ऐसी है 'लॉकडाउन' में विरोधी दल के नेताजी की दिनचर्या, थोड़ा गुस्सा और इस बात की है खुशी

SP Leader Manoj Singh Daily Routine During Lock Down in Hyderabad - Sakshi Samachar

माता सीता को भी भुगतनी पड़ी थी सजा

पोते के साथ कर रहा हूं एन्जॉय

नमक रोटी खाकर की बचत

आज वक़्त दे भी रहे हैं तो क्या? 

घर के काम में निपुण हो रही हैं बेटियां

सीरीजः कोरोना की कहानी

हैदराबाद : 'लॉकडाउन' के दौरान बड़ी संख्या में मजदूर तबके के लोग अपने-अपने घर जाने के लिए कतारबद्ध हैं। दिल्ली और उत्तर प्रदेश के बॉर्डर पर स्थित आनंद विहार बस अड्डे के हालात भयावह हैं। उत्तर प्रदेश, बंगाल और बिहार के ये लोग किसी भी कीमत पर घर पहुंचना चाहते हैं। अब तक कई किलोमीटर की दूरी वे पैदल तय कर चुके हैं। सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि इस दौरान न तो ये सोशल डिस्टेंसिंग बनाकर रख रहे हैं और न ही कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए जरूरी सावधानियों का ध्यान रख रहे हैं। हालांकि सरकार इन मजदूरों के मदद की पूरी कोशिश कर रही है, लेकिन हालात भयावह हैं। कोरोना की कहानी के सीरीज की इस कड़ी में आइए जानते हैं आज फिर एक नई कहानी।
 
कैसे गुजार रहे हैं अपना वक्त
ऐसे दौर में अक्सर जनता के बीच रहने वाले नेतागण क्या कर रहे हैं? अपने लोगों को वह किस तरह से समझाने की कोशिश कर रहे हैं, उनसे क्या कहना चाह रहे हैं, खुद अपना वक्त कैसे गुजार रहे हैं, जैसी कई बातें जानने की उत्सुकता हुई तो सोशल मीडिया के माध्यम से हम चल पड़े उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के पूर्व एमएलए मनोज सिंह के हैदराबाद स्थित घर की ओर। और जानने की कोशिश की कि आखिर समाजवादी पार्टी के ये नेता 'लॉकडाउन' के दौरान क्या कर रहे हैं... तो चलिए, जानते हैं।

माता सीता को भी भुगतनी पड़ी थी सजा 
अक्सर जनता के बीच अपना वक्त बिताने वाले समाजवादी पार्टी के नेता मनोज सिंह 'लॉकडाउन' के दौरान अपना वक्त परिवार के साथ बिता रहे हैं। उनका कहना है कि यह मुश्किल दौर है, लेकिन हम सभी को मिलकर इसका सामना करना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पंक्तियां दोहराते हुए वह कहते हैं, "यकीनन घर के दरवाजे को हमें 'लक्ष्मण रेखा' मान लेना है और उससे बाहर निकलने की गलती नहीं करनी है। यह न भूलें कि खुद माता सीता ने भी जब 'लक्ष्मण रेखा' पार की थी तो उन्हें इसकी सजा भुगतनी पड़ी थी, फिर हमारी-आपकी क्या बिसात! बेशक, इस रेखा को पार करने की सजा हममें से किसी को भी भुगतनी पड़ सकती है। इसलिए बेहतर है कि हम अपने-अपने घरों की चहारदीवारी की सीमा को लांघने की कोशिश न करें।"

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पोते के साथ कर रहा हूं एन्जॉय
'लॉकडाउन' के दौरान वह अपना वक्त कैसे बिता रहे हैं? पूछने पर चंदौली के पूर्व एमएलए कहते हैं, "रोज कुछ नया सीखने की कोशिश कर रहा हूं। घर पर बीवी-बच्चों के काम में हाथ बंटा रहा हूं। 'पाक कला' में निपुण होने की कोशिश कर रहा हूं। कभी सब्जी काट रहा हूं तो कभी पका रहा हूं। इन सबके अलावा मेरा सबसे ज्यादा वक्त हमारे घर आए नए मेहमान के साथ बीत रहा है। दरअसल, अभी-अभी मैं दादा बना हूं, इसलिए हम सभी परिवारवालों का ज्यादा वक्त उसे नहलाने-धुलाने, तैयार करने और उसके साथ खेलने में ही बीत जाता है। सच तो यह है कि अपने बच्चों के लिए मैंने कभी वक़्त नहीं निकाला, पत्नी को ज़िंदगी भर इस वजह से मुझसे शिकायत भी रही पर आज पोते के साथ क्वालिटी टाइम गुजारकर बहुत ख़ुश हूं।

