हैदराबाद से इस तरह जुड़ा है 'बापू' के हत्यारे नाथुराम गोडसे का नाम...

Know Nathuram Godse Connection With Hyderabad - Sakshi Samachar

हैदराबाद निजाम के खिलाफ थे गोडसे

एक समाचार पत्र को लेख भेजते थे गोडसे

नई दिल्ली: देश के 'बापू' महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे सोमवार सवेरे से ही सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है। आज ही के दिन गोडसे को फांसी की सजा ​दी गई थी। बता दें कि नाथूराम को लेकर लंबे समय से दो तरह की बातें सामने आती हैं। एक धड़ा वह, जो हमेशा से नाथूराम गोडसे का मंदिर बनवाने की बात करता है। सोशल मीडिया पर ऐसे ही लोगों की वजह से #नाथूराम_गोडसे_अमर_रहे जैसे नारे ट्रेंड कर रहे हैं।

गौरतलब है कि नाथूराम गोडसे को लेकर हमेशा से ही यह बात की जाती रही है कि महात्मा गांधी के इस हत्यारे का संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ था। हालांकि खुद RSS ने कभी भी यह नहीं माना है। जबकि गोडसे का परिवार हमेशा से यह मानता रहा है कि वह संघ का कट्टर सदस्य था। गोडसे के परिवार का कहना है कि जीवन के आखिरी वर्षों में उसने भले ही RSS की आलोचना की हो, लेकिन हिंदुओं पर अत्याचारों करने को लेकर हैदराबाद के निजाम के विरोध में साल 1938 में उसने RSS सदस्यों का साथ दिया था।

सावरकर और गोडसे के लेख

वीर सावरकर के परिवार से जुड़े सात्यकी सावरकर ने एक बार कहा था कि उनके परिवार ने नाथूराम और गोपाल गोडसे के सभी लेख संभालकर रखे हैं। उनमें से कुछ से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि नाथूराम गोडसे 1930 के दशक की शुरुआत तक RSS का समर्पित सदस्य था। इसके बाद वह संघ की कट्टरता में कथित तौर पर कमी आने की वजह से उससे कुछ दूर हो गया था।

हैदराबाद निजाम के खिलाफ थे गोडसे

सात्यकी के अनुसार, नाथूराम का मानना था कि हिंदुओं पर कई अत्याचार होने के बावजूद RSS पर्याप्त रूप से आक्रामक रुख नहीं अपना रहा था। यह भी बताया कि नाथूराम गोडसे ने हैदराबाद के निजाम के खिलाफ साल 1938-39 में भाग्यपुर में आयोजित 'मुक्ति संग्राम' में हिस्सा लिया था।

सात्यकी ने आगे कहा कि नाथूराम इस्लामिक राज्य के पूरी तरह खिलाफ थे। जो निजाम हैदराबाद में अपनी सरकार स्थापित करना चाहते थे, वे उन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं करते थे। RSS के साथ मतभेदों के बावजूद नाथूराम का मानना था कि निजाम के शासन के खिलाफ स्वयंसेवकों के संघर्ष को समर्थन देने की जरूरत है।

एक समाचार पत्र को लेख भेजते थे गोडसे

सात्यकी ने बताया कि नाथूराम स्वयंसेवकों के उस पहले वर्ग का हिस्सा थे, जिसे संघ ने हैदराबाद में हिंदू परिवारों की पहचान और उन्हें एकजुट करने के लिए एक परियोजना के तौर पर बनाया था। वह एक समाचार पत्र को लेख भेजते थे और उनमें से कई प्रकाशित भी हुए थे। ऐसे बहुत से लेख हमारे परिवार ने संभाल कर रखे हैं।' बता दें कि RSS हमेशा से यह कहता रहा है कि महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे ने 1948 में इस हत्या को अंजाम देने से काफी पहले ही संगठन छोड़ दिया था।

हालांकि गांधी की हत्या के मामले में एक अन्य आरोपी रहे नाथूराम के छोटे भाई गोपाल गोडसे ने 1994 में कहा था कि तीनों गोडसे बंधु- नाथूराम, दत्तात्रेय और गोपाल RSS का हिस्सा थे और उन्होंने संगठन को नहीं छोड़ा था। सात्यकी सावरकर ने कहा कि इस बात में कोई शक नहीं है कि नाथूराम सहित गोडसे बंधु कई वर्षों तक RSS के सदस्य थे।

आरएसएस के साथ संबंध

उन्होंने बताया, '1940 के दशक में नाथूरामजी ने RSS और हिंदू महासभा, दोनों की निंदा की थी। यही नहीं, उन्होंने हिंदू राष्ट्र दल के नाम से अपना संगठन भी बनाया था, लेकिन उन्होंने हिंदुत्व शिविर आयोजित करना जारी रखा था। उनकी एक पुरानी सहयोगी के अनुसार, साल 1943 में बारामती में RSS के शिविर के जैसा ही एक आयोजन किया गया था। यह स्पष्ट नहीं है कि उन्होंने वास्तव में कब संघ छोड़ा था, लेकिन वह निश्चित तौर पर संगठन से नाराज थे। 1946 में उन्होंने हिंदू महासभा को भी छोड़ दिया था क्योंकि उन्होंने महसूस किया था कि वह विद्रोह चाहते हैं और उन्हें संवैधानिक तरीकों से नहीं किया जा सकता।'

सात्यकी गोपाल गोडसे के पौत्र या सावरकर के?

गोपाल गोडसे के पौत्र सात्यकी एक सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल हैं और अब वह वास्तविक हिंदू महासभा को फिर से शुरू कर रहे हैं। हिंदू महासभा की स्थापना हिंदुत्व विचारक वीर सावरकर ने की थी। सात्यकी ने बताया, 'मैंने बचपन में RSS की शाखाओं में हिस्सा लिया है। मेरे पूर्वज ही नहीं, बल्कि मेरे कुछ चचेरे भाई भी RSS के साथ थे। हालांकि मेरा मानना है कि RSS अब सेवा और सांस्कृतिक जुड़ाव से संबंधित है। वह राजनीतिक अधिकारों के लिए हिंदुओं को एकजुट करने और ताकतवर बनाने के सावरकर के मूल संदेश को भूल गया है। सावरकर का हिंदुत्व RSS के हिंदुत्व से अलग है।'

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