दिशा रेप केस के एक साल बाद खुद को कितना सुरक्षित मानती हैं हैदराबाद की महिलाएं?

Disha Rape-Murder Case: How Safe Hyderabad For Women after a Year of Most Terrified Incident - Sakshi Samachar

फिर भी महिलाएं संतुष्ट नहीं दिखतीं

न ऑफिस, न सरकार को है सुरक्षा का ध्यान

हमारे अंदर हर वक्त एक डर का भाव बना रहता है

हैदराबाद: 27 नवंबर 2019। रात के 10 बजे का समय। हैदराबाद (Hyderabad) के निकट ​शम्शाबाद (Shamshabad) की सुनसान सड़क। एक साल बाद आज भी जब कोई युवती उस इलाके से गुजरती है, उसका दिल बैठ सा जाता है। दिल की धड़कनें तेज... और तेज... होती चली जाती हैं। कदम तेज... और भी तेज... होने लगती हैं। ऐसा लगता है जैसे कोई उसका पीछा कर रहा है। तेज कदम तब तक नहीं रुकते, जब तक घर के बाहर इंतजार करता कोई 'अपना' नजर न आने लगे। कुछ ऐसे हैं, दिशा रेप केस (Disha Rape Case) के ठीक एक साल बाद हैदराबाद के हालात।

जी हां, दिशा रेप केस ही अपनी तरह का पहला केस नहीं था। इससे पहले और इसके बाद भी ऐसे कई मामले प्रकाश में आए हैं, आते रहे हैं और शायद... आते रहेंगे, लेकिन दुखद यह है कि इनके बाद भी हालात नहीं बदलते। लोगों का गुस्सा प्रशासन पर दिखता है, ऐसी घिनौनी हरकतें करने वालों पर निकलता है, पर हालात... वही ढाक के तीन पात। कुछ भी नहीं बदलता।

फिर भी महिलाएं संतुष्ट नहीं दिखतीं

कागज पर बदलाव कम नहीं दिखते। महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई नए नए ऐप लॉन्च कर दिए जाते हैं, महिला सुरक्षा के नाम पर डायल नंबर्स भी बना दिए जाते हैं, महिलाओं के लिए सुरक्षा के नाम पर अलग बसें चला दी जाती हैं, मैट्रो में महिलाओं के लिए एक पूरी बॉगी ही अलग कर दी जाती है, फिर भी महिलाएं संतुष्ट नहीं दिखतीं। उनके अंदर वही डर ​रह रहकर उठता रहता है, उन्हें डराता रहता है कि शायद वे सुरक्षित नहीं हैं।

हैदराबाद एक ऐसा शहर है, जहां देश के अन्य राज्यों से आकर कितनी ही युवतियां अलग अलग प्रोफेशन, अलग अलग क्षेत्र से जुड़कर कंपनी और अपने बेहतर विकास के लिए दिन रात काम में जुटी हैं। यहां अकेले रहकर वे अपना पूरा समय अपने काम और कार्यक्षेत्र को दे रही हैं, बावजूद इसके वे खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं।

न ऑफिस, न सरकार को है हमारी सुरक्षा का ध्यान

हैदराबाद में ही एक मीडिया कंपनी में कार्यरत सूर्या के शब्दों में, दिशा रेप केस के एक साल बाद भी यहां कुछ भी नहीं बदला। सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए महिलाओं के लिए अलग बस चलाया, लेकिन सड़क पर वह बमुश्किल ही कहीं नजर आती है। महिलाओं के लिए अन्य बसों में अलग केबिन बना दिया गया, पर अब ऐसी बसें भी सड़कों पर कम नजर आने लगी हैं। हमें रात बेरात काम खत्म कर घर जाना होता है। मालूम नहीं होता, काम कब तक खत्म हो पाएगा। पर न तो ऑफिस को हमारी सुरक्षा का ध्यान है और न ही सरकार को। न तो ऑफिस हमें रात को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए सुरक्षा और सुविधा मुहैया कराती है और न ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट के जरिये सफर करते हुए हम खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। बस, चलते रहते हैं ऊपरवाले का नाम लेकर। कल को हमारे साथ भी कोई दुर्घटना हो जाए तो हमें उस पर बिल्कुल भी आश्चर्य न होगा।

हमारे अंदर हर वक्त एक डर का भाव बना रहता है

हैदराबाद के एक बैंक में काम करने वाली गायत्री के शब्दों में, कोरोना ने काफी हद तक हमें सांत्वना दे दी है। हमें ऑफिस जाने के बजाय घर से ही अक्सर काम करना होता है। हालांकि कई बार जाना भी होता है। सच कहूं तो कोरोना काल ने हमें घर रहकर काम करने की वजह से कुछ समस्याएं दीं तो कुछ राहत भी दी हैं। ऑफिस का काम अब घर पर भी पीछा नहीं छोड़ता, परिवार के साथ होकर भी उनके लिए वक्त निकाल पाना मुश्किल होता है, ​पर बाहर आने जाने की परेशानी से यह फिर भी हमें सुकून देता है। रास्ते में देर हो जाती है तो बहुत तनाव होता है। खुद को सुरक्षित तो रहने दीजिए, हमारे अंदर हर वक्त एक डर का भाव बना रहता है। मैं तो बेटी और अपनी, दोनों की ही सुरक्षा को लेकर चिंतित रहती हूं। सरकार ने डायल नंबर और महिलाओं के लिए ऐप लॉन्च तो कर दिए, पर उनमें से एक भी कारगर नहीं हैं। जरूरत के वक्त दोनों में से कोई भी आपका साथ नहीं देते। मैंने खुद भी इसका अनुभव किया हुआ है। इसलिए बेटी और अपनी सुरक्षा भगवान भरोसे ही समझती हूं, सरकार और प्रशासन के भरोसे तो बिल्कुल भी नहीं।

