बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं Col. Zahid Siddiquie, सैनिक, लेखक, मोटिवेटर और गाइड का रखते हैं हुनर

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बचपन से लुभाती थी सेना की परेड

11 किताबें लिख चुके हैं कर्नल सिद्दीकी

चमक-दमक के पीछे छिपा होता है कठोर संघर्ष

हमारे देश के मशहूर शायर निदा फाजली (Nida Fazli) का मशहूर शेर है... "हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिस को भी देखना हो कई बार देखना..." कुछ ऐसी ही शख्सियत है, बहुमुखी प्रतिभा के धनी कर्नल एमजेडयू सिद्दीकी (Col. Zahid Siddiquie) की।

कर्नल एमजेडयू सिद्दीकी, सेना मेडल (Sena Medal), 74 आर्मर्ड रेजिमेंट (74 Armoured Regiment) । कर्नल का पूरा नाम मोहम्मद जाहिद उल्लाह सिद्दीकी (Col. Mohd. Zahid Ullah Siddiquie) है। राष्ट्रपति द्वारा 'सेना मेडल' से नवाजे जा चुके कर्नल सिद्दीकी ने 74 आर्मर्ड रेजिमेंट से जुड़कर 38 वर्षों तक भारतीय सेना (Indian Army) की सेवा की।

कर्नल जब आर्मी में थे, तब इन्होंने कई स्टाफ और कमांडर्स की सेना में भर्ती की। नॉर्थ ईस्ट में आतंकवादियों से लड़ते हुए जीत हासिल की। इसके लिए राष्ट्रपति महोदय ने इन्हें 'सेना मेडल' से नवाजा। इस दौरान इन्हें गोली लगी। वह बुरी तरह से घायल भी हुए। पर इन्होंने कभी हार नहीं मानी। रेगिस्तान हो, जंगल हो या फिर हाई एल्टीट्यूड, अलग-अलग सेक्टर्स में तैनाती के दौरान उन्हें कई अन्य मैडल्स से भी नवाजा गया।

बतौर डायरेक्टर जनरल नई पारी की शुरुआत

सर्विस के दौरान बेहतरीन काम करने के बाद 31 दिसंबर 2015 को इन्होंने अकादमिक संस्थान की ओर रुख कर लिया। 1 जनवरी 2016 को कानपुर के रूमा स्थित एक्सिस ग्रुप ऑफ कॉलेजेज में बतौर डायरेक्टर जनरल इन्होंने अपनी नई पारी की शुरुआत की। आज भी वे इस पद पर बने हुए हैं और कॉलेज को लगातार अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

बचपन से लुभाती थी सेना की परेड

उत्तर प्रदेश के जिला हमीरपुर ​स्थित मौदहा में जन्मे सिद्दीकी का बचपन मध्यप्रदेश के आमला समेत यूपी के झांसी और कानपुर की उन गलियों में बीता, जहां उनकी नजर अक्सर सेना की परेड पर पड़ती। सिद्दीकी का मासूम बचपन आर्मी की उस ड्रेस और परेड की ओर खिंचा चला जाता। परेड जब तक आंखों से ओझल न हो जाता, सिद्दीकी की नजर उसी पर टिकी रहती। शायद यह आकर्षण ही था, जिसने उन्हें एनसीसी और फिर आर्मी से जोड़ा।

आर्मी की परेड करती थी आकर्षित

कर्नल सिद्दीकी के शब्दों में, किस्मत ने मेरे लिए यही जीवन तय किया था, शायद यही वजह थी कि मुझे आर्मी की परेड, रिहर्सल, बिल्कुल एक जैसी ड्रेस और उनका कदमताल हमेशा आकर्षित करता रहता था।

कई क्षेत्रों से जुड़कर की पढ़ाई

बहरहाल, बिपिन बिहारी डिग्री कॉलेज, झांसी से ग्रेजुएशन करने के बाद इन्होंने डीएवी कॉलेज कानपुर से कैमिस्ट्री में मास्टर्स किया। सर्विस के दौरान भी इनमें एकेडमिक क्वालिफिकेशंस के लिए बेहद उत्साह नजर आया। पुणे यूनिवर्सिटी से इन्होंने बिजनेस मैनेजमेंट में पीजी डिप्लोमा किया। इसके बाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की। गोरखपुर यूनिवर्सिटी से डिफेंस एंड स्ट्रैटजिक स्टडीज में सेकेंड मास्टर्स की डिग्री हासिल की। रिसर्च के लिए एनईटी की परीक्षा दी।

