संक्रांति 2021 : तेलंगाना-आंध्र में कई दिनों तक रहती है संक्रांति की धूम, अलग-अलग नाम से है पहचान

Makar Sankranti Continues for many days in Andhra Telangana Know special facts - Sakshi Samachar

तेलंगाना में मकर संक्रांति को 'जुजुबी पंडु उत्सव '

आंध्र प्रदेश मेें 'पेद्दा पंडुगा', चार दिन का उत्सव

महाराष्ट्र में मकर संक्रांति, तीन दिन का उत्सव

कर्नाटक में संक्रांति, चार दिन का उत्सव

हैदराबाद : तेलंगाना (Telangana) , आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh), महाराष्ट्र (Maharashtra) और कर्नाटक (Karnataka) में मकर संक्रांति (Makar Sankranti) को अलग अलग नाम से जाना जाता है। तेलंगाना में इसे 'रेगी पंडु उत्सव'(Jujube Festival), आंध्र प्रदेश में 'पेद्दा पंडुगा' (Pedda Panduga) , महाराष्ट्र में 'मकर संक्रांति' और कर्नाटक में 'संक्रांति' कहा जाता है। इसके अलावा देश के अन्य राज्यों में तमिलनाडू (Tamil Nadu) में 'पोंगल' (Pongal), असम 'मग बिहू'(Maga Bihu), मध्य और उत्तर भारत में 'माघ मेला'(Magha Mela), पश्चिम में 'मकर संक्रांत'(Makar Sankrant), केरल में 'मागरा वलकु' (Magara Valaku) कहा जाता है। 

तेलंगाना में 'रेगी पंडु उत्सव'

तेलंगाना में मकर संक्रांति को 'जुजुबी पंडु उत्सव ' के नाम से भी जाना जाता है। इस साल 13, 14, और 15 जनवरी को मनाया जाएगा। मकर संक्रांति का उत्सव तीन दिन चलता है। पहले दिन 'भोगी पंडुगा' का दिन होता है। इस दिन भोगी मंटा का आयोजन किया जाता है। इस उत्सव में पुरानी और बेकार की चीजों का दहन किया जाता है। घर के आंगन में गोबर से जमीन पर गोल दायरे में लिपा-पोती की जाती है। सफेद रंगोली (मुग्गु) का दायरा बनाया जाता है। दायरे के अंदर घर में मौजूद पुरानी और बेकार की चीजों को इकट्ठा किया जाता है। तत्पश्चात आग लगाई जाती है। इस उत्सव को मनाने का उद्देश्य यह होता है कि पुरानी रंजिश और बेकार के झगड़े को भूलकर सहयोग की भावना से जीवन जीना
होता है। बूरी आदतों को छोड़ने का निश्चय किया जाता है। इस पारंपारिक उत्सव के दौरान बच्चों को बुरी नजर से बचाने का प्रतिक समझकर 'रेगी पंडु' (Jujube Fruit) खिलाया जाता है।

उत्सव के दूसरे दिन 'मकर संक्रांति' मनाई जाती  है। इस दिन ज्यादातर लोग सुबह ब्रह्म मुहूर्त पर नींद से जाग जाते हैं। स्नान करने के बाद नये कपड़े पहनते हैं भगवान के दर्शन करने मंदिर जाते हैं। मंदिर में भगवान की पूजा अर्चना करने के बाद घऱ लौटते हैं। केले के पत्तों पर पारंपारिक भोजन करते हैं। भोजन में चकिनालु, अप्पालु और आरिसेलु शामिल होते हैं। इसे बनाने का काम दो सप्ताह पहले ही शुरू हो जाता है। चावल और रवा के आटे से बने चकिनालु, अप्पालु और आरिसेलु को धूप में सुखाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन इसे तेल में भुना जाता है। पारंपारिक भोजन के दौरान अतिथियों को आमंत्रित किया जाता है। उन्हें बदलते मौसम के साथ स्वादिष्ट और पोषक आहार खिलाया जाता है। 

