कृषि कानूनों को लेकर सरकार हुई सख्त, कृषि मंत्री बोले इससे बेहतर नहीं कर सकती सरकार

 Government Becomes Strict Regarding Agricultural Laws - Sakshi Samachar

सरकार और किसानों के बीच हो चुकी हैं 11 बैठकें

कृषि कानून वापस लेने की मांग पर अडे़ किसान संगठन

 

नई दिल्ली : सरकार और किसानों के बीच हुई 10 वें दौर की बैठक (10th Round Meeting) में सरकार ने नये कृषि कानूनों (New Agricultural Laws) को डेढ़ साल तक रोक लगाने का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव को किसानों (Farmers) ने ठुकरा दिया। इसके बाद आज हुई बैठक में सरकार (Government) ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि हम इससे बेहतर नहीं कर सकते हैं।

सरकार और किसानों के बीच शुक्रवार को वार्ता तब अटक गई जब किसान नेता तीनों नए कृषि कानूनों को पूरी तरह वापस लिए जाने तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी दिए जाने की अपनी मांग पर लगातार अड़े रहे। केंद्र ने उनसे कृषि कानूनों को 12-18 महीने के लिए निलंबित रखने के प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने को कहा। ग्यारहवें दौर की वार्ता के आज बेनतीजा रहने के साथ ही किसान नेताओं ने आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी। वार्ता के पिछले 10 दौर के विपरीत आज 11वें दौर की वार्ता में अगली बैठक की कोई तारीख तय नहीं हो पाई। ़

सरकार ने अपनाया कड़ा रुख
सरकार ने आज अपने रुख में कड़ाई लाते हुए कहा कि यदि किसान यूनियन कानूनों को निलंबित किए जाने संबंधी प्रस्ताव पर चर्चा के लिए सहमत हों तो वह दोबारा बैठक करने के लिए तैयार है। इसके साथ ही किसान संगठनों ने कहा कि वे अब अपना आंदोलन तेज करेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि बैठक के दौरान सरकार का रवैया ठीक नहीं था। किसान नेताओं ने यह भी कहा कि 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली योजना के अनुरूप निकाली जाएगी और यूनियनों ने पुलिस से कहा है कि इस दौरान शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी सरकार की है। 

केंद्र ने पिछले दौर की वार्ता में कानूनों को निलंबित रखने तथा समाधान ढूंढ़ने के लिए एक संयुक्त समिति बनाने की पेशकश की थी। किसान नेताओं ने आज की बैठक के बाद कहा कि भले ही बैठक पांच घंटे चली, लेकिन दोनों पक्ष मुश्किल से 30 मिनट के लिए ही आमने-सामने बैठे। बैठक की शुरुआत में ही किसान नेताओं ने सरकार को सूचित किया कि उन्होंने बुधवार को पिछले दौर की बैठक में सरकार द्वारा रखे गए प्रस्ताव को खारिज करने का निर्णय किया है। कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर सहित तीनों केंद्रीय मंत्रियों ने किसान यूनियनों के प्रतिनिधियों से अपने रुख पर पुनर्विचार करने को कहा जिसके बाद दोनों पक्ष दोपहर भोज के लिए चले गए। किसान नेताओं ने अपने लंगर में भोजन किया जो तीन घंटे से अधिक समय तक चला। 

क्या बोले राकेश टिकैत
भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि सरकार ने कहा कि कानूनों को निलंबित रखने की अवधि दो साल तक विस्तारित की जा सकती है, लेकिन यूनियन तीनों कानूनों को पूरी तरह वापस लिए जाने तथा फसलों की खरीद पर एमएसपी की कानूनी गारंटी दिए जाने की अपनी मांगों पर अड़ी रहीं। मंत्रियों ने किसान यूनियनों से कहा कि उन्हें सभी संभव विकल्प दिए गए हैं और उन्हें कानूनों को निलंबित रखने के प्रस्ताव पर आपस में आंतरिक चर्चा करनी चाहिए। 

एक और बैठक के लिए तैयार सरकार
सूत्रों के अनुसार तोमर ने किसान नेताओं से कहा कि यदि वे प्रस्ताव पर चर्चा करना चाहते हैं तो सरकार एक और बैठक के लिए तैयार है। मंत्री ने यूनियनों का उनके सहयोग के लिए धन्यवाद भी किया और कहा कि हालांकि कानूनों में कोई समस्या नहीं है, लेकिन सरकार ने प्रदर्शनकारी किसानों के सम्मान के लिए इन्हें निलंबित रखने की पेशकश की है। बैठक स्थल से बाहर आते हुए किसान नेता शिवकुमार कक्का ने कहा कि चर्चा में कोई प्रगति नहीं हुई और सरकार ने अपने प्रस्ताव पर यूनियनों से पुन: विचार करने को कहा। कक्का बैठक से जाने वाले पहले व्यक्ति थे, लेकिन उन्होंने कहा कि यह ‘‘कुछ निजी कारणों'' की वजह से है। 

किसानों के हित में प्रस्ताव
कृषि मंत्री तोमर ने आज की बैठक के बाद कहा कि सरकार और किसानों के बीच अक्टूबर से बातचीत चल रही है तथा अब तक वार्ता के 11 दौर हुए हैं एवं एक बैठक अधिकारियों के साथ हुई। उन्होंने कहा कि किसानों के फायदे के लिए संसद में कृषि सुधार विधेयकों को पारित किया गया और आंदोलन मुख्य रूप से पंजाब के किसानों तथा कुछ अन्य राज्यों के कुछ किसानों द्वारा किया जा रहा है। तोमर ने कहा कि सरकार ने हमेशा यह कहा है कि वह कानूनों को निरस्त करने के अलावा अन्य विकल्पों पर विचार करने को तैयार है। उन्होंने कहा, ‘‘हमारा प्रस्ताव किसानों और देश के हित में है। हमने यूनियनों से हमारे प्रस्ताव पर शनिवार तक अपना फैसला बताने को कहा है। यदि वे सहमत हैं, तो हम फिर से बैठक करेंगे।'' 

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मंत्री ने कहा कि सरकार ने आंदोलन खत्म करने के लिए कई प्रस्ताव दिए, लेकिन जब आंदोलन की शुचिता खो जाती है तो कोई समाधान संभव नहीं होता। उन्होंने कहा कि कुछ बाहरी ताकतें निश्चित रूप से आंदोलन जारी रखने की कोशिश कर रही हैं और जाहिर है कि वे ताकतें किसानों के हितों के खिलाफ हैं। दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे किसानों में से अधिकतर पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश से हैं। किसान संगठनों का आरोप है कि नए कृषि कानूनों से मंडी और एमएसपी खरीद प्रणालियां समाप्त हो जाएंगी तथा किसान बड़े कॉरपोरेट घरानों की दया पर निर्भर हो जाएंगे। 

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