नमक रोटी खाकर की बचत
मुश्किल के इस वक़्त में मनोज सिंह खुद तो बचत कर ही रहे हैं, दूसरों को भी बचत की सीख देने की कोशिश कर रहे हैं। वह कहते हैं, "कल हमारे पूरे परिवार ने नमक रोटी खाया। अज्वायन, प्याज, लहसुन, नमक डालकर राई के तेल से तैयार की गई आटे की यह 'मोटी रोटी' तकरीबन 20 साल बाद खाई होगी। यकीन मानिए, खाकर मानो आत्मा तृप्त हो गई। बेशक हमने सब्जी बचाने की फिराक में वर्षों बाद इसे पकाया और खाया, लेकिन पुरानी यादें ताजा हो गईं और इतना लजीज स्वाद सदियों बाद चखने को मिला। बचत की बचत और स्वाद का स्वाद। एक पंथ दो काज। दूसरों को भी मैं यही कहना चाहूंगा कि आप भी 'लॉकडाउन' के दिनों में बचत की हमारी पुरानी परंपरा को दोहराएं। क्योंकि कहना मुश्किल है कि हमें इस दौर से कब तक गुजरना पड़ेगा। जब तक कोरोना के खिलाफ जंग में हम जीत नहीं जाते, यह लड़ाई अनवरत जारी रहेगी। इसलिए बचत की आदत डालें।

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अपनों के साथ बिताएं क्वालिटी टाइम
'लॉकडाउन' के दौरान घर पर वक्त बिताकर कैसा लग रहा है? पूछने पर वह कहते हैं, मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि कई साल से पत्नी की जो शिकायत थी कि मैं घर पर बिल्कुल वक्त नहीं देता। यहां तक कि उनका यह कहना कि मैंने अपने बच्चों के लिए भी कभी वक्त नहीं दिया, आज उसे दूर करने का मेरे पास एक सुनहरा मौका है। मैं इसे खूब एंज्वॉय कर रहा हूं और लोगों से भी यही कहना चाहता हूं कि आप इस 'लॉकडाउन' को अन्यथा न लें। बेहतर होगा कि 'लॉकडाउन' के इस दौर को आप अपनों के साथ वक्त बिताने का एक बेहतरीन मौका मानें और जो अब तक नहीं कर पाए थे, अब करें। परिवार और अपनों के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं। और पूरी ज़िंदगी की उनकी शिकायत दूर कर दें। 

आज वक़्त दे भी रहे हैं तो क्या?
हालांकि पूर्व एमएलए साहब की धर्मपत्नी नीलू जी का हाल-ए-दिल जब मैंने जानने की कोशिश की तो मालूम हुआ कि पूरे दिन पति का साथ पाकर भी वह खुश नहीं हैं। वह कहती हैं, "इतने वर्षों बाद साथ दिया भी तो क्या? जब उनका साथ चाहती थी, तब तो कभी नहीं दिया न!" यानि नाराजगी अब भी साफ़ झलक रही थी कि इतने सालों से पति से अपने और घर के लिए वक्त मांगती रही, तब कभी भी उन्होंने हमारे लिए वक्त नहीं निकाला। और उम्र के इस पड़ाव पर अब जाकर वे यह वक्त दे भी रहे हैं तो क्या? जब मांगा तब तो उन्होंने मुझे या बच्चों को वक्त दिया ही नहीं! 

घर के कामकाज में निपुण हो रही हैं बेटियां
'लॉकडाउन' के दौरान सभी घर पर हैं इसलिए बच्चों ने अब तक जो नहीं सीखा था, वह सब उन्हें अब सिखाया जा रहा है। नीलू कहती हैं, "दोनों बेटियां कामकाजी हैं। बड़ी बेटी शिल्पी फैशन के क्षेत्र से जुड़ी है और हैदराबाद में खुद का बूटिक चलाती है। वहीं, छोटी बेटी एयर इंडिया में पायलट है। दोनों को घर के काम सिखाने का मौका पहले नहीं मिल पाया था। आज मौका मिला है, जब दोनों बेटियों को घर के कामकाज और खाना बनाने में निपुण कर रही हूं।" वहीं, शिल्पी कहती हैं, "यूं तो इन दिनों मैं खाना पकाना सीख रही हूं, लेकिन खासकर सीख रही हूं खडना जैसी उत्तर प्रदेश की कई पारंपरिक डिशेज बनाना। मां के साथ यह सब सीखना एक नया अनुभव है क्योंकि पहले कभी खाना पकाने का मौका मुझे मिला नहीं था। मां एक बार बताकर अपने काम में व्यस्त हो जाती हैं और मैं कुछ न कुछ भूल जाती हूं। फिर, पापा और मैं मिलकर खाना पकाते हैं। मजेदार अनुभव है यह सब।"

