सोशल मीडिया कंटेंट की निगरानी केंद्र सरकार के अधीन, लेखकों निर्देशकों ने जताई आपत्तियां

Online News Media, Including Social Sites, Now Under Government Control - Sakshi Samachar

सोशल मीडिया और OTT कंटेन्ट पर सरकार का नियंत्रण 

फिल्म और मीडिया से जुड़े लोगों ने जताया विरोध 

नई दिल्ली: दुनिया में भारत पहला देश बना है जहां इंटरनेट पर जारी सामग्री के नियमन सीधे सूचना मंत्रालय के अधीन होंगे। जाहिर है भारत ही नहीं विश्वभर में सोशल मीडिया और वेब पोर्टल लोगों का नजरिया बदलने में सफल रहे हैं, तभी तो तमाम पार्टियां ट्रेडिशनल फोरम छोड़कर आईटी सेल बनाने लगी है। अब न्यूज चैनलों को पैसे खिलाकर परोक्ष रूप से चुनाव प्रचार के दिन लदने लगे हैं। राजनीतिक पार्टियां सीधे तौर पर सोशल मीडिया के जरिए आम जनता की नब्ज पकड़ रही है। 

आज अधिकांश आबादी किसी न किसी तरीके से डिजिटल माध्यम से जुड़े हुए हैं। इनमें बड़ी संख्या में लोग अपनी तरफ से सोशल मीडिया पर कंटेन्ट डालने में भी पीछे नहीं रहते। यूट्यूबर और ब्लॉगिंग के जरिए पढ़े लिखे युवा कमाई भी कर रहे हैं। पारंपरिक टेलीविजन को छोड़ लोगों का नेटफ्लिक्स, अमेजन या जी 5 के प्रति गहरा लगाव देखने को मिल रहा है। लिहाजा आपके लिए जाननी जरूरी है कि अब 357वें संशोधन अधिनियम 2020  के तहत डिजिटल कंटेन्ट का नियमन सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन है। इस बारे में केंद्र सरकार के कैबिनेट सचिवालय की ओर से अधिसूचना भी जारी कर दी गई है। Allocation of Business Rules, 1961 के  Second Schedule of the Rules में 22A और 22B जोड़े गए हैं। 22A के तहत ऑनलाइन विषय वस्तु प्रदाताओं द्वारा उपलब्ध कराए गए फिल्म और दृश्य-श्रव्य कार्यक्रम आते हैं। जबकि 22B के अंतर्गत ऑनलाइन प्लेटफ़ार्म पर समाचार और समसामयिक विषयवस्तु शामिल है। 

सरकार के फैसले पर जाहिर हुई आपत्तियां 

लेखकों और निर्देशकों के एक तबके ने बुधवार को कहा कि ओटीटी (ओवर द टॉप) प्लेटफॉर्म को सूचना और प्रसारण मंत्रालय के दायरे में लाए जाने के निर्णय से वैश्विक स्तर पर भारतीय कंटेंट क्रिएटरों को नुकसान हो सकता है तथा इससे निर्माताओं और यहां तक कि दर्शकों की रचनात्मक एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम और डिज्नी + हॉटस्टार जैसे ओटीटी मंचों तथा ऑनलाइन समाचार एवं समसामयिक मामलों से जुड़ी सामग्री को मंत्रालय के दायरे में लाए जाने के फैसले पर निराशा व्यक्त करने वालों में हंसल मेहता और रीमा कागती जैसे फिल्मकार शामिल हैं। यद्यपि, एम एक्स प्लेयर के मुख्य कार्याधिकारी करण बेदी ने कहा कि वह स्व-नियमन की दिशा में प्रयासों को क्रियान्वित करने के लिए मंत्रालय के साथ काम करने को लेकर आशान्वित हैं। बेदी ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘जिम्मेदार कंटेंट क्रिएटर की तरह हम चाहते हैं कि यह कदम न सिर्फ प्रसारित की जा रही सामग्री की प्रकृति का संज्ञान ले, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि हम इस तेजी से बढ़ते क्षेत्र में रचनात्मकता की रक्षा कर सकें।'' कई अन्य बड़े ओटीटी मंचों ने संपर्क करने पर इस घटनाक्रम पर टिप्पणी करने से इनकार किया।

