...तो आखिर इसलिए STF ने लिया विकास दुबे को बहाना बनाकर मारने का फैसला...!

Why STF decided to encounter Vikas Dubey with an excuse - Sakshi Samachar

हैदराबाद : विकास दुबे एनकाउंटर ने एक बार फिर से दिसंबर में हैदराबाद में महिला चिकित्सक के दुष्कर्म के आरोपियों के साथ हुए एनकाउंटर की याद दिला दी है। यही नहीं, विकास दुबे समेत उसके कई साथियों को भी यूपी पुलिस ने एनकाउंटर में ही मार गिराया। मीडिया, कई नेता, मं​त्री यहां तक कि जनता भी मानती है कि विकास दुबे का एनकाउंटर फर्जी था। #FakeEncounter और #VikasDubeyKilled जैसे हैशटैग आज ट्विटर पर पूरे दिन ट्रेंड करते रहे। हालांकि पुलिस अधिकारियों की टीम ने प्रेस कांफ्रेंस के दौरान एनकाउंटर की जो कहानी बताई, वह रोहित शेट्टी की फिल्म की कहानियों से मेल खाती लग रही थी। यही वजह था कि रोहित शेट्टी भी पूरे दिन ट्विटर पर ट्रेंड करता रहा।

क्यों किया गया विकास दुबे का एनकाउंटर

इन सबके बीच जो सबसे बड़ा सवाल उठ रहा था, वह था कि आखिर पुलिस को इस एनकाउंटर की जरूरत क्यों पड़ी? और आखिर क्यों आजकल पुलिस अक्सर ऐसे एनकाउंटर करने लगी है? क्या उसका भरोसा देश की न्यायपालिका पर से उठ गया है? या फिर विकास दुबे जैसे लोग कई लोगों के राज से पर्दा उठाने की कुव्वत रखते हैं, इसलिए ऐसा किया जाता है या फिर ऐसा इ​सलिए किया जा रहा है क्योंकि जनता भी अब न्यायपालिका की गिरफ्त से ऐसे अपराधियों के बच निकलने से आजिज आ चुकी है, इसलिए फौरन ऐसे अपराधियों को सजा देे देना चाहती है! आखिर क्या कारण हैं? जानने के लिए हमने बात की उत्तर प्रदेश के दो पूर्व आईपीएस अफसर और बीबीसी यूपी के एक वरिष्ठ संवाददाता से और जानने की कोशिश की​ कि आखिर इन सबके पीछे की वजह है क्या? हमारी पड़ताल में क्या निकलकर आया, आइए जानते हैं।
 
जनभावना से प्रेरित होती है ऐसी कार्रवाई

पूर्व आईपीएस आरके चतुर्वेदी कहते हैं— दरअसल, यह पुलिस का जनभावना से प्रभावित होने वाला कृत्य है। जो बेशक कानून सम्मत न हो लेकिन 'इन लाइट आफ पब्लिक परसेप्शन', इन दिनों इस तरह के काम हो रहे हैं। आज के टाइम में पब्लिक सब जानती है। बेशक पब्लिक जानना चाहती थी कि आखिर किन लोगों से उसके तार जुड़े थे। लेकिन अब पब्लिक को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सबकुछ जानते हुए भी पब्लिक ताली बजाने को इसलिए तैयार है ​क्योंकि विकास जैसे लोग सोसायटी के दुश्मन हैं। समाज के दुश्मन हैं। जिन लोगों को उसने मारा था, जिनकी जमीन पर कब्जा किया था या जिन लोगों पर उसका आतंक था, उस इलाके के लोग उसके बहुत ज्यादा पक्ष में नहीं थे। जो भी उसके पीछे थे, या तो उसके भय से या उसके लाभ से। और बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिन्हें उसके जाने के बाद आतंक से मुक्ति मिली है। तो इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए कई बार ऐसी घटनाएं की जाती हैं।

