल की रिपोर्ट के मुताबिक जिसे आधिकारिक तौर पर जारी किए गए अनुमानों के अनुसार तब करीब पचास हजार मुसलमानों की हत्या हुई थी। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी, हालांकि आज कमज़ोर है, फिर भी तेलंगाना के जमीनी स्तर पर मजबूत समर्थन बरकरार रखती है। पुच्चलपल्ली सुंदरय्या स्वतंत्र भारत में विपक्ष के पहले नेता बने।

अंतिम निजाम असफ जाह

अंतिम निजाम असफ जाह VII को 26 जनवरी 1950 से 31 अक्टूबर 1956 तक हैदराबाद राज्य के राजप्रमुख बनाया गया था। साल 1952 के चुनावों से हैदराबाद राज्य में कांग्रेस पार्टी की जीत हुई। साल1952 से 1956 तक बर्गुला रामकृष्ण राव हैदराबाद राज्य के पहले मुख्यमंत्री थे। 1956 में हैदराबाद राज्य आंध्र प्रदेश बनाने के लिए आंध्र प्रदेश के साथ विलय कर दिया गया था। साल 2014 में तेलंगाना राज्य की स्थापना की गई। अब इसे फिर से आंध्र प्रदेश से अलग कर दिया गया था।

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