संबंधित कदम सूचना और प्रसारण मंत्रालय को ऑनलाइन मंचों पर समाचार, दृश्य-श्रव्य सामग्री और फिल्मों से संबंधित नीतियों के नियमन की शक्तियां प्रदान करता है। मंत्रिमंडल सचिवालय द्वारा मंगलवार रात राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर वाली जारी की गई अधिसूचना के अनुसार फैसले से भारत सरकार (कार्य आवंटन नियम) 1961 में संशोधन हो गया है और यह तत्काल प्रभाव से लागू है। मेहता ने सरकार के कदम पर निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नियंत्रण ठीक नहीं है। वहीं, कागती ने कहा कि हालांकि सेंसरशिप के बारे में कुछ खास नहीं कहा गया है, सिवाय इसके कि यह सूचना और प्रसारण मंत्रालय के दायरे में आ गया है। यह देखने के लिए इंतजार करना चाहिए कि वास्तव में इसका क्या तात्पर्य है। निर्देशक एवं लेखक अंशुमन ने फैसले को ‘‘अस्वीकार्य'' बताया और दर्शकों तथा क्रिएटरों से इसे चुनौती देने की अपील की।

सरकार के फैसले से नाराजगी क्यों? 

सरकार के इस फैसले से समाज के एक तबके को लगता है कि अगर वो मोदी या फिर सत्ताधारी बीजेपी के खिलाफ लिखेंगे तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। लोगों को आशंका है कि सरकार इसमें भेदभाव की नीति अपना सकती है। सरकार विरोधी कंटेंट को हटाने का आदेश दिया जा सकता है, साथ ही विपक्षी पार्टियों के खिलाफ लिखने वालों को खुली छूट मिल सकती है। जबकि एक वर्ग सरकार के इस फैसले का समर्थन करता है। उनकी माने तो सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ झूठे आरोपों के खिलाफ कार्रवाई होनी ही चाहिए। साथ ही सॉफ्ट पोर्न और धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाले कंटेन्ट के खिलाफ भी पाबंदियां आयद करना जरूरी है। 

फैसले का आम जनता पर क्या होगा असर?

सरकार के इस फैसले पर OTT के कुछ भड़काऊ कंटेंट के ऊपर पांबदियां लग सकती है। अभी तक OTT पर सेंसरशिप नहीं होने के चलते वो कुछ भी दिखा पाते थे। यही आकर्षण दर्शकों को OTT की तरफ खींच भी रहा था। जबकि आने वाले समय में ये मनमानी नहीं चलेगी। सेक्रेड गेम्स के एडल्ट सीन्स और मिर्जापुर जैसी सीरीज से गालियां निकालनी होंगी। ये जरूर है कि दर्शकों का एक वर्ग मानता है कि अगर सीरीज से इस तरह कंटेन्ट हटा दिया जाए तो फिर मजा ही खराब हो जाएगा।

सोशल मीडिया पर लगाम क्यों ?

लंबे समय से मांग की जा रही थी कि सोशल मीडिया पर लगाम के लिए रेगुलेटरी अथॉरिटी बनाई जाय। वहीं सरकार ने तो सारा डिजीटल मीडिया नियामक अपने ही अधीन कर लिया। लोगों की दलील है कि सरकार अगर एडल्ट कंटेन्ट पर लगाम के लिए ऐसा करना चाह रही थी, तो इसके लिए पहले ही पुख्ता कानून उपलब्ध हैं। साइबर कानूनों के तहत एडल्ट कन्टेंट को लेकर ऑल्ट बालाजी समेत सात ओटीटी प्लेटफार्म और दो पोर्न वेबसाइट के खिलाफ महाराष्ट्र साइबर डिपार्टमेंट ने आईपीसी की धारा 292 के साथ आईटी एक्ट की धारा 67, 67 (ए) और महिलाओं की गलत छवि पेश करने के आरोप में संबंधित कानून की धारा 3, 4 के तहत FIR दर्ज की है। इससे पहले (OTT) प्लेटफॉर्म पर निगरानी और नियंत्रण के लिए उचित व्यवस्था बनाए जाने की मांग को लेकर  वकील शशांक शेखर झा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। याचिका में कहा गया था कि OTT प्लेटफार्म कंपनियों ने स्व नियमन के लिए जो संस्था बनाई है, वो ठीक से काम नहीं कर रही। लिहाजा अदालत सरकार को सेंट्रल बोर्ड फ़ॉर रेग्युलेशन एंड मॉनिटरिंग ऑफ ऑनलाइन वीडियो कंटेंट्स (CBRMOBC) नाम की एक स्वायत्त संस्था के गठन का आदेश दे। 