हैदराबाद में भी हुआ था ऐसा ही एनकाउंटर

हैदराबाद की दिसंबर वाली घटना ही याद कर लें। महिला चिकित्सक के साथ दुष्कर्म करने वाले आरोपियों को पुलिस वालों ने बीच रास्ते में ही एनकाउंटर के दौरान मार गिराया और उनके इस कृत्य को जनता का भरपूर समर्थन मिला। सबने तालियां बजाईं और उनका सपोर्ट किया। वह महिला के साथ हुई घटना थी इ​सलिए लोगों की सहानुभूति उस चिकित्सक के साथ थी, लेकिन आठ पुलिसवालों को मारना भी तो पूरी अर्थव्यवस्था को चुनौती देना था। इसलिए पब्लिक पर बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि वह एनकाउंटर में मारा गया या फिर फेक एनकाउंटर में।

पब्लिक जानना चाहती है किससे जुड़े थे तार

पब्लिक यह भी तो जानना चाहती थी कि आखिर उसके तार किन लोगों से जुड़े थे? पूछने पर पूर्व आईपीएस कहते हैं कि यह सिर्फ कुछ खास जागरुक लोगों के मन की बात है। कुछ दिनों में ही लोग सबकुछ भूल जाएंगे। जब तक विकास दुबे मारा नहीं गया था, तभी तक यह सब हो रहा था। धीरे-धीरे हमारी जनता सब भूल जाएगी। जब तक वह मारा नहीं गया तभी तक हर चैनल की हेडलाइन बना हुआ था। अब चूंकि वह मारा गया इसलिए कल से न तो उसकी चर्चा किसी चैनल पर होगी और ही लोगों के बीच। और कौन किसके पीछे था, यह तो बाद का विषय है और बाद में भी इस पर चर्चा चलती रहेगी।

अब वह नया क्या बताता?

पुलिस को जो भी जानना था, वह कल से आज तक के 24 घंटों में ही पूछताछ में निकाल ली गई होगी। अब वह जिंदा भी रहता तो इससे ज्यादा कुछ और नहीं निकलकर आता। इससे पहले भी उसका एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उसने कुछ नेताओं के नाम लिए थे। वह भी विशेषज्ञों के सवालों के जवाब में उसने बताया था, लेकिन काफी समय बाद उसे सार्वजनिक किया गया। अब वह इससे अलग कुछ और बताता तो क्या खास बताता!

मारा न जाता तो 2022 में विधायक बन जाता

क्या न्यायपालिका पर पुलिस का अब भरोसा नहीं रहा? सवाल के जवाब में पूर्व आईपीएस कहते हैं— मेरा मानना है कि यह 'एक्सेसिव यूज आफ पावर' है। आपको न्यायपालिका पर भरोसा करना चाहिए, लेकिन आपने 'पब्लिक की वाहवाही लेने', 'ताली बजाने' और 'नौकरी बचाने' के लिए 'एक्सट्रा ज्यूडिसियल वर्क' कर दिया है। लेकिन इसके पीछे कारण यही है कि न्यायपालिका सबूत के बिना किसी को सजा नहीं दे सकती और इस मामले में तो वह जरूर छूट जाता क्योंकि 'कानपुर हत्याकांड' में किसकी गोली से कौन मरा, यह पता करना मुश्किल था। रात के अंधेरे में कौन किसकी गोली से मरा, किसने किसको गोली मारी, यह साबित कर पाना मुश्किल है। हमारा लचर ज्यूडिशियल सिस्टम इसके लिए जिम्मेदार है। इस वजह से पब्लिक का भी भरोसा इससे उठता जा रहा है और पुलिस का भी। जब थाने में घुसकर गोली मारकर भी वह साफ बच गया था तो अब तो उसके बचने की पूरी संभावना थी। वहीं, एक और बात यह है कि अगर अब भी वह मारा नहीं गया होता तो 2022 में विधायक बन जाता।

ऐसे अपराधियों और आतंकवादियों में खास फर्क नहीं

पूर्व आईपीएस अफसर लक्ष्मी नारायण ने इन्हीं सवालों के जवाब में कहा— जब भी कोई अपराधी मारा जाता है, चाहे एनकाउंटर से ही सही, तो इतने सवाल क्यों उठाए जाते हैं? टे​ररिस्ट भी तो मारे ही जाते हैं न! क्या आपको इस अपराधी और आतंकवादी में कोई खास फर्क नजर आया? मुझे तो नहीं लगा ऐसा कोई फर्क। यह मेरे निजी विचार हैं। जो लोग इस तरह के सवाल उठा रहे हैं तो उन्हें उससे इतनी सहानुभूति क्यों है? क्या वह एक ईमानदार व्यक्ति था? दूसरी बात यह है कि हमें एसटीएफ की जो भी कहानी है, उस पर शक क्यों है? कोई सामान्य व्यक्ति होता और उसके साथ ऐसा होता तो हम शक करते या उसके पक्ष में कुछ बात उठती, लेकिन एक ​अपराधी के लिए, जिसके पास इतने मुकदमे हैं और जिसने इतने दुर्दांत अपराध किए हैं तो उसके प्रति इतनी सहानुभूति क्यों है?