मकर संक्रांति उत्सव के तीसरे दिन 'कनुमा पंडुगा' मनाया जाता है। इस दिन कुछ लोग दूध से बने खाद्यपदार्थ खाते हैं। अतिथियों को कद्दू देते हैं। इसके अलावा ब्रांज के छोटे बर्तन भी दिये जाते हैं। तेलंगाना में कुछ लोग मांसाहार लेते हैं। पतंगबाजी करते हैं। पतंगबाजी का बड़े पैमाने पर लुत्फ उठाते हैं। आपको बता दें कि हैदराबाद में 'काइट फेस्टिवल' मनाया जाता है। यहां के परेड़ ग्राउंड में बड़े  ही उत्साह और उमंग के साथ पतंगबाजी का आयोजन किया जाता है। इस उत्सव का उद्घाटन मान्यवर प्रमुख अतिथि के हाथों किया जाता है। देश-विदेश के लोग यहां पर पतंगबाजी करने आते हैं। रंग-बिरंगे पतंग आसमान में उड़ते देखे जा सकते हैं। इस दौरान कुछ कटी पतंगें आसमान हवा में लहराते नीचे की ओर आती हैं। उसे लपकने के लिए बच्चे और युवा दौड़ते हैं। किसी के हाथ में कटी पतंग आती है तो किसी के हाथ में मांजा आता है। तो कभी-कभी कटी पतंग को पकड़ने के चक्कर में हाथ कुछ नहीं लगता शिकायत कटी पतंग के टूकड़ों के। 

आंध्र प्रदेश में 'पेद्दा पंडुगा'
आंध्र प्रदेश में 'पेद्दा पंडुगा' चार दिन मनाया जाता है। पहले दिन 'भोगी', दूसरे दिन 'मकर संक्रांति', तीसरे दिन 'कनुमा' और चौथे दिन मुकुनुमा उत्सव मनाया जाता है।  इस साल यह उत्सव 13,14, 15 और 16 जनवरी को मनाया जाएगा। इस उत्सव को मनाने के लिए आंध्र प्रदेश से अन्य राज्यों में गये लोग वापस अपने गांव लौटते हैं। हालांकि आंध्र प्रदेश में इस उत्सव को अहम माना जाता है। इसे 'पेद्दा पंडुगा' कहा जाता है। उत्सव के पहले दिन लोग नये कपड़े पहन कर भोगी मंटा का आयोजन करते हैं। पुराने और बेकार की चीजों के साथ पुराने कपड़ों का दहन किया जाता है। लोगों का मानना है कि पुरानी और बुरी आदतों का त्याग कर नये कल्याण और विकास की आदतों को अपनाने का प्रतिक 'भोगी
मंटा' है।

उत्सव के दूसरे दिन मकर संक्रांति मनाई जाती है। इस दिन अलसुबह नींद से जाग कर लोग स्नान करते हैं। नये कपड़े पहन कर मंदिर जाते है। भगवान की पूजा-अर्चना करते हैं। घर लौट कर स्वादिष्ट और पोषक भोजन करते हैं। अतिथियों को भी आमंत्रित किया जाता है। अतिथियों की आवभगत में कोई कमी नहीं रखी जाती। कुछ देर बाद शुरू होती है पतंगबाजी। कुछ लोग मुर्गो की लड़ाई का आयोजन करते थे। हाल ही में आंध्र प्रदेश सरकार ने मुर्गों की लड़ाई पर पाबंदी लगाई है। इसके बावजूद कुछ असामाजिक तत्व कुछ जगहों पर मुर्गों की लड़ाई का आयोजन करते ही रहते हैं। हालांकि यह परंपरा बहुत पहले चलते आ रही थी। 

मकर संक्राति उत्सव के तीसरे दिन होता है कनुमा। इस दिन कुछ लोग विशेष मेहमानों को आमंत्रित करते हैं। स्वादिष्ट भोजन और पौष्टिक भोजन में चकिनालु, अप्पालु, दूध से बने खाद्य पदार्थ और आरसेलु मेहमानों को परोसे जाते हैं। कुछ लोग मांसाहार लेते हैं। इस दिन शराब की दुकानों में अधिक भीड़ होती है। फिलहाल प्रदेश में कोरोना का संक्रमण का माहौल होने से सामाजिक दूरी के साथ नियमावली का पालन करना जरूरी है। 

