भारत के लाल की मौत या हत्या, आज भी कायम हैं कई सवाल

death anniversary: know former pm lal bahadur shastri tashkand samjhota and his sudden death  - Sakshi Samachar

1966 में ताशकंद में असामयिक मृत्यु

नहीं कराया गया था पोस्टमार्टम भी 

मौत को लेकर आज भी खड़े हैं सवाल

नई दिल्ली: आज देश के देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) की पुण्य तिथि है। एक बेहद साधारण से घर में जन्मे लाल बहादुर शास्त्री देश के सबसे उंचे पद तक पहुंचे। पीएम (PM) होते हुए भी ना तो उनके पास आलीशान घर था, ना ही कार और ना ही बैंक बैलेंस। भारतीय राजनीति (Indian politics) के लिए वो ऐसी कई और मिसालें छोड़कर जाते लेकिन 1966 में ताशकंद (Tashkand) में उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। 

लाल बहादुर शास्त्री के पूरे जीवन में कभी कोई विवाद नहीं उठा, लेकिन उनकी मौत काफी रहस्यमय परिस्थितियों में हुई। 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद में पाकिस्तान के साथ शांति समझौते पर करार के महज 12 घंटे बाद 11 जनवरी के तड़के उनकी अचानक उनकी मौत हो गई थीं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर कहा जाता है कि उनकी मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई, लेकिन उनकी मौत को लेकर आज भी कई सवाल खड़े हुए हैं। तो चलिए जानते हैं उस रात की कहानी और वो सवाल, जो हमारे प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत पर सवाल खड़े करते हैं। 

भारत और पाकिस्तान का युद्ध 
साल 1955 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था, देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की समझदारी और सूझबूझ की ही वजह से भारत लगभग जीत चुका था और भारतीय सेना पूरे जोश के साथ लाहौर तक पहुंच चुकी थी, लेकिन कुछ सियासी ताकतों के नापाक मंसूबों ने पूरी तस्वीर पलटकर रख दी। 

अमेरिका, जिसने भारत से ज्यादा पाकिस्तान का साथ निभाया, उसने युद्ध रोकने का निर्देश दिया। अमेरिका का कहना था कि युद्ध थोड़े दिनों के टाल दिया जाए ताकि लाहौर में जो अमेरिकी नागरिक रह रहे हैं वह कुशलतापूर्वक वहां से निकल जाएं। रूस और अमेरिका ने युद्धविराम के लिए रूस के ताशकंद में एक समझौता बुला लिया, जिसने भारत के विरोध में काम किया। क्योंकि भारत चाहता था कि जो टुकड़ा खोया है उसे वापस भारत का हिस्सा बना लिया जाए, लेकिन ताशकंद समझौता इसके विपरीत था। 

ताशकंद सम्मेलन का आयोजन
देश की सुरक्षा, अखंडता और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी मुल्क के साथ मधुर संबंध कायम करने के उद्देश्य से भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधि भी सोवियत रूस के प्रधानमंत्री द्वारा आयोजित ताशकंद सम्मेलन में शामिल हुए। इस सम्मेलन के दौरान तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान सेना के तत्कालीन जनरल अयूब खान के बीच ताशकंद समझौता हुआ। 

ताशकंद में भारत-पाकिस्तान समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद शास्त्री बहुत दबाव में थे। पाकिस्तान को हाजी पीर और ठिथवाल वापस कर देने के कारण उनकी भारत में काफी आलोचना हो रही थी। यहां तक कि उनकी पत्नी भी शास्त्री के समझौते के फैसले को लेकर नाराज थीं। 

समझौते से परेशान थे शास्त्री जी
शास्त्री के साथ ताशकंद गए उनके सूचना अधिकारी कुलदीप नैय्यर ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में बताया था, "उस रात लाल बहादुर शास्त्री ने घर पर फोन मिलाया था। जैसे ही फोन उठा, उन्होंने कहा अम्मा को फोन दो। उनकी बेटी फोन पर आई और बोलीं अम्मा फोन पर नहीं आएंगी। उन्होंने पूछा क्यों? जवाब आया इसलिए क्योंकि आपने हाजी पीर और ठिथवाल पाकिस्तान को दे दिया। वो बहुत नाराज हैं। शास्त्री को इससे बहुत धक्का लगा।

