सामान्य जनता में स्वतंत्रता की प्रखर चाह सबसे जरूरी : डॉ. हेडगेवार

The most important thing is desire for freedom in the general public : Dr. Hedgewar - Sakshi Samachar

डॉ. हेडगेवार का है आज जन्मदिन

बचपन में लोग कहते थे केशव

जीवन का एकमात्र ध्येय था भारत का स्वातंत्र्य 

अंग्रेज सरकार ने भाषणबंदी का नियम किया लागू 

उनकी भूमिका को लेकर आलोचक उठाते रहे सवाल

हैदराबाद: "यह न भूलें कि ताकत केवल संगठन के जरिए ही आती है इसलिए हम सभी का यह कर्तव्य है कि हम इसे मजबूत बनाने के लिए हरसंभव प्रयास करें।", बेशक ये पंक्तियां डॉ. हेडगेवार ने कभी हिंदुओं से कही थीं, लेकिन मौजूदा दौर में यह पूरी दुनिया पर सटीक बैठती है। बेशक ये पंक्तियां डॉ. हेडगेवार ने कभी हिंदुओं से कही थीं, लेकिन मौजूदा दौर में यह पूरी दुनिया का मार्गप्रशस्त करती दिखती है। कोरोना को हराने और उससे उबरने के लिए आज समूची दुनिया को एक संगठन की तरह काम करना होगा। तभी इस गंभीर बीमारी से हम पार पा सकेंगे।

डॉ. हेडगेवार का है आज जन्मदिन
बहरहाल, क्या आप जानते हैं कि इतनी गंभीर बात को बडे ही सहज अंदाज में न सिर्फ कहने बल्कि उसे अपने जीवन का मूल मंत्र बना लेने वाले 'भारत मां के इस सपूत' डॉ. हेडगेवार का आज जन्मदिन है! जी हां, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल 1889 को नागपुर स्थित एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। मूल रूप से तेलंगाना के कांडकुर्ती गांव निवासी पिता बलिराम पंत हेडगेवार और मां रेवती ने महज 13 साल की उम्र में हेडगेवार और उनके दो बडे भाइयों को अकेला छोड परलोक गमन कर लिया। जिस तरह आज कोरोना का प्रकोप है, ठीक उसी तरह उन दिनों प्लेग का था। प्लेज ने जब माता-पिता दोनों को छीन लिया तो हेडगेवार के पालन-पोषण और शिक्षा की सारी जिम्मेदारी उनके दोनों बड़े भाइयों महादेव पंत और सीताराम पंत ने अपने कंधे पर ले ली। 

बचपन में लोग कहते थे केशव
डॉ. हेडगेवार, जिन्हें बचपन में लोग केशव कहकर पुकारते थे, उनकी कहानी की शुरुआत होती है साल 1897 से, जब भारत में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया के शासन के 60 साल पूरे होने पर ब्रिटिश सरकार खुशियां मना रही थी। स्कूलों में मिठाइयां बांटी जा रही थी लेकिन आठ साल के नन्हे केशव ने मिठाई मिलने पर उसे खाया नहीं बल्कि फेंक दिया। उन्होंने कहा कि अंग्रेज हमें मिठाई खिलाकर गुलामी की जंजीरों में और कसना चाहते हैं। साल 1925 में 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' की नींव रखने वाले डॉक्टर हेडगेवार बचपन से क्रांतिकारी स्वभाव के थे। पुणे में जब वे हाई स्कूल की पढ़ाई कर रहे थे तो 'वंदेमातरम्' गाने की वजह से उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था क्योंकि ऐसा करना उन दिनों ब्रिटिश सरकार के सर्कुलर का उल्लंघन था। मैट्रिक के बाद उन्हें साल 1910 में मेडिकल की पढ़ाई के लिए कलकत्ता भेज दिया गया।