'मुकुनुमा' उत्सव का चौथा दिन होता है। इस उत्सव को तेलंगाना से ज्यादा आंध्र प्रदेश में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। इस दिन भगवान सूर्यदेव की पूजा-अर्चना की जाती है। उत्सव के पहले दिन के 'भोगी' और चौथे दिन न के 'मुकुनुमा' में काफी समानता होती है। इस साल मुकुनुमा, 16 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन खान-पान पर अधिक ध्यान दिया जाता है। इस दिन बहुत ही कम लोग भगवान की पूजा-अर्चना करते हैं। उत्सव का आखिरी दिन होने से लोग मौजमस्ती करते हैं। लोग अपने पुराने दोस्तों और दूर-दराज के रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं। 

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महाराष्ट्र में मकर संक्रांति

महाराष्ट्र में मकर संक्रांति उत्सव ऊर्जा के साधन माना जाता है। इस उत्सव में किसानों के अहम होता है। किसान बड़े ही उत्साह और उमंग के साथ उत्सव मनाते हैं। इस राज्य में भी अन्य राज्यों की तरह तीन दिन मनाया जाता है। उत्सव के पहले दिन भोगी उत्सव मनाया जाता है। इस दिन लोग अलसुबह नींद से जाग जाते हैं। ब्रह्म स्नान कर मंदिर जाते हैं। भगवान की पूजा-अर्चना करने के बाद दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं। इस दिन हर किसी के घर में गुड़, तील और मूंगफली से बनी रोटियां बनाई जाती है। इसके अलावा बगारा चावल, शेव, मिर्ची, आलू की सब्जी, पुरियां बनाई जाती है। कुछ लोग हलुवा बनाते हैं। किसान स्वादिष्ट भोजन करने के बाद खेत चले जाते हैं। इससे पहले गाय-भैंस और बैलों को पुरियां खिलाई जाती है। किसान खेत जाने के बाद हल और अन्य कृषि औजार की पूजा करते हैं। विशेष कर मेड पर झाड़ के नीचे स्थापित देवता की पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन बैलों को कुछ समय के लिए हल को जोता जाता है। 

मकर संक्रांति उत्सव का दूसरा दिन अहम होता है। सनातन लोग ब्रह्म मुहूर्त पर जाग जाते हैं और स्नान कर भगवान की पूजा-अर्चना करते रहते हैं। सूरज की पहली किरण के निकलते ही भगवान सूर्य की प्रार्थना करते हैं। भगवान से लोगों और परिवार के सदस्यों की समृद्धि की कामना करते हैं। पूजा-अर्चना के बाद किसान परिवार के लोग खेत जाते हैं। इससे पहले मिट्टी से बने नये घड़े में गुड़ मिलाकर चावल बनाते हैं। खाना पकाये गये घड़े में दीपक जलाकर नई टोकरी में सिर पर रखकर खेत जाते हैं। टोकरे में नये कपड़े, मौसमी फल, गन्ना, दूध, मिट्टी से बना छोटा घड़ा रखा होता है। खेत जाने के बाद फसल की सहायता से छोटी झोपड़ी बनाई जाती है। झोपड़ी में पांच छोटे पत्थर रखकर
जलाभिषेक और दूग्धाभिषेक किया जाता है। पत्थर को हल्दी-कुंकुम लगाकर पूजा-अर्चना की जाती है। नई फसल और मौसमी फलों का भोग चढ़ाया जाता है। तत्पश्चात उपली में आंच लगाकर मिट्टी से बने छोटे घड़े में दूध रखकर उबाला जाता है। धीमी आंच पर दूध धीरे-धीरे उबलने लगता है। कुछ देर बाद दूध को उबाल आता है और वह एक दिशा में बहने लगता है। इस दिशा पर सालभर का भविष्य निर्भर करता है। यदि दूध का उबाल उत्तर की दिशा में होता है शुभ माना जाता है। दक्षिण दिशा को छोड़ पूर्व दिशा में बहता है तो मध्यम फल माना जाता है। यदि पश्चिम दिशा में उबाल होता है तो समृद्धि में गिरावट का प्रतिक माना जाता है। यह महाराष्ट्र के किसान परिवार की मान्यता है। 