ब्लॉग के जरिये भी लोगों से जुड़े

नार्थ ईस्ट में एक केस स्टडी के दौरान इन्होंने इंडियन आर्म्ड फोर्स में एचआईवी एड्स पर पीएचडी की डिग्री हासिल की। पर्सनैलिटी डेवलपमेंट और बिहेवियरल मोडिफिकेशन एंड कम्युनिकेशन के क्षेत्र में खुद को प्रोफेशनल मोटिवेशनल स्पीकर के तौर पर स्थापित किया। आज अपने ब्लॉग- Cavalier, www.zahid-siddiquie.blogspot.com के जरिये सिद्दीकी लोगों को मोटिवेट करने के प्रयास में जुटे हैं।

11 किताबें लिख चुके हैं कर्नल सिद्दीकी

हालांकि, सेवाभाव का इनका जुनून और जज्बा यहीं तक सीमित नहीं है। कर्नल जाहिद सिद्दीकी का नाम आज जाने माने लेखकों में भी शामिल है। इन्होंने अब तक कितनी ही पत्र-पत्रिकाओं और जर्नल्स के लिए कई लेख लिखे हैं। अब तक अलग-अलग विषयों पर 11 किताबें लिख चुके हैं। ये सभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित की गई हैं और अमेजन, फ्लिपचार्ट और इलेक्ट्रॉनिक रीडरशिप के लिए किंडल पर भी उपलब्ध हैं। सिद्दीकी जाने-माने कार्टूनिस्ट भी हैं। इनकी पुस्तक 'ए बैचलर्स हैंडबुक' में उनके सभी कार्टून्स का इलस्ट्रेशन तैयार कर उन्हें शामिल किया गया है।

कर्नल सिद्दीकी ने जीवन के हर क्षेत्र में अपनी पहुंच बना ली है, कहें तो शायद अतिश्योक्ति न होगी। इनकी सारी क्वालिटीज एक बार में बता पाना आसान न होगा। यही वजह है कि हमने किस्तों में इसे प्रकाशित करने पर विचार किया। इसके पीछे हमारी मंशा यह है कि हमारे पाठक न​ सिर्फ ​कर्नल सिद्दीकी के विचारों से रूबरू हों, बल्कि उनसे अपने जीवन को सही दिशा देने में कामयाब भी हों। आइए, इसी क्रम में कर्नल सिद्दीकी से किए पहले पांच सवाल और उन पर दिए गए उनके जवाब पर डालें एक नजर...

1. आप राइटर हैं, मोडरेटर हैं, आर्मी में कर्नल रहे हैं, आपकी वीरता के लिए आपको सेना मेडल मिल चुका है। अब तक के अपने इस सफर को कैसे देखते हैं? क्या यादें हैं?

बहुत बेहतरीन। बहुत सी यादें हैं। कुछ खट्टी, कुछ मीठी।

एक बार की बात है। हमारा एक जवान 'धर्मपाल' घायल होकर कोमा में चला गया था। मैं उसका हालचाल लेने उसके पास गया हुआ था। मैंने उसका नाम लेकर उससे पूछा- "क्या हाल है?" उसकी ओर से कोई जवाब नहीं आया। मैंने तीन-चार बार उसका नाम लेकर उससे पूछा, क्या हाल है धर्मपाल? क्या हाल है धर्मपाल? उसकी ओर से कोई आवाज नहीं आ रही थी, लेकिन तीन-चार बार उसका नाम लेकर इसी तरह पूछते रहने के बाद अचानक धीमे से उसकी ओर से एक आवाज आई। "सर, मैं ठीक हूं, बस पेट में दर्द हो रहा है।" आवाज यहीं बंद नहीं हुई।

धर्मपाल ने आगे कहा- "सर, मेरे साथी भी वहां फंसे हुए थे। वे सभी कैसे हैं? किस हालत में हैं?" ...जवान धर्मपाल की उस बात ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। बहुत गर्व का एहसास हो रहा था कि हमारे जवानों को ऐसी हालत में भी अपने साथियों की चिंता है, जब कि वे खुद जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। यही तो होती है टीम स्पिरिट। टीम भावना। अगर हर आफिस या संस्थान में काम करने वाले कर्मचारियों के अंदर 'टीम स्पिरिट' की यही भावना रहे तो वह संस्थान कभी पीछे नहीं रहेगा। लगातार आगे बढ़ता जाएगा।

2. सेना को लेकर आम मानसिकता है कि हमारी सेना सबसे अच्छी है। जरूरतमंदों की सेवा करती है, अपने काम और नियमों को लेकर बेहद पाबंद है, फिर आपने आर्मी में अपनी सेवा के दौरान पीएचडी करने के लिए एक ऐसा विषय क्यों चुना, जिससे आम भारतीय के मन में सेना को लेकर जो छवि बनी हुई है, उसमें सेंध लग रही हो? उन्हें ऐसा महसूस हो सकता है कि भारतीय सेना में एचआईवी एड्स जैसी बीमारी क्यों और कैसे हो सकती है?