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जीवन का एकमात्र ध्येय था भारत का स्वातंत्र्य 
1914 में परीक्षा देने के बाद साल भर की अप्रेंटिसशिप की और साल 1915 में वह डॉक्टर के रूप में नागपुर लौट आए। शासकीय सेवा में प्रवेश के लिए या अपना अस्पताल खोलकर पैसा कमाने के लिये वे डॉक्टर बने ही नहीं थे। भारत का स्वातंत्र्य यही उनके जीवन का एकमात्र ध्येय था। उनका मानना था कि महज दो-चार अंग्रेज अधिकारियों की हत्या होने से अंग्रेज यहां से भागनेवाले नहीं हैं। इसके लिए जरूरत है कि कोई बड़ा आंदोलन करने की और ऐसे आंदोलन की सफलता के लिये आवश्यकता है व्यापक जनसमर्थन की। क्रांतिकारियों की क्रियाकलापों में इसका अभाव था। वह हमेशा कहते थे कि सामान्य जनता में जब तक स्वतंत्रता की प्रखर चाह का निर्माण नहीं होगा, तब तक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती। इससे पहले स्वतंत्रता अगर मिल भी गई तो टिकेगी नहीं। 

अंग्रेज सरकार ने भाषणबंदी का नियम किया लागू 
यही वजह रही कि नागपुर लौटने के बाद गहन विचार कर उन्होंने हर दूसरी चीज से खुद को दूर कर लिया और कांग्रेस के जन-आंदोलन में पूरी ताकत से शामिल हो गए। यह वर्ष था 1916 का, जब लोकमान्य तिलक जी मंडाले के छह वर्षों का कारावास समाप्त कर मु़क़्त हो चुके थे। "स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और उसे मैं पाकर ही रहूंगा।", उनकी इस घोषणा से जनमानस में चेतना की एक प्रबल लहर का निर्माण हुआ। जल्दी ही डॉ. हेडगेवार ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ उग्र भाषण देना शुरू कर दिया। यह सब देखकर अंग्रेज सरकार ने उन पर भाषणबंदी का नियम लागू कर दिया लेकिन वह नहीं माने और अपना भाषणक्रम चालू ही रखा। फिर अंग्रेज़ सरकार ने उन पर मामला दर्ज किया और उन्हें एक वर्ष के सश्रम कारावास की सज़ा सुना दी। 12 जुलाई 1922 को वह कारागृह से मुक्त हुए।

विजयादशमी के दिन की संघ की स्थापना
इसके बाद साल 1925 में विजयादशमी के दिन उन्होंने संघ की स्थापना की। फिर, साल 1936 में इसकी महिला इकाई बनाई गई। उनके शुरुआती अनुयायियों में भइयाजी दानी, बाबासाहेब आप्टे, बालासाहेब देवरस और मधुकर राव भागवत थे। संघ की नींव महाराष्ट्र के नागपुर में रखी गई और धीरे-धीरे इसका प्रभाव आसपास के शहरों तक बढ़ने लगा। डॉ हेडगेवार वहीं नहीं रूके। उन्होंने दूसरे प्रांतों का दौरा कर अपने उद्देश्य को लेकर कई भाषण दिए और लोगों को जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने अपने स्वयंसेवकों को काशी और लखनऊ तक भेजा ताकि संघ के लक्ष्यों की जानकारी वहां तक पहुंचाई जा सके। साथ ही वहां शाखाएं लगाई जा सकें। आलोचकों का कहना है कि साल 1925 में संघ की नींव रखने के बाद डॉ हेडगेवार ने उसे ब्रिटिश विरोधी आंदोलनों से दूर रखने का फ़ैसला किया।

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उनकी भूमिका को लेकर आलोचक उठाते रहे सवाल
हालांकि, देश के स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका को लेकर आलोचक सवाल उठाते रहे हैं। जाने-माने प्रोफ़ेसर और इतिहास के जानकार शम्सुल इस्लाम के मुताबिक डॉक्टर हेडगेवार दो बार जेल गए। एक बार साल 1920 में ख़िलाफ़त आंदोलन को लेकर भड़काऊ भाषण देने की वजह से, जो कांग्रेस के आह्वान पर था और दूसरी बार 1930 में नमक आंदोलन के दौरान। उन्होंने संघ से जुड़े लोगों को कहा कि वे इस आंदोलन में हिस्सा नहीं लेंगे लेकिन वे ख़ुद इसमें हिस्सा लेने के लिए गए। इस्लाम की मानें तो कांग्रेस के जो कार्यकर्ता वहां आते थे, उन्हें आरएसएस से जोड़ने की कोशिश में वे वहां गए थे। इसका नतीजा यह हुआ कि साल 1933 में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी ने प्रस्ताव पास किया कि आरएसएस, हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग, तीनों से कोई भी कांग्रेसी किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं रखेगा।