मीडिया क्यों बन रही है हमदर्द

देख तो मैं भी रहा हूं कि सभी टीवी चैनल और मीडिया वाले तरह-तरह के सवाल कर रहे हैं। नेता अपनी बात कर रहे हैं, लेकिन सवाल उठता है सिस्टम पर। उसके खिलाफ इतने मुकदमे थे। एक बार तो 2001 में थाने के अंदर घुसकर उसने एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी, लेकिन बाद में बाइज्ज्त बरी हो गया क्योंकि गवाह मुकर गए थे। आपको क्या लगता है, गवाह क्यों मुकर गए? कहीं न कहीं उसकी सुरक्षा खतरे में आ जाती है और जब अपनी ही सुरक्षा पर बन आती है तब ऐसा होता है। सुरक्षा खतरे में आ जाती है तो व्यक्ति अपनी जान बचाना चाहता है।

किसी भी घटना का कोर्ट में 'सीन रीक्रिएट' करना मुश्किल

जब घटना ताजा होती है तो आदमी में जोश होता है और घटनाक्रम ताजा होती है इसलिए उस पर निर्णय लिए जाने में तेजी और एकरूपता होती है। इसके अलावा यह भी ध्यान देने योग्य है कि घटनाएं हकीकत में होती हैं, लेकिन उस समय के सिचुएशन में और कोर्ट में एनालाइज करने में बड़ा फर्क हो जाता है। तो कहीं न कहीं हमारा सिस्टम ही दोषी है, ऐसे मामलों को जन्म देने के लिए। हमारे कानून उतने सक्षम नहीं हैं। फिर मुकदमे के दौरान जमानत पर आरोपियों को छोड़ देना भी मेरी समझ में नहीं आता। जब साबित हो जाए कि सं​बंधित आरोपी दोषी नहीं है, तब एक ही बार उसे जमानत दे दी जाती तो वह बेहतर होता न कि बीच में दिया जाना।

सच और फिक्शन में होता है फर्क

TRUTH IS SOMETIME STRANGER THAN FICTION| सच्चाई कहीं न कहीं आपको अलग ही चेंज दिखा सकती है फिक्शन में। जो हमारे सोच समझ के बाहर होती है। अभी हमारे पास एसटीएफ की स्टोरी पर यकीन करने के अलावा और कुछ नहीं है, सिवाय इसके कि हम इस पर अपना कयास लगाएं। सीनियर अधिकारियों का ​दायित्व बहुत ज्यादा होता है और उनके खिलाफ सामान्यत: कार्रवाई नहीं हो पाती।

हमारे देश में न्यू वर्सिप का है ट्रेंड

हमारे यहां न्यू वर्सिप का जो ट्रेंड है, उसकी वजह से दुबे जैसे लोग हीरो बन जाते हैं और हमारी कई पीढ़ियों को बिगाड़ देते हैं। मीडिया को कई दिनों से विकास दुबे के अलावा और कुछ दिख ही नहीं रहा है। पुलिस को कार्रवाई करने देना चाहिए। मीडिया के ऐसा करने से मालूम होता है जैसे कि विकास दुबे एक हीरो है। यही वजह है कि उस जैसे छोटे मोटे लोग भी फिर उसकी तरह ही 'हीरो' बनना चाहते हैं। यानि चीजें जब हमारे सामने आती हैं तो हम उसे सही ढंग से प्रेजेंट नहीं कर पाते। उस पर जब सियासी चीजें चल रही हों। मैं इतना ही कहूंगा कि विकास दुबे को बढ़ाने में सभी राजनीतिक पार्टियों का हाथ है क्योंकि 2001 से 2020 तक हर पार्टी ने यूपी में शासन किया है।