OTT के क्षेत्र में भारत बड़ा बाजार 

 माना जाता है कि भारत 2024 तक OTT प्लेटफॉर्म का छठा सबसे बड़ा बाजार बन जाएगा। देश में सस्ते डाटा के चलते बड़ी संख्या में लोग OTT प्लेटफॉर्म से जुड़ रहे हैं। 28.6% CAGR (सालाना विकास दर ) के साथ 2024 तक भारत 2.9 बिलियन $ यानी करीब 22 हजार करोड़ का बाजार होगा। सिनेमा हॉल की रिवेन्यू में सालाना 2.6% की कमी और स्ट्रीमिंग वीडियो की रिवेन्यू में 30.7% इजाफा देखने को मिल रहा है। 

जानकारों की क्या है राय?

सरकार के ताजा फैसले की कुछ जानकार आलोचना भी कर रहे हैं। उनके मुताबिक वीडियो स्ट्रीमिंग इंडस्ट्री फूड इंडस्ट्री की तर्ज पर काम करनी चाहिए। जिस तरह फूड पैकेट पर कन्टेंट का फुल डिस्कलोजर होता है , उससे ग्राहक को खरीदने को लेकर राय बनाने में मदद मिलती है। उसी तरह स्ट्रीमिंग में फुल कन्टेंट डिस्क्लोजर की व्यवस्था होनी चाहिए। ऐसी सरकारी एजेंसी का गठन  जो डिस्क्लोजर कंटेंट तैयार करे और इस बारे में नियम बनाये। इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और मशीन लर्निंग जैसे आधुनिक तकनीकों के जरिये फेसबुक और यूट्यूब कंटेंट को फिल्टर किया जा सकता है। 

सरकार की अधिसूचना का मतलब क्या है ?

तत्काल प्रभाव से लागू आदेश के मुताबिक अब नेटफ्लिक्स पर अगर फिर से पाताललोक जैसा सीरियल प्रसारित होते हैं, तो  अब केंद्र सरकार अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए स्ट्रीमिंग को रोकने का आदेश जारी कर सकती है। अमेजन प्राइम पर स्वरा भाष्कर की वेबसीरिज रसभरी जैसे कंटेंट को सेंसर बोर्ड सर्टिफिकेशन के नियमों के तहत लाया जा सकता है। 3 इरॉस नाउ ने नवरात्रि को लेकर रणवीर सिंह, सलमान खान और कैटरीना कैफ की तस्वीरों के साथ कुछ मीम्स तैयार किए, इन पर कंगना रनौत ने आपत्ति जताई थी। अब ऐसे कंटेंट को लेकर भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय आदेश जारी कर सकती है। 

कुल मिलाकर कहा जाय तो ओटीटी से सोशल मीडिया पर पूरी तरह सरकार का नियंत्रण होगा। अहम ये कि सरकार ने ये फैसला बिना संसद में बहस और राज्यों के सलाह मशविरे के लिया है। जिसको  लेकर आने वाले समय में विरोध जरूर देखने को मिलेगा। विपक्षी पार्टियां केंद्र सरकार पर मनमानी का आरोप लगा रही हैं, इनके मुताबिक सरकार ने नोटबंदी की तो आरबीआई की नहीं सुनी, जीएसटी लेकर आए तो कारोबारियों से बात नहीं की। यहां तक कि लॉकडाउन लगाते समय भी किसी से नहीं पूछा। अब इसी तर्ज पर सोशल मीडिया के नियमन को लेकर इतना बड़ा फैसला सही नहीं है। 
 

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