भाषणों में करते थे हिंदू संगठन की बात
संघ वृक्ष के बीज के अनुसार, डॉ केशव राव हेडगेवार किताब में लिखा गया है कि संघ की स्थापना करने के बाद डॉक्टर साहब अपने भाषणों में हिंदू संगठन की बात करते थे। वहीं, उनके भाषणों में सरकार पर सीधी टिप्पणी न के बराबर होती थी।ये भी कहा जाता है कि दिसंबर 1929 में जब कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज प्रस्ताव पारित किया और सभी से 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने की अपील की तो डॉ. हेडगेवार ने आरएसएस शाखाओं को इस दिन भगवा ध्वज फहराकर ये दिन मनाने के लिए कहा।

कांग्रेस का राष्ट्रवाद है उथला राष्ट्रवाद
आलोचकों के मुताबिक डॉक्टर हेडगेवार ने कई बार कहा कि कांग्रेस का राष्ट्रवाद उथला राष्ट्रवाद है। उनके मुताबिक जब कांग्रेस की ओर से पूर्ण स्वराज का ऐलान किया गया और कहा गया कि 26 जनवरी 1930 को तिरंगा लहराकर स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा, तब इसका विरोध करते हुए हेडगेवार ने सारी शाखाओं को आदेश दिया कि 26 जनवरी को भगवा ध्वज को सलामी दें और हर व्यक्ति को बताएं कि इसका मतलब क्या है और ये ज़रूरी क्यों है? कहा तो यह भी जाता है कि महात्मा गांधी ने जब ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ सत्याग्रह शुरू किया तो डॉ. हेडगेवार के इसमें शामिल होने की बात कही जाती है लेकिन व्यक्तिगत रूप से, न कि आरएसएस के रूप में। इसका कारण यह बताया जाता है कि वह चाहते थे कि संघ किसी भी तरह के राजनीतिक घटनाक्रम से ख़ुद को दूर रखे।

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21 जून 1940 को डॉक्टरजी का देहावसान
दूसरी ओर, संघ कहता है कि साल 1940 में वीर सावरकर ने पुणे प्रांतिक बैठक को संबोधित किया और श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने डॉक्टरजी यानि डॉ. हेडगेवार (लोग उन्हें डॉक्टरजी कहकर भी पुकारते थे) से मिलकर बंगाल के हिंदुओं की दुर्दशा पर चिंता व्यक्त की। 9 जून को डॉक्टरजी ने नागपुर तृतीय वर्ष के विद्यार्थियों को उनके शिक्षा समापन पर संबोधित किया था। कहा जाता है कि 19 जून को सुभाषचंद्र बोस स्वयं डॉ. हेडगेवार से मिलने पहुंचे, क्योंकि वह बीमार थे। इसके एक दिन बाद यानि 21 जून 1940 को डॉक्टरजी का देहावसान हो गया। हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि संघ में उनकी सोच आज भी जिंदा है। 

आज दुनिया का सबसे बड़ा संगठन 
आलोचकों के मुताबिक 14 अगस्त 1947 को संघ के मुखपत्र 'ऑर्गेनाइज़र' में लिखा गया कि जो लोग किस्मत के दांव से सत्ता में आ पहुंचे हैं, वे हिंदुओं के हाथ में तिरंगा थमा दें, लेकिन इस देश के हिंदू को ये मान्य नहीं होगा। इसमें तीन रंग हैं और तीन रंग मनहूस होते हैं और झंडे को मानना देश के मनोविज्ञान पर बुरा असर डालेगा। हालांकि, इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह मुद्दा कितने ही नेताओं के लिए चर्चा में बने रहने का कारण रहा, जिसके बल पर उन्होंने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकीं और आज भी सेंक रहे हैं। बहरहाल, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि डॉ. हेडगेवार ने जिस संघ की नींव रखी थी, आज वह दुनिया का सबसे बड़ा संगठन बन चुका है। यही नहीं, देश में लंबे समय बाद पूर्ण बहुमत लेकर सत्ता की कुर्सी में बैठने वाली पार्टी बीजेपी इसी संघ से जुड़ी है।

- सुषमाश्री (वरिष्ठ उप-संपादक)

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