एनकाउंटर से सं​बंधित जांच कराना चाहें तो कराएं

उज्जैन में जिस तरह से चिल्ला-चिल्लाकर उसने अपनी गिरफ्तारी कबूला था, उसके बाद उसके भागने की बात हजम नहीं होती, जिस वजह से पुलिस उसके एनकाउंटर की बात कर रही है। ऐसे में आप क्या कहना चाहेंगे? पूछने पर पूर्व आईपीएस कहते हैं कि जहां तक बात है उसके एनकाउंटर से जुड़े जांच और सबूतों की, तो उसे जरूर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। लेकिन मेरे लिए विकास दुबे एक आतंकवादी की तरह ही था। वह कोई सीधा-सादा इंसान नहीं था, जिसके लिए मेरे मन में कोई सहानुभूति हो। मेरे लिए देश सबसे ऊपर है, विकास दुबे जैसे गैंगस्टर और आतंकवादी नहीं।

दुबे के मारे जाने के बावजूद खंगाले जा सकते हैं सबूत

उसके एनकाउंटर से जो अनसुलझी कहानियां पिटारे में बंद रह गईं, उसे लेकर क्या गारंटी है कि वह सबकुछ बता ही देता। अपराधी की कोई गारंटी नहीं होती कि वह सबकुछ सही सही बता ही दे। इसके अलावा अगर वह बता भी देता तो उसकी गवाही पर यकीन कैसे किया जा सकता था? क्योंकि कल को न्यायालय जाकर वह मुकर जाता। वह कहता कि तब सबकुछ उसने दबाव की वजह से कहा था। इसलिए उसकी मौत के बावजूद उसके बताने या न बताने से कोई फर्क नहीं पड़ता है।

मोबाइल और गैंग के बचे लोग हैं अहम सबूत

किन लोगों से उसका संपर्क था वगैरह, जो भी बातें पता करने वाली थीं तो वह तो अब भी पता की जा सकती हैं। उसके मोबाइल लिंक्स, कॉन्टेक्ट्स, किनके नंबर हैं उसके फोन में, किन लोगों से उसकी बातचीत होती थी, किनसे उसका मिलना-जुलना होता था, उसके गैंग के बचे लोगों से पूछताछ के बाद, जेसीबी मशीन के ड्राइवर से पूछताछ के बाद, पा​र्टी में उसके करीबी, किसने अपनी पार्टी में रखा, कौन उसकी पत्नी को पंचायत चुनाव के लिए तैयार कर रहा था, तो.. जो लोग उसे पार्टी से चुनाव लड़वा रहे थे, उसे पैसों से मदद कर रहे थे, किस-किस तरह का ठेका वह ले रहा था और किस-किस का काम कर रहा था, यह सब पता करने की जरूरत हैै। इनसे यह पता किया जा सकता है कि आखिर उसके तार किन लोगों से जुड़े थे। थोड़ी सी कोशिश की जाए तो सारी जानकारी मिल सकती है। यह इतना बड़ा इश्यू नहीं है।

कानून में बदलाव जरूरी

फिलहाल जरूरी यह है कि हमारे कानून में अवश्य कुछ बदलाव किए जाएं, जिससे ऐसे क्रिमिनल्स को बढ़ावा न मिले। प्रधानमंत्री लेवल पर अक्सर यह चर्चा होती है कि कानून में बदलाव जरूरी हैं। काफी कुछ बदल भी रहा है, लेकिन जो बेसिक कमियां हैं, उसमें बदलाव नहीं किए जा रहे हैं। अब यह जानबूझकर किया जा रहा है या इसके पीछे क्या वजह है, मैं क्या कहूं।। मेरा मानना है कि हर कानून में कुछ खास कमियां जानबूझकर ही छोड़ी जाती हैं। आईपीसी, सीआरपीसी... ये सारे कानून ब्रिटिशर्स ने बनाए थे, जिनका मकसद हमारे देश में राज करना था। उसके बावजूद आज भी अगर हमने उन्हीं का कानून रखा हुआ है तो उसके पीछे मकसद वही होगा, जो ब्रिटिशर्स का था।