अगर लोगों की मानसिकता ऐसी है और उनके दिमाग में ऐसी बात आती है तो यह पूरी तरह से उनकी नकारात्मकता को दर्शाता है। मैंने नार्थ ईस्ट में एक केस स्टडी के दौरान इंडियन आर्म्ड फोर्स में एचआईवी एड्स पर पीएचडी की डिग्री हासिल की। उन दिनों एड्स नई-नई बीमारी आई थी। लोगों को इस बारे में जानकारी का अभाव था।

कई बार हमारी ​खामियों की वजह से नहीं, बल्कि जानकारी के अभाव की वजह से हम कई बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। ऐसे वक्त में मेरा इस विषय पर पीएचडी करना बेहद सराहा गया। मैंने पीएचडी पूरा करने के बाद सेना को इस विषय से जुड़ी सभी जरूरी जानकारियों से अवगत कराया। इंडियन आर्मी को यह बताया गया कि एचआईवी एड्स से बचने के लिए उन्हें किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

3. अपनी सेवा के दौरान आपने गरीब और जरूरतमंदों को सेना में आने के लिए प्रेरित किया है। आप उनके पथ-प्रदर्शक की तरह रहे हैं, किस तरह की समस्याएं इस दौरान आपको देखने को मिलीं? आपको कैसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ा? उन्हें किस तरह मदद करते थे आप?

मैंने आर्मी में रहते हुए और उसके बाद, गरीब व जरूरतमंद युवाओं को आर्मी ज्वाइन करने में जितना हो पाया, उतनी मदद की है। एक बार की बात है, मैं खेलने के लिए एक पार्क में जाता था। वहां एक बच्चा हर रोज मुझसे आर्मी ज्वाइन करने का तरीका पूछता। रोज रोज उसके टोकने के बाद मैंने उससे कहा कि कुछ बच्चों को इकट्ठा करो फिर मेरे पास आना। उसने 62 बच्चों को इकट्ठा किया। मैंने उन सभी को एक महीने तक हर रोज एक घंटे की क्लास उसी पार्क में देना शुरू किया। यकीन करिए, उनमें से 11 बच्चों ने आर्मी ज्वाइन करने के लिए जरूरी परीक्षा पास कर ली।

जहां तक समस्याओं की बात है तो मेरा मानना है कि समस्या तो हर रास्ते में मिलती हैं लेकिन आप जब तक समस्याओं को समस्या की तरह मानते हैं, तभी तक वह आपको परेशान करती है। जैसे ही आप उसे नॉर्मल लेने लगते हैं, वह भी नॉर्मल हो जाती है। फिर वह आपको समस्या महसूस नहीं होती। गरीब और जरूरतमंद बच्चों को खुले आसमान के नीचे, खुली हवा में बैठकर पढ़ना और पढ़ाना बड़े घर के बच्चों के लिए अवश्य ही समस्या हो सकती थी, लेकिन जिन्हें मैंने वहां पर आर्मी तक पहुंचने का रास्ता ​दिखाया, वैसे लोगों के लिए वह कोई समस्या थी ही नहीं, और न ही मेरे लिए थी।

4. जैसे मीडिया और बॉलीवुड नौजवान पीढ़ी को ग्लैमर की वजह से आकर्षित करती रही है, बिल्कुल उसी तरह सेना में मिलने वाली अतिरिक्त सुविधाएं युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित करती है। जबकि आर्मी से जुड़ने के लिए नई पीढ़ी को जो बात प्रेरित करनी चाहिए, वह होना चाहिए- देशसेवा का भाव। इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे? आपको क्या लगता है, नई पीढ़ी आज इंडियन आर्मी के बारे में कैसी सोच रखती है? आज की पीढ़ी को भारतीय सेना से जुड़ने के लिए क्या करना चाहिए? उनकी सोच क्या होनी चाहिए?

बिल्कुल सही सवाल पूछा आपने। बॉलीवुड, मीडिया और आर्मी... हर क्षेत्र की चमक-दमक ने ही सबसे ज्यादा हमारी नई पीढ़ी को इससे जुड़ने को प्रेरित किया है जबकि होना यह चाहिए था कि उन्हें अपनी क्षमता और इन क्षेत्रों के लिए जरूरी क्वालिटीज को ध्यान में रखते हुए इनसे जुड़ना चाहिए। बॉलीवुड की चमक-दमक, मीडिया का चार्म और आर्मी की अतिरिक्त सुविधाओं ने नवयुवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने में अहम भूमिका निभाई है।

इस चमक-दमक के पीछे किस तरह का संघर्ष और रेलमपेल छिपा है, यह बात उन्हें समझ नहीं आती। नतीजतन, वे इन क्षेत्रों से जुड़ने की कोशिश करने लगते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि तीनों ही क्षेत्रों में जाने के लिए जरूरी हुनर और लगातार संघर्षरत रहते हुए भी कभी नकारात्मकता को खुद पर हावी न होने देना और सकारात्मक रहकर अपने काम में हमेशा अव्वल रहना... इन क्वालिटीज की बहुत ज्यादा आवश्यकता होती है। अगर आपके अंदर ये सब हो, तभी आपको इन क्षेत्रों में अपना करियर तलाशना चाहिए।

