ऐसे भी हो जाता है गरीब घर-परिवार के बच्चों का AIIMS में सेलेक्शन, बस चारुल जैसी लगन होनी चाहिए

Charul Honaria Cleared NEET 2020 and Selected for AIIMS New Delhi - Sakshi Samachar

आसान नहीं होता एम्स का कॉम्पिटीशन क्रैक करना

गरीब किसान पिता का चारुल को खूब मिला साथ

सामान्य छात्रा थी चारुल, मेहनत से बनाया मुकाम

“लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती!”

हिंदी साहित्य के महान कवि सोहन लाल द्विवेदी (Sohan Lal Dwivedi) की इन पंक्तियों ने न जाने कितनों को अब तक प्रेरित किया होगा, कितनों की ही प्रेरणा बने होंगे। लेकिन कम ही लोग होंगे, जिन्होंने कवि की इन पंक्तियों को साबित भी कर दिया होगा। ऐसी ही एक शख्सियत है चारुल होनारिया (Charul Honaria) की।

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के सीतापुर स्थित विद्याज्ञान (VidyaGyan) स्कूल से पढ़ीं एक गरीब किसान की बेटी चारुल ने नई दिल्ली (New Delhi) के एम्स (AIIMS) में एंट्री की परीक्षा क्लीयर कर यह साबित कर दिया है कि ठान लें तो दुनिया में कुछ भी मुश्किल नहीं होता। बता दें ​कि National Eligibility cum Entrance Test, NEET की परीक्षा को देश के सबसे कठिन परी​क्षाओं में से एक माना जाता है।

आसान नहीं होता एम्स का कॉम्पिटीशन क्रैक करना

राष्ट्रीय स्तर पर मेडिकल में एंट्री के लिए होने वाला सबसे टफ कॉम्पिटीशन भी इसे ही माना जाता है। इसे क्रैक करना आसान नहीं होता, लेकिन कुछ ऐसे भी गुदड़ी के लाल हैं, जो न केवल इतनी कठिन प्रतियोगिता पास करके बाहर आते हैं बल्कि वे जीवन की कई कठिन परिस्थितियों को भी पार करते हुए लगातार आगे बढ़ते जाते हैं। गरीबी या राह में आने वाली ऐसी ही कई समस्याएं भी उनका रास्ता नहीं रोक पातीं। ऐसा ही एक उदाहरण है चारुल होनारिया का, जो एक आम किसान की बेटी हैं। नीट की यह परीक्षा दूसरे एटेम्पट में क्लीयर करके चारुल ने नई दिल्ली के एम्स में अपनी जगह बनाने में कामयाबी पाई है।

गरीब किसान पिता का चारुल को खूब मिला साथ

चारुल एक साधारण परिवार से आती हैं। उनके पिता एक गरीब किसान हैं। पूरे साल किसानी करने के बाद उनकी सालाना आय एक लाख रुपये तक होती है। इसमें 7 लोगों का उनका पूरा परिवार चलता है। इतनी गरीबी के बावजूद चारुल के पिता ने बच्चों की पढ़ाई पर अंकुश नहीं लगने दिया। अब चारुल उनका मजबूत हाथ बन चुकी हैं।

सामान्य छात्रा थी चारुल, मेहनत से बनाया मुकाम

अपने सफर को याद करते हुए चारुल कहती हैं, "मैं एक सामान्य छात्रा थी लेकिन सीखने की ललक मेरे अंदर हमेशा से थी। अपने इसी उत्साह की वजह से विद्याज्ञान स्कूल में मेरा नामांकन हुआ, लेकिन यह तो महज एक शुरुआत थी। मेरी टीचर्स मुझे तेज तो कहती थीं, लेकिन यह भी कहती थीं कि मैं अंग्रेजी अच्छी तरह से नहीं समझ पाती। इसके लिए बेहद मेहनत की जरूरत थी।"

​स्कूल के शिक्षकों ने खूब की मदद

विद्याज्ञान के शिक्षकों ने इसमें चारुल की मदद की। कठिन परिश्रम और शिक्षकों के सहयोग से चारुल आज यह जगह पाने में कामयाब हो पाई। वह कहती हैं कि शिक्षकों ने उन्हें यह समझने में मदद की, कि किस तरह से शिक्षा कुछ भी खास पाने में हमारे लिए मददगार साबित हो सकता है!