पुलिस को फ्रेंड बनाना जरूरी

इंग्लैंड में सिपाही की गवाही भी काफी मायने रखती है, लेकिन हमारे देश में सिपाही उस वक्त ज्यादातर इंडियंस होते थे इसलिए उनकी गवाही मान्य नहीं थी। आज भी हमारे यहां सिपाही की गवाही मायने नहीं रखती जबकि इंग्लैंड में काफी मायने रखती है। हमने पुलिस वालों को वैल्यू कभी दिया ही नहीं है। पुलिस को भी वेलफेयर के काम करने की छूट दी जानी चाहिए थी। पुलिस को फ्रेंड बनाने की जिम्मेदारी सरकार की होनी चाहिए।

हार्ड वर्क से बच रही है आज पुलिस

विकास दुबे एनकाउंटर पर वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी, बीबीसी, यूपी का कहना है कि ऐसे एनकाउंटर आज इसलिए हो रहे हैं क्योंकि आज पुलिस हार्ड वर्क नहीं करना चाहती। पुलिस के लोग ठीक से इनवेसटिगेशन करके अदालत में सबूत-गवाही देना नहीं चाहते।

आज के समय में ऐसे एनकाउंटर या तो तब होते हैं, जब अपराधी बहुत ही गरीब होता है या फिर उसे मारने के लिए टॉप लेवल का आदेश मिला हुआ हो।

आज के टाइम में पुलिस हार्ड वर्क करना नहीं चाहती। खुद गवाही भी देना नहीं चाहती। इसलिए अपराधियों का एनकाउंटर कर देना उसे आसान काम लगता है।
राजनीतिक कारणों से भी पुलिस ऐसे काम करती है। इसके पीछे कई राजनीतिक कारण होते हैं या फिर वह किसी की लायबिलिटी हो जाते हैं। ऐसे लोग या तो सिस्टम के लिए आमदनी का स्रोत नहीं होते हैं या सिस्टम को खरीद नहीं सकते।

क्यों नहीं ली गई ट्रांजिट रिमांड

पहले भी पूछताछ के दौरान विकास दुबे ने बीजेपी के दो नेताओं का नाम लिया था कि उनकी मदद उसे मिलती थी। यदि दुबे जिंदा होता, मुक़दमा चलता तो कई और लोगों के राज खुल जाते इसलिए विवादास्पद रूप से मुठभेड़ में उसे मारा गया है।

दूसरी बात यह है कि दूसरे राज्य में जब कोई अपराधी पकड़ा जाता है तो पहले उसकी ट्रांजिट रिमांड ली जाती है। उसे कोर्ट में पेश किया जाता है। पर यहां ऐसा नहीं हुआ। यूपी और एमपी सीएम के बीच जो भी बात हुई, उसके बाद एमपी पुलिस उसे यूपी की सीमा तक एस्कॉर्ट करके लाई, जैसे किसी वीआईपी को लाया जाता है। उसके बाद यूपी एसटीएफ को उसे सौंप दिया गया। जब विकास दुबे यूपी के कानपुर शहर में एंटर करता है तो मीडिया की गा​ड़ियों को दो किलोमीटर पहले ही रोक दिया गया। आखिर क्यों?

उसे दौड़ाकर क्यों नहीं पकड़ा अगर यह मान भी लिया जाए कि वह भाग रहा था तो...

इसके बाद पुलिस अधिकारियों के मुताबिक गाड़ी पलटी और पिस्टल छीनकर विकास दुबे कच्ची सड़क की ओर काफी दूर भाग गया। इसके बाद उसे मजबूरी में गोली मारी गई। अब सवाल यह उठता है कि जब उसके आगे पीछे दो गाड़ियां और चल रही थीं तो फिर जैसे ही गाड़ी पलटी, उन्होंने उसे ओवरपावर क्यों नहीं किया। उसे दौड़ाकर क्यों नहीं पकड़ा, अगर यह मान भी लिया जाए कि वह भाग रहा था तो...