कहते हैं इसके बाद वो कमरे का चक्कर लगाते रहे। फिर उन्होंने अपने सचिव वैंकटरमन को फोन कर भारत से आ रही प्रतिक्रियाएं जाननी चाहीं। वैंकटरमन ने उन्हें बताया कि तब तक दो बयान आए थे, एक अटल बिहारी वाजपेई का था और दूसरा कृष्ण मेनन का और दोनों ने ही उनके इस फैसले की आलोचना की थी। इसके बाद समझौते के 12 घंटे के भीतर उनकी अचानक मौत हो गई। 

आपके प्रधानमंत्री मर रहे हैं
कुलदीप नैय्यर ने अपनी किताब में 'बियोंड द लाइन' में लिखा है, "उस रात मैं सो रहा था, अचानक एक रूसी महिला ने दरवाजा खटखटाया। उसने बताया कि आपके प्रधानमंत्री मर रहे हैं। मैं जल्दी से उनके कमरे में पहुंचा। मैंने देखा कि रूसी प्रधानमंत्री एलेक्सी कोस्गेन बरामदा में खड़े हैं, उन्होंने इशारे से बताया कि शास्त्री नहीं रहे।

उन्होंने देखा कि उनका चप्पल कॉरपेट पर रखा हुआ है और उसका प्रयोग उन्होंने नहीं किया था। पास में ही एक ड्रेसिंग टेबल था जिस पर थर्मस फ्लास्क गिरा हुआ था जिससे लग रहा था कि उन्होंने इसे खोलने की कोशिश की थी। कमरे में कोई घंटी भी नहीं थी। शास्त्री के साथ भारतीय डेलिगेशन के रूप में गए लोगों का भी मानना था कि उस रात वो बेहद असहज दिख रहे थे।

खाने में मिला था जहर!
दूसरी ओर, कुछ लोग दावा करते हैं कि जिस रात शास्त्री की मौत हुई, उस रात खाना उनके निजी सहायक रामनाथ ने नहीं, बल्कि सोवियत रूस में भारतीय राजदूत टीएन कौल के कुक जान मोहम्मद ने पकाया था। खाना खाकर शास्त्री सोने चले गए थे। उनकी मौत के बाद शरीर के नीला पड़ने पर लोगों ने आशंका जताई थी कि शायद उनके खाने में जहर मिला दिया गया था। उनकी मौत 10-11 जनवरी की आधी रात को हुई थी।

शास्त्री के पार्थिव शरीर को भारत भेजा गया। शव देखने के बाद उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने दावा कि उनकी मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई है। अगर दिल का दौरा पड़ा तो उनका शरीर नीला क्यों पड़ गया था और सफेद चकत्ते कैसे पड़ गए। शास्त्री का परिवार उनके असायमिक निधन पर लगातार सवाल खड़ा करता रहा। 2 अक्टूबर, 1970 को शास्त्री के जन्मदिन के अवसर पर ललिता शास्त्री उनके निधन पर जांच की मांग की।

2 निजी सहायकों की मौत 
बेहद चौंकाने वाली बात यह रही कि सरकार ने शास्त्री की मौत पर जांच के लिए एक जांच समिति का गठन किया। इसके बाद शास्त्री जी के साथ ताशकंद के दौरे पर गए उनके निजी डॉक्टर आरएन सिंह और निजी सहायक रामनाथ की मौत अलग-अलग हादसों में हो गई। इन दोनों की हादसों में मौत से केस बेहद कमजोर हो गया।

बता दें कि शास्त्री जी की मौत के बाद उनका पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया था, अगर उस समय पोस्टमार्टम कराया गया होता, तो शायद उनके निधन का असली कारण पता चल जाता। एक पीएम के अचानक निधन के बाद भी उनके शव का पोस्टमार्टम नहीं कराया जाना संदेह की ओर इशारा करता है। इसके साथ ही उनकी मौत पर रूसी कनेक्शन, उनके शव का रंग बदलना और शव का पोस्टमार्टम न किया जाना, ऐसे कई सवाल हैं जो उनकी मौत पर सवाल खड़े करते हैं।

बेहद सामान्य घर से देश के शीर्ष नेता तक का सफर करने वाले स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहुादुर शास्त्री की संदेहास्पद मौत पर से राज जरूर हटना चाहिए था। 

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