विद्याज्ञान ​स्कूल ने सफर बना दिया आसान

नीट 2020 परीक्षा में कैटेगरी रैंक 10 और ऑल इंडिया रैंक 631 पाने वाली चारुल कहती हैं, "दुनिया में कुछ भी संभव है, यह एहसास उसे कराने वाला उसका स्कूल है। अपने स्कूल का धन्यवाद अदा करते हुए चारुल कहती हैं, विद्याज्ञान स्कूल के साथ मेरा यह सफर बेहद आसान हो गया। मालूम नहीं, मेरी जिंदगी में अगर मेरा स्कूल न होता ​तो शायद मैं वहां तक नहीं पहुंच पाती, जहां आज पहुंच पाई हूं। अगर मैं गांव वाले स्कूल में होती तो ग्रेजुएशन कंप्लीट करके कहीं छोटी सी एक नौकरी कर पाती। लेकिन मेरे इस स्कूल ने मुझे जो दिया, शायद वह मैं कहीं और नहीं पा सकती थी।"

गांव में एक अच्छे डॉक्टर की अदद जरूरत

गांव में बिताए गए छुट्टियों के दिनों को याद करते हुए चारुल कहती हैं, "महामारी के दौरान मैं अपने गांव में थी। तब मैंने महसूस किया कि गांववालों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की कितनी ज्यादा जरूरत है? हालांकि इससे पहले भी मैंने महसूस किया था कि हमारे यहां एक अच्छे डॉक्टर की अदद जरूरत है। यही वजह रही कि मैंने डॉक्टर बनने का ​मन बनाया।"

कोरोना महामारी को लेकर चारुल कहती हैं, इस महामारी ने मुझे यह यकीन करना सिखाया कि मैं यह तय कर सकूं कि गांव-गांव तक सभी जरूरी मेडिकल सुविधाएं मुहैया की जा सकें। इसमें मेरे आत्मविश्वास ने भी मेरी काफी मदद की।

एम्स पहुंचने का सपना यूं हुआ साकार

एक बार जब चारुल के सपने ने आकार लेना शुरू किया, उन्होंने यह तय कर लिया कि अब वह कई वर्षों तक कठिन परिश्रम करेंगी। इस काम में उसके शिक्षकों ने उनकी बहुत मदद की। 12वीं कक्षा में चारुल ने 93 प्रतिशत अंक पाए, लेकिन NEET क्लीयर नहीं कर पाईं। चारुल ने यूपी सरकार के मेडिकल कॉलेज में जगह पाने में तो सफलता हासिल कर ली, लेकिन देश के सर्वश्रेष्ठ मेडिकल कॉलेज यानी नई दिल्ली के एम्स तक पहुंचने का उनका सपना अधूरा रह गया। एम्स में एमबीबीएस की सीट पाने में उनका यह सपना अब जाकर साकार हो पाया है।

नकारात्मक विचारों को नहीं होने दिया हावी

चारुल ने आगे कहा, "मैंने कभी किसी नकारात्मक सोच को अपने पर हावी नहीं होने दिया। मैं हमेशा से मानती थी कि मुझे सफलता जरूर मिलेगी। यही मेरी सफलता का मूल मंत्र है।" यकीनन चारुल की सफलता कितने ही अन्य गरीब परिवारों के बच्चों के लिए प्रेरणा बनेगी।

शिक्षकों, दोस्तों और परिवार ने दिया साथ

चारुल ने आगे कहा, महामारी के दौरान कई बातों का ध्यान रखते हुए पूरे परिवार को गांव वापस लौटना पड़ा, लेकिन मेरे शिक्षकों ने मुझे मदद करना जारी रखा। दोस्तों ने भी मेरा बहुत साथ दिया। जब भी मैं कमजोर पड़ती, उनका साथ मुझे मिलता। परिवार ने भी मुझे पढ़ने के लिए जगह और मौका, दोनों दिया।

सबसे बढ़कर मुझे पिता का खूब साथ मिला। उन्होंने हमेशा मेरी हौसलाअफजाई की। उन्होंने कहा कि मैं जो भी चाहूं, कर सकती हूं। मेरे सपने पूरे करने के लिए उन्होंने लगातार मुझे सपोर्ट किया। उन्होंने कभी भी यह नहीं सोचा कि मैं लड़की हूं इसलिए मुझे घर से बाहर नहीं भेजना चाहिए। इसके अलावा विद्याज्ञान आवासीय विद्यालय ने तो इस सफर में मेरी सबसे ज्यादा मदद की।

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