कोरोना से इस परिवार के एक शख्स की मौत क्या हुई, पूरी दुनिया इनकी दुश्मन बन गई, रूला देगा इनका दर्द

Know What happened when one person of this family died from Corona - Sakshi Samachar

पांच दिन घर वाले करते रहे इंतजार

यह तो सिर्फ एक बानगी भर है

SOP के नाम पर शव को अपने यहां ही डाले रहे

नई दिल्ली : जीते जी तो कोरोना का खौफ लोगों को परेशान कर ही रहा है, लेकिन कोरोना से मरे तो मरने के बाद भी न तो मरने वाले को चैन से चिता मिल पाएगी और न ही उसके अपनों को शांति। जी हां, कोरोना संक्रमण से होने वाली मौतों की सच्चाई यही है। मौत के बाद भी उसके शव और परिजनों को चैन नहीं मिल पा रहा। आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे हालात देश के किसी दूर दराज गांवों की नहीं, बल्कि राजधानी दिल्ली की है।

पांच दिन घर वाले करते रहे इंतजार

सरकारी मशीनरी की ढुलमुल नीति का आलम यह है कि कोरोना संक्रमित का शव प्राप्त करने के लिए पांच दिन तक घर वाले इंतजार करते रहे। कई दिन बाद जब शव हासिल हुआ तो उसे श्मशान के अंदर अंतिम संस्कार का अवसर नहीं मिला। लिहाजा अस्पताल के मुर्दाघर से कई दिन बाद मिले शव को लेकर रोते-बिलखते परिजन उसे फिर से श्मशान से अस्पताल के मुर्दाघर में ही वापस रख आए।

यह तो सिर्फ एक बानगी भर है

यह तो सिर्फ एक बानगी भर है। देश की राजधानी के बाकी अस्पतालों में कोरोना संक्रमण से मरने वाले बदकिस्मतों के शवों का क्या आलम होगा? इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। घटनाक्रम के मुताबिक, दिल्ली के सनलाइट कॉलोनी में रहने वाले ललित (38) की 7 मई को सुबह करीब 10 बजे एक निजी अस्तपाल में मौत हो गई। मृतक को संभवत: कोरोना संक्रमित माना जा रहा है।

SOP के नाम पर शव को अपने यहां ही डाले रहे

7 मई को सुबह दस बजे के बाद पुलिस और दिल्ली सरकार की फौज करते-धरते 7 व 8 मई की रात करीब 2 बजे (8 मई 2020) शव को एम्स ट्रामा सेंटर के शवगृह (पोस्टमॉर्टम हाउस) में रखवा पाए। ललित के बड़े भाई मोहन लाल के मुताबिक, "7 मई को पूरे दिन पुलिस और प्राइवेट अस्पताल वाले स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग सिस्टम (एसओपी) का पालन कराने के नाम पर ललित के शव को अपने यहां ही डाले रहे।"

एक-दूसरे पर मढते रहे आरोप

इस बारे में पूछे जाने पर कि घटना वाले दिन यानि 7 मई को मौके पर निजी अस्पताल पहुंचे एक पुलिस अधिकारी ने कहा, "कोविड-19 मामले में मौत को लेकर जो गाइडलाइंस हैं, उनका पालन करना जरुरी है। मगर मौके पर यह सब काम उस निजी अस्पताल को करना था, जिसके यहां मरीज की मौत हुई। पुलिस का काम तो सिर्फ शव को अपनी निगरानी में पोस्टमार्टम हाउस में ले जाकर रखना भर था।"

शव घंटों इधर से उधर घुमाने के लिए गाइडलाइंस बनाई हैं?

ललित के 17 साल के बेटे और ललित के पारिवारिक सदस्य सुनील के मुताबिक, "7 मई को रात के वक्त हाथ-पैर जोड़ने पर निजी अस्पताल ने शव को सील करके एम्स ट्रॉमा सेंटर के पोस्टमॉर्टम हाउस में भेजा। वहां पहुंचते और शव रखने के कागजात पूरे करते-करते आधी रात यानि 7 से बदलकर 8 मई की तारीख हो गई। जबकि सनलाइट कॉलोनी में जिस अस्पताल में ललित की मौत हुई, वहां से ट्रॉमा सेंटर की दूरी महज 7-8 किलोमीटर की है। यानि 8 किलोमीटर की दूरी पर शव पहुंचाने में सरकारी मशीनरी को 14-15 घंटे लग गए। क्या सरकार ने कोविड-19 से मरने वालों के शव घंटों इधर से उधर घुमाने के लिए ही गाइडलाइंस बनाई हैं?"

