सुप्रीम कोर्ट का आदेश, मजदूरों से ट्रेन या बस का कोई किराया न लिया जाए, राज्य सरकारें दें खर्च

Supreme Court Directs State Govt Took Pay Migrant Worker Travelling Charges - Sakshi Samachar

सॉलिसिटर जनरल बोले- मुहैया कराया जा रहा है भोजन

कोर्ट ने कहा- होनी चाहिए स्पष्ट नीति

जज बोले- कई लोगों को नहीं मिल पाया लाभ

नई दिल्ली : देश भर में फंसे प्रवासी मजदूरों की समस्या और उन पर आई विपत्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि मजदूरों से बस, ट्रेनों का किराया नहीं लिया जाएगा। कोर्ट ने आदेश दिया कि राज्य सरकारें मजदूरों का किराया देंगी और उनको घर पहुंचाने की व्यवस्था करेंगी। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारें मजदूरों की वापसी में तेजी लाएं।

बेंच ने मेहता से पूछे कड़े सवाल
बेंच ने कहा कि इन श्रमिकों को अपनी घर वापसी की यात्रा के लिये किराये का भुगतान करने के लिये नहीं कहना चाहिए। पीठ ने मेहता से सवाल किया, ‘‘सामान्य समय क्या है? यदि एक प्रवासी की पहचान होती है तो यह तो निश्चित होना चाहिए कि उसे एक सप्ताह के भीतर या दस दिन के अंदर पहुंचा दिया जायेगा? वह समय क्या है? ऐसे भी उदाहरण हैं जब एक राज्य प्रवासियों को भेजती है लेकिन दूसरे राज्य की सीमा पर उनसे कहा जाता है कि हम प्रवासियों को नहीं लेंगे, हमें इस बारे में एक नीति की आवश्यकता है।''

सॉलिसिटर जनरल बोले- मुहैया कराया जा रहा है भोजन
सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा कि क्या इन लोगों को बाद में प्रतिपूर्ति की जाएगी? अदालत ने पूछा कि जब वे ट्रेनों में जाने के लिए इंतजार कर रहे थे, तो क्या उन्हें भोजन मिला? सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा, उन्हें भोजन मिलना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब दिया कि उन्हें भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे मेहता ने कहा कि हर दिन लगभग 3.36 लाख प्रवासियों को स्थानांतरित किया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार अपने प्रयासों को तब तक नहीं रोकेगी, जब तक कि अंतिम प्रवासी को उसके गृह राज्य में वापस नहीं भेज दिया जाता।

जज बोले- कई लोगों को नहीं मिल पाया लाभ
जस्टिस अशोक भूषण, न्यायमूर्ति एस. के. कौल और न्यायमूर्ति एम. आर. शाह की पीठ ने कहा कि कोई संदेह नहीं है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने कदम उठाए हैं, लेकिन कई ऐसे व्यक्ति भी हैं, जिन्हें इसका लाभ नहीं मिल पाया।

कोर्ट ने कहा- होनी चाहिए स्पष्ट नीति
बेंच ने इन कामगारों की यात्रा के भाड़े के बारे में सवाल किये और कहा, ‘‘हमारे देश में बिचौलिया हमेशा ही रहता है। लेकिन हम नहीं चाहते कि जब भाड़े के भुगतान का सवाल हो तो इसमें बिचौलिया हो। इस बारे में एक स्पष्ट नीति होनी चाहिए कि उनकी यात्रा का खर्च कौन वहन करेगा।'' इससे पहले, सुनवाई शुरू होते ही सॉलिसीटर जनरल ने केन्द्र की प्रारंभिक रिपोर्ट पेश की और कहा कि एक से 27 मई के दौरान इन कामगारों को ले जाने के लिये कुल 3,700 विशेष ट्रेन चलायी गयी और सीमावर्ती राज्यों में अनेक कामगारों को सड़क मार्ग से पहुंचाया गया। उन्होंने कहा कि बुधवार तक करीब 91 लाख प्रवासी कामगारों को उनके पैतृक घरों तक पहुंचाया गया है।

कोर्ट ने मामले का स्वत: लिया था संज्ञान
कोविड-19 महामारी की वजह से चार घंटे की नोटिस पर 25 मार्च से देश में लागू लॉकडाउन के कारण देश के विभिन्न हिस्सों में लाखों भूखे प्यासे श्रमिक विभिन्न जगहों पर फंस गये। उनके पास ठहरने की भी सुविधा नहीं थी। इन श्रमिकों ने आवागमन का कोई साधन उपलब्ध नहीं होने की वजह से पैदल ही अपने अपने घर की ओर कूच कर दिया था। शीर्ष अदालत ने 26 मई को इन कामगारों की दयनीय स्थिति का स्वत: संज्ञान लिया था अैर उसने केन्द्र और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर इस संबंध में जवाब मांगा था।

राज्य सरकार दें मजदूरों के फ्री भोजन, ठहरने की सुविधाएं
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि केन्द्र और राज्यों ने राहत के लिये कदम उठाये हैं लेकिन वे अपर्याप्त हैं और इनमें कमियां हैं। साथ ही उसने केन्द्र और राज्य से कहा था कि वे श्रमिकों को तत्काल नि:शुल्क भोजन, ठहरने की सुविधा उपलब्ध करायें तथा उनके अपने-अपने घर जाने के लिये परिवहन सुविधा की व्यवस्था करें।

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