बिल्कुल उसी तरह आर्मी में देश सेवा का भाव तो सर्वोपरि है। मैं तो कहता हूं कि ऐसा कोई प्रोफेशन नहीं होगा, जिसमें कर्मचारियों को इतनी सुविधाएं मिलती हों। इंडियन आर्मी में आठवीें पास जवान की सैलरी भी चालीस हजार से ज्यादा होती है, पूरे परिवार का हेल्थ इंश्योरेंस होता है, शिक्षा से लेकर कई अन्य सुविधाएं भी उन्हें मिलती हैं। इतना ही नहीं, सेवा पूरी हो जाने के बाद आपको सरकारी नौकरी भी आसानी से मिल जाती है। जहां बाहर के लोग एमए करने के बावजूद 15 से 20 हजार की नौकरी करने को मजबूर होते हैं, वह भी 24 घंटे की, वहीं आर्मी के जवानों के लिए यह प्रोफेशन न केवल कई सुविधाएं देने वाला है बल्कि उनके पूरे परिवार के लिए भी कई लाभ देने वाला है।

बदले में इन जवानों के अंदर देश सेवा की भावना कूट-कूट कर भर दी जाती है या कहें कि उनके अंदर दबी देश सेवा की भावना को उभारकर बाहर ला दिया जाता है। देश और देश सेवा से बढ़कर सेना के लिए दूसरा कोई नहीं होता। यही एहसास उन्हें हमेशा ईमानदारी, देशभक्ति और कर्मवीर बनाए रखने में मदद करती है। जवान कभी भी यह नहीं भूलता कि देशभक्ति के अलावा उसकी जिंदगी का दूसरा कोई भी सानी है। शायद यही वजह है कि भारतीय सेना अपने एक एक जवान की ​पूरी जिंदगी, यहां तक कि मौत और मौत के बाद उसके परिवार तक का पूरा-पूरा ध्यान रखती है। यह भावना ही तो है, जो उन्हें आर्मी से जोड़ती है और मरते दम तक जोड़े रखती है।

5. इतने वर्षों के अनुभव के बल पर इंडियन आर्मी की वो कौन सी कमियां आपने महसूस कीं, जिसमें आपको लगता है कि बदलाव किए जाने की आवश्यकता है?

निजी तौर पर मेरा यह मानना है कि इंडियन आर्मी को समय के साथ अपडेट किया जाना जरूरी है। आज के समय में अगर हम आर्मी के जवानों को घोड़े पर बिठाकर तलवार पकड़ा दें और कहें कि आपको दुश्मन को हराना है तो यह उनके लिए आसान नहीं होगा। अगर हम वाकई चाहते हैं कि उन्हें जीतना चाहिए तो जरूरी है कि हम उन्हें आज के समय के हिसाब से अपडेटेड हथियार मुहैया कराएं। उन्हें चलाने की प्रॉपर ट्रेनिंग भी उन्हें दें।

आज के समय में आर्मी के जवानों को टेक्निकैलिटी के साथ न सिर्फ जोड़ना बल्कि इसमें उन्हें ट्रेंड करना जरूरी होना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि हमें आर्मी को भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे अपग्रेडेड टेक्नीक्स के साथ जोड़कर रखना चाहिए।

मेरे खयाल से आज की इंटेलिजेंस ट्रेनिंग को ध्यान में रखते हुए आर्मी जवानों की संख्या बल में अगर कटौती भी कर दी जाए तो उससे फर्क नहीं पड़ेगा। जरूरत यह है कि हमें कम संख्या बल को ही ज्यादा क्वालिटीज वाला बनाना चाहिए। जवानों की संख्या कम करके जो सैलेरी बचेगी, उसे आर्मी को और भी सशक्त व मजबूत बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यह पैसा बाद में आर्मी के लिए जरूरी व एडवांस्ड वेपेन्स खरीदने के लिए यूज किया जाना चाहिए।

इसके अलावा एक और बात जो मैं कहना चाहता हूं, वह यह है कि हमारे देश में ज्यादा से ज्यादा अपने हथियार तैयार​ किए जाने चाहिए। इस बाबत रिसर्च एंड डेवलपमेंट का काम बड़े स्तर पर किया जाना चाहिए। इससे अन्य देशों पर हमारी निर्भरता न​ सिर्फ कम होगी, बल्कि हम आत्मनिर्भर भी बनेंगे। यही नहीं, इससे हमारे हथियार पूरी तरह से सेक्योर भी होंगे।

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