चीख-चीख कर कहते रहे कि...

ललित के बड़े भाई मोहन लाल के अनुसार, "हम लोग पुलिस और दिल्ली सरकार तथा जहां ललित की मौत हुई, उस निजी अस्पताल से चीख-चीख कर कहते रहे कि, चूंकि हमारे यहां कोरोना पॉजिटिव संक्रमण से एक शख्स (ललित) की मौत हो चुकी है इसलिए दिल्ली सरकार, पुलिस और निजी अस्पताल में से कोई भी हमारे परिवार के सभी सदस्यों का कोरोना टेस्ट करा दे। मगर किसी ने ध्यान नहीं दिया। ऊपर से ललित का शव शवगृह में भेजने में ही पूरा दिन और आधी रात गुजार दी। आधी रात को भी ललित का शव निजी अस्पताल ने एम्स ट्रॉमा सेंटर में भिजवाने का इंतजाम तब शुरू किया, जब पुलिस ने अस्पताल प्रशासन को धमकाया कि उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की तैयारी हो रही है।"

शव पांच-छह दिन तक वहां क्यों रखा रहा?

जब ललित का शव 7-8 मई की रात ही एम्स ट्रॉमा सेंटर शवगृह में पहुंच गया तो फिर शव पांच-छह दिन तक वहां क्यों रखा रहा? परिवार वालों को ललित का शव छह दिन बाद परिवार के हवाले पोस्टमॉर्टम हाउस से क्यों किया गया? पूछने पर एम्स ट्रॉमा सेंटर फॉरेंसिक प्रमुख डॉ. संजीव लालवानी ने कहा, "कोविड-19 की गाइडलाइंस पर हमें सब कुछ करना होता है। हमें कोरोना संक्रमित किसी भी मरीज का सैंपल लेकर रिपोर्ट मंगाने में ब-मुश्किल एक दिन या फिर उससे कुछ ऊपर नीचे का समय लगता है। हालांकि यह सब पुलिस इंक्वेस्ट पर डिपेंड होता है।"

बिना पुलिस कागजात के खुद बिना पोस्टमॉर्टम के शव को कैसे सौंप देते?
संजीव लालवानी के मुताबिक, "जहां तक ललित का शव 5-6 दिन बाद परिवार वालों को दिए जाने की बात है, तो इसमें हमारा कोई फॉल्ट नहीं है। हमें एसीपी की तरफ से शव को बिना पोस्टमॉर्टम किए ही परिवार वालों के हवाले कर देने संबंधी अधिकारिक पत्र ही 12 मई 2020 को मिला है। जबकि हमारे यहां शव 7-8 की रात कहिए या फिर 8 मई को पहुंचा था। ऐसे में हम बिना पुलिस कागजात के खुद शव को बिना पोस्टमॉर्टम के कैसे सौंप देते? देरी पुलिस की तरफ से हुई हो या फिर किसी और स्तर पर? यह मैं नहीं कह सकता हूं। हां, इतना जरूर है कि हमें जैसे ही एसीपी से लिखित आदेश मिला कि हम ललित के शव को बिना पोस्टमॉर्टम किए हुए ही सौंप दें, हमने शव तुरंत हैंडओवर कर दिया।"

डॉ. संजीव लालवानी ने परिवार वालों के तमाम आरोपों का किया खंडन

एम्स ट्रॉमा सेंटर फॉरेंसिक साइंस विभाग के प्रमुख डॉ. संजीव लालवानी ने परिवार वालों के और भी तमाम आरोपों का खंडन किया। उन्होंने कहा, "यह आरोप सरासर गलत है कि ललित के शव को निगमबोध घाट भिजवाने के लिए एंबुलेंस और कॉफिन (ताबूत) के लिए फॉरेंसिक साइंस डिपार्टमेंट में किसी ने 10 हजार रुपये लिए।" उन्होंने आगे कहा कि हम गाइडलाइन के मुताबिक कोरोना संक्रमित शव को भिजवाने के लिए अपनी एंबुलेंस देते हैं। जहां तक ताबूत की बात है, हम उसे इस्तेमाल ही नहीं करते क्योंकि उससे संक्रमण और ज्यादा फैलने की आशंका रहती है। पोस्टमॉर्टम हाउस विशेष किस्म के डबल कवर में शव को बंद करके देता है।

