सीएम रावत के खिलाफ नहीं होगी सीबीआई जांच, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

Supreme Court stayed the order of CBI inquiry against CM Rawat - Sakshi Samachar

सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने शीर्ष अदालत का किया रुख

पत्रकार ने सीएम रावत पर लगाए भ्रष्टाचार के आरोप

सुप्रीम कोर्ट ने सीएम के खिलाफ आदेश पर उठाए सवाल

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की सीबीआई जांच के निर्देश देने के नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है। राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष हाईकोर्ट के आदेश की आलोचना की, जिसमें न्यायाधीश एम.आर. शाह और आर. सुभाष रेड्डी भी शामिल थे।

वेणुगोपाल ने कहा कि उच्च न्यायालय ने सभी आधारों को मिला दिया है और जिस व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, वह विशेष रूप से एक व्यक्ति के मामले में सुनवाई के लिए बाध्य है, जो एक सार्वजनिक कार्यालय रखता है। उन्होंने शिवकुमार मामले का हवाला दिया, जहां यह कहा गया कि चूंकि इस मामले में कोई व्यक्ति पक्षकार नहीं है, इसलिए जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।

आदेश ने सबको किया आश्चर्यचकित

न्यायमूर्ति भूषण ने कहा कि ऐसा कठोर आदेश पारित किया गया, जिसने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया और इसमें मुख्यमंत्री एक पार्टी नहीं थे। न्यायाधीश शाह ने भी कहा कि इस आदेश ने तो सभी को ही आश्चर्य में डाल दिया है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बुधवार को नैनीताल हाईकोर्ट को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया था। दरअसल उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को एक पत्रकार उमेश शर्मा द्वारा उत्तराखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों की प्राथमिकी दर्ज करने और जांच करने का निर्देश दिया था।

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मुख्यमंत्री पर भाजपा के झारखंड प्रभारी होते हुए गौ-सेवा आयोग में उम्मीदवार का समर्थन करने के लिए उनके रिश्तेदारों के बैंक खाते में धन हस्तांतरित करने का आरोप लगाया गया है। शीर्ष अदालत ने मुख्यमंत्री के खिलाफ हाईकोर्ट के आदेश पर सवाल उठाया, जब राज्य सरकार और मुख्यमंत्री याचिका में पक्षकार भी नहीं हैं।
मंगलवार को हाईकोर्ट ने दो पत्रकारों उमेश शर्मा और शिव प्रसाद सेमवाल द्वारा दायर दो अलग-अलग याचिकाओं पर फैसला सुनाया। पत्रकारों ने उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की, जो इस साल जुलाई में आईपीसी के विभिन्न प्रावधानों के तहत विद्रोह, जालसाजी, धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोप में दर्ज की गई थी।
 

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