उत्सव के तीसरे दिन 'कर' दिवस होता है। इस दिन कोई किसी झगड़ा या विवाद करने से परहेज करता है। इस दिन कुछ लोग दानपुण्य करते हैं। दिन भर एक-दूसरे के घर जाकर 'वाण' (छोटे विशेष तरह से बनाये गये बर्तन) देते हैं। वाण में तील-गुड़ होता है। इसे देने से दुख दूर होता है और पुण्य मिलता है। ऐसी यहां की मान्यता है। कुछ काले तील का दान करते हैं। इस दान से शनि की साड़ेसती का प्रभाव गहरा नहीं होने की मान्यता है। लोग पुराने दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलते हैं। एक-दूसरे को मकर संक्रांति की शुभकामनाएं देते हैं। इस दिन मांसाहार और शराब को तवज्जों नहीं दी जाती। बहुत ही कम लोग होते हैं जो इस दिन मांसाहार और शराब पीते हैं। 

कर्नाटक में संक्रांति

कर्नाटक में मकर संक्रांति उत्सव लोगों की मान्यता के अनुसार चार दिन मनाया जाता है। संक्रांति उत्सव की शुरूआत येलवत से शुरू होती है। इस दिन किसान परिवार सुबह खेत जाता है। खेत में जवारी फसल के बीच छोटी झोपड़ी बनाई जाती है। झोपड़ी में देवी लक्ष्मी की फोटो रखकर सामने पांच पत्थर रखे जाते हैं। जलाभिषेक और दूग्धाभिषेक के बाद हल्दी-कुमकुम लगाया जाता है। ब्लाउज के पीस में 'ओटी' (वोडी) भरी जाती है। इसमें खोपरा, गुड़, चावल, बेर, अमरुद होता है। इसके अलावा छोटे लोटे में ज्वार से बना अंबिल और पाणी भरे होते हैं। धूपबत्ती जला कर पुष्पार्जना की जाती है। इसके बाद मिट्टी से बने छोटे लोटे में दूध उबाला जाता है। दूध उबल कर किसी एक दिशा में बहने लगता। दिशा के
फल के आधार पर भविष्य जानने की मान्यता है। भगवान से लोगों और परिवार के सदस्यों की समृद्धी की कामना की जाती है। तत्पश्चात कांदा-भात, सजगुरा, खट्टा खाना खाते हैं। 

उत्सव के दूसरे दिन भगवान की पूजा अर्चना के बाद पांच सुहागनों की 'ओटी' (आंचल में खोपरा, चावल, हल्दी-कुमकुम बांधा जाता है) भरी जाती है। पांच मटके रखे जाते हैं। इन मटकों में तील, गुड़, बेर, फुल, हल्दी-कुमकुम रखा जाता है। पांचो सुहागनों को स्वादिष्ट और पोषक भोजन परोसा जाता है। भोजन में चने की हरी सब्जी, कोनोले, दूध से बने पदार्थ शामिल होते हैं। 

मकर संक्रांति के दिन मंदिर में भगवान की पूजा-अर्चना के बाद दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलकर शुभकामनाएं देते हैं। इस दिन भी पांच सुहागनों को भोजन परोसते हैं। इसे पहले उन्हें हल्दी-कुमकुम का टीका लगाते हैं। उन्हें 'वाण' के रूप में उपहार देते हैं। मान्यता है कि इस दिन दान-पुण्य करना चाहिए। इससे हमारा स्वास्थ्य और समृद्धी में चार चांद लग जाते हैं। 

उत्सव के चौथे दिन 'कर' मनाई जाती है। इस दिन ज्यादातर लोग शाकाहारी भोजन ही लेते हैं। भोजन में गुड़ से बने व्यंजन बनाये जाते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य ठंड के मौसम में अपने शरीर का तापमान बनाये रखना होता है। इस दिन सुहागनों को पिले रंग का 'वाण' (उपहार) दिया जाता है। साथ में एक-एक ब्लाउज का पीस भी दिया जाता है। उन्हें भगवान के सामने चढ़ाये गये नैवेद्य में थोड़ा सा निकाल कर दिया जाता है। 

आपको बता दें कि मकर संक्रांति पर्व हर साल 14 तारीख को बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। देश के अधिकतम राज्यों में संक्रांति उत्सव तीन मनाया जाता है। पहला दिन भोगी, दूसरा दिन संक्रांति और तीसरे दिन कनुमा होता है। 

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