डॉ. सुधीर गुप्ता ने कहा, सभी आरोप गलत पाए गए हैं

हालांकि, इस पूरे मसले पर एम्स फॉरेंसिक साइंस हेड डॉ. सुधीर गुप्ता ने भी कहा, "मैंने ललित की मौत के बाद शव देने में हुई देरी और ललित के परिवार वालों के आरोपों की जांच कराई। आरोप गलत पाए गए हैं। असल में जब ललित का शव हैंडओवर किया गया, उस वक्त एम्स ट्रॉमा सेंटर की शव-वाहन पहले से ही किसी और शव को लेकर गया हुआ था। लिहाजा आरोप लगा रहे परिजनों ने ललित का शव ले जाने के लिए किसी बाहरी शख्स से शव-वाहन और ताबूत का इंतजाम किया होगा। एम्स ट्रॉमा सेंटर का रुपयों के लेन-देन से कोई मतलब नहीं है। हमारे यहां शव भिजवाने का नि:शुल्क इंतजाम है।"

जांच में हमारे किसी भी कर्मचारी की भूमिका संदिग्ध नहीं मिली

डॉ. सुधीर गुप्ता और डॉ. संजीव लालवानी ने आगे कहा, "जांच में हमारे किसी भी कर्मचारी की भूमिका संदिग्ध नहीं मिली है।" बहरहाल, ललित के परिवार वालों की परेशानी यहीं दूर नहीं हुई। छह दिन बाद जब वे शव लेकर निगमबोध घाट स्थित सीएनजी शमशान घाट पहुंचे तो तब तक काफी देर हो चुकी थी। उन्हें वहां बताया गया कि, अंतिम संस्कार कराने वाली 6 में से 3 मशीनें खराब पड़ी हैं। तीन जो चालू हैं, उन पर एक दिन में 14 शवदाह ही संभव हैं। लिहाजा ललित के  शव को एक बार फिर से श्मशान से एम्स ट्रॉमा सेंटर के शवगृह में ले जाकर सुरक्षित रखवाना पड़ा। अगले दिन जाकर यानि करीब 7वें दिन कोविड-19 के संक्रमण से मरने वाले बदकिस्मत ललित के शव का अंतिम संस्कार किया जा सका।

तो एक साथ उठाकर परिवार को एक स्कूल में ले जाकर क्वारेंटीन कर दिया गया है
पीड़ित परिवार का आरोप है कि जब ललित की मौत हुई, तब लाख चीखने-चिल्लाने के बाद भी किसी ने उन्हें क्वारेंटीन नहीं किया, न ही जांच के लिए नमूने लिए गए। अब जब दिल्ली के सरकारी तंत्र को होश आया तो एक साथ उठाकर परिवार के 5-6 लोगों को एक स्कूल में ले जाकर क्वारेंटीन कर दिया गया है। साथ ही मकान भी सील कर दिया गया है।
उल्लेखनीय है कि कोरोना काल में दिल्ली के तकरीबन सभी पोस्टमॉर्टम हाउस में शवों के पहुंचने की संख्या नगण्य है। जो पहुंच भी रहे हैं, उनमें भी अधिकांश कोविड-19 संक्रमित शव हैं।

किसी भी शव की जांच रिपोर्ट में कोरोना संक्रमण लैब ने लिखकर नहीं दिया

हालांकि दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल के फॉरेंसिक साइंस डिपार्टमेंट के एक एक्सपर्ट के मुताबिक, "दो महीने के कोरोना काल में करीब 37-38 शव का पोस्टमॉर्टम किया गया। सबके सैंपल भी जांच के लिए भेजे गये। इसके बावजूद अब तक एक के सिवाय बाकी किसी भी शव की जांच रिपोर्ट में कोरोना संक्रमण लैब ने लिखकर नहीं दिया।"

-आईएएनएस

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