किस्मत के भरोसे है हमारी सुरक्षा

शेफाली हैदराबाद के ही एक कॉलेज में पढ़ाती हैं। एक अन्य राज्य से आकर वह पिछले पांच साल से यहीं रह रही हैं। कहती हैं, कई बार क्लास के बाद भी हमें ऑफिस के काम के लिए लंबे समय तक कॉलेज में रुके रहना पड़ता है। मेरी पूरी कोशिश होती है कि अंधेरा होने के पहले-पहले घर पहुंच जाऊं। अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता तो हमें हमेशा से ही रहती है, लेकिन दिशा रेप-मर्डर केस के बाद से यह चिंता तनाव में बदल चुकी है। हर वक्त यह डर सताता रहता है कि आज घर सुरक्षित पहुंच पाऊंगी या नहीं! मम्मी-पापा भी अब हर रोज रात में एक बार फोन करके जरूर पूछते हैं कि मैं घर पहुंची या नहीं? सरकार और प्रशासन अगर वाकई में महिला सुरक्षा को लेकर इतना सख्त होता तो शायद हमें इतनी ज्यादा समस्या महसूस न होती! कागज पर, होर्डिंग या विज्ञापन में भले ही वे महिला सुरक्षा को लेकर अपनी चिंता दिखाते रहें, पर सच यही है कि हमारी सुरक्षा किस्मत के भरोसे चल रही है।

पर हमें तो हर वक्त डर महसूस होता है

हैदराबाद के ही एक कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रही हैं शीबा। कहती हैं, कोरोना की वजह से इस साल हम अपने घर पर ही ज्यादा रहे हैं, हमारी पढ़ाई का बहुत नुकसान हुआ है। पर सच यह है कि घर पर हम खुद को ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रहे थे। कॉलेज के बाद कई बार हम पहले दोस्तों के साथ घूमने निकल जाते थे, लेकिन दिशा केस के बाद से ऐसा करते हुए हमें अंदर एक अजी​ब सा डर महसूस होने लगा है। सरकार और प्रशासन कहती है कि महिला सुरक्षा के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया है और कर रहे हैं। पर सच यह नहीं है। अगर ऐसा होता तो हम वाकई में खुद को सुरक्षित महसूस करते पर हमें तो हर वक्त डर महसूस होता है।

उन दरिंदों को शूट करना हमारे लिए गौरव की बात थी

शीबा के साथ ही पढ़ती हैं सुकृति। कहती हैं, दिशा केस के बाद एनकाउंटर में उन दरिंदों को शूट कर देना हमारे लिए गौरव की बात थी। हम चाहते हैं कि ऐसे अपराधियों और दुष्कर्मियों को कोर्ट, कचहरी, मुकदमे और जेल में नहीं घसीटना चाहिए। इन्हें तो सीधे गोली मार देनी चाहिए। या फिर बीच बाजार चौराहे पर फांसी पर लटका देना चाहिए। तभी ऐसे अपराधियों को सबक मिल सकेगा और ऐसे अपराधों पर रोक लगेगी। हम उन पुलिस वालों को सैल्यूट करते हैं। उनके लिए आज भी हमारे दिल से दुआएं निकलती हैं कि उन्होंने इतना नेक काम किया। लेकिन सच कहूं तो आज भी अपनी और परिवार में मौजूद अन्य बच्चियों की सुरक्षा को लेकर अंदर ही अंदर डरती रहती हूं। एक खौफ हमेशा हमारा पीछा करता रहता है, और वह होता है- हमारी सुरक्षा का।

हैदराबाद में अब भी कुछ नहीं बदला

बहुत ही दुखद है, पर यह सच है कि आज दिशा रेप केस को एक साल पूरे होने के बाद भी हैदराबाद की महिलाओं में ऐसा खौफ समाया हुआ है। उनकी जिंदगी हर रोज इस तनाव और डर के साये में गुजर रही है। मानसिक तौर पर वे हर वक्त खुद को डरा हुआ सा पाती हैं। इनमें से ज्यादातर महिलाओं की बातें इस ओर इशारा कर रही हैं कि हैदराबाद में अब भी कुछ नहीं बदला। दिशा केस से न तो यहां की सरकार ने कुछ सीखा और न ही पुलिस प्रशासन ने। हां, अगर कुछ सीखा तो हम सब ने। और वह है- डरना। हम सभी ने यहां डरना सीखा है। बेखौफ रहना नहीं खौफ के साथ जीना सीखा है। और ऐसा महज इसलिए क्योंकि हम सब महिला हैं।

उन्हें बेखौफ जीने का अधिकार नहीं

स्पष्ट है हैदराबाद की महिलाओं को ऐसा महसूस हो रहा है कि महिला होना उनका अपराध है। चूंकि वे महिलाएं हैं, इसलिए डरना उनका काम है। उन्हें बेखौफ होकर जीने का अधिकार नहीं। अपनी सुर​क्षा के लिए खुद को ही जिम्मेदार समझना उनकी नियति है। इसलिए उनकी सुरक्षा सिर्फ और सिर्फ उनकी जिम्मेदारी है, किसी और की नहीं। इन सारी मान्यताओं के साथ हैदराबाद की महिलाएं आज भी अपने काम पर हैं। दिन-रात काम कर रही हैं। ऑफिस की भलाई के बारे में सोच रही हैं, परिवार का ख्याल रख रही हैं और खुद की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी खुद ही निभा रही हैं। कुछ इस कदर बदला है दिशा रेप केस के बाद हैदराबाद। ऐसे हालात में भी लगातार बेहतर काम करने का जज्बा लिए यहां अपनी सेवाएं देने वाली हर महिला वॉरियर को मेरा सलाम।

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