एक और सवाल यह खड़ा होता है कि फिर उसने उज्जैन में सरेंडर ही क्यों किया था? उसने खुद को गिरफ्तार ​कराया। उसने कैमरे के सामने "मैं हूं विकास दुबे, कानपुर वाला..." इसलिए बोला ताकि यह सबूत रहे कि मैं जिंदा पकड़ा गया हूं।

लोग खुद से अपराधियों को मारने लगेंगे, फिर तो लिंचिंग की घटनाएं होने लगेंगी

इस कहानी में कई झोल हैं। अगर शॉर्टकट करके पुलिस को एनकाउंटर का अधिकार दिया जाएगा, जो न्यायालय का अधिकार है तो इससे यह होगा कि बहुत से लोग खुद से अपराधियों को मारने लगेंगे। फिर तो लिंचिंग की घटनाएं होने लगेंगी, इसलिए क्योंकि लोग कानून को हाथ में लेने लगेंगे। अगर पुलिस को अदालत पर भरोसा नहीं तो बहुत से लोगों को पुलिस पर भी भरोसा नहीं।

ज्यूडिशियल सिस्टम में अगर कोई कमी है तो सीआरपीसी की धारा में बदलाव के लिए आवाज उठानी चाहिए न कि इस तरह के शॉर्टकट अपनाए जाने चाहिए। क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में संसद तुरंत बदलाव करे। न्यायपालिका भी सुधार की पहल करे, मुकदमें जल्दी निबटें, गवाहों को सुरक्षा मिले और पीड़ित को हरसंभव सहायता। अभी पूरा सिस्टम पीड़ित की उपेक्षा करता है। फ़ोकस उसे न्याय देने पर होना चाहिए।

उसे एमपी कोर्ट में रिमांड पर क्यों नहीं लिया गया?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि एमपी पुलिस उसे यूपी बॉर्डर तक हैंडओवर करने क्यों आई और पकड़े जाने के बाद उसे एमपी कोर्ट में रिमांड पर क्यों नहीं लिया गया? ऐसा मालूम होता है कि कुछ लोग उसे बचाना चाहते थे, जिन्होंने उज्जैन में उसे गिरफ्तार होने की सुविधा दी और कुछ मरवाना चाहते थे, जिन्होंने कानपुर में उसका एनकाउंटर करवा दिया।

दुबे खुद को बेकसूर साबित कर लेता, उसने ऐसी तैयारी कर ली होगी

कानपुर में उस रात पूरा घटनाक्रम कुछ इस तरह से हुआ था कि लग रहा था कि दुबे खुद को बेकसूर साबित कर लेता। उसने ऐसी तैयारी कर ली होगी। दरअसल, रात के अंधेरे में जब भी दबिश होती है तो घटना का कोई चश्मदीद नहीं होता। अगर कोई होगा ​भी तो अदालत उसे पूरी तरह से मानने के लिए तैयार नहीं हो पाएगी। रात के अंधेरे में किसने किस पर गोली चलाई, पुलिस के लिए अदालत में यह साबित कर पाना मुश्किल हो जाता। घटना के बाद पुलिस का काम होता है, सारे सबूत इकट्ठा किए जाते लेकिन कानपुर की घटना के बाद जिस तरह से उसका घर गिराया गया, वह तो सबूत मिटाने के लिए किया जाता है। इसलिए शुरू से ही पूरा मामला संदिग्ध लगता है। शुरू से ही ऐसा मालूम होता है कि कुछ पुलिसवाले, नेता व मंत्री उसे सजा दिलाना चाहते थे और कुछ उसे बचाना चाहते थे।

अपराधियों को सजा देना पुलिस का काम नहीं

ऐसा नहीं है कि विकास दुबे जैसे लोगों से हमें यानि मीडिया या आम आदमी को कोई सहानुभूति है, लेकिन अपराधियों को सजा देना पुलिस का काम नहीं। यहां यह भी साफ कर दें कि लोगों को विकास दुबे जैसे अपराधियों से अगर खौफ होता है तो उसे पुलिस से भी डर हमेशा लगता रहता है। जनता को पुलिस पर भी भरोसा नहीं है। और जहां तक बात विकास दुबे जैसे लोगों के आतंकवादियों के साथ तुलना करने की है तो माफिया और आतंकवादियों में बहुत बड़ा अंतर होता है। विकास दुबे आतंकवादी होता तो इस तरह से उज्जैन के मंदिर पहुंचकर खुद को गिरफ्तार न करवाता।

— सुषमाश्री, वरिष्ठ उप संपादक, साक्षी समाचार

(यह लेख यूपी में अपराध की दुनिया पर करीब से नजर रखने वाले विशेषज्ञों से बातचीत पर आधारित है)

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