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बहू के लिए है ज्यादा परेशानी
एमएलए साहब कहते हैं, "लॉकडाउन की वजह से हम सभी घर पर हैं। इस वजह से बहू को जरूर ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। हमारी मौजूदगी में वह कमरे से बाहर नहीं निकल पा रहीं। दरअसल, अभी-अभी उनकी डिलीवरी हुई है इसलिए वह बेड रेस्ट पर हैं और केवल टेलीविजन देखकर अपना मन बहला रही हैं। छोटी बेटी पायलट है और इन दिनों घर के कामकाज में अपना मन रमाए हुए है। बेटा दिनभर घर की समस्याओं के समाधान में जुटा रहता है। माता-पिता हमारे चाचा-चाचीजी के पास गए हुए थे इसलिए इन दिनों वे सभी हमारे फॉर्म हाऊस वाले घर में ही रुके हुए हैं।"

तस्वीरें देख व्यथित है मन 
21 दिनों के इस 'लॉकडाउन' के बीच मजदूरों के घर लौटने की जिद की तस्वीरें देख उनके मन में दुख उत्पन्न हो रहा है। वह कहते हैं, "मुझे बेहद दुख है कि बड़ी संख्या में मजदूर घर लौटने की जिद पर अड़े हैं। मुश्किल की इस घड़ी को वे किस तरह से पार पा सकते हैं, उन्हें यह बात समझाना टेढ़ी खीर है। वे इस बात को समझना ही नहीं चाहते कि इस वक्त वे जहां हैं, उन्हें वहीं रहना चाहिए। इस तरह भीड़ का हिस्सा बनकर वे न सिर्फ खुद को मुश्किल में डाल रहे हैं बल्कि अपने आसपास मौजूद लोगों की जान भी सांसत में डाल रहे हैं।"

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फूट रहा है लोगों का गुस्सा
मनोज कहते हैं, "मेरे पास महाराष्ट्र, हैदराबाद, उड़ीसा जैसे कई राज्यों में फंसे लोगों के फोन आ रहे हैं, वे सभी अपने घर लौटना चाहते हैं, लेकिन जब मैं उनसे कहता हूं कि आप जहां हैं वहीं सुरक्षित रह सकते हैं। बाहर न निकलें। हां, आर्थिक रूप से यदि आप मेरी मदद चाहते हैं तो मैं उसके लिए तैयार हूं। मैं आपकी जरूरत के मुताबिक कुछ रुपये ऑनलाइन ट्रांसफर कर देता हूं तो मुझ पर उनका गुस्सा फूट पड़ता है। वे कहते हैं कि हम सिर्फ वोट मांगने आते हैं और ऐसे वक्त में उनका साथ खड़े नहीं हैं। उन्हें यह समझा पाना मुश्किल है कि इस वक्त में सही क्या है और गलत क्या? पढ़े-लिखे न होने और समझदारी की कमी ऐसे लोगों के गुस्से की प्रमुख वजह है, पर मुश्किल के इस दौर में हम सभी मजबूर हैं। यह बात हर किसी को समझनी होगी।"

संकट के इस दौर में आत्मसंयम बनाए रखें
इस वक्त आप हैदराबाद में हैं और हर वक्त आपके साथ खड़ी रहने वाली जनता आपसे दूर अपने क्षेत्र में घरों में बंद। ऐसे में उनके लिए क्या कहना चाहेंगे? सवाल के जवाब में वह कहते हैं, "संकट के इस दौर में हर किसी को आत्मसंयम बनाए रखना चाहिए। परिवार वालों के साथ घर पर रहकर ही अपना वक्त बिताना चाहिए। अगर जरूरी सामान की खरीदारी में किसी भी तरह की दिक्कत या परेशानी आ रही हो तो चंदौली के डीएम के प्रयासों का लाभ उठाएं। उन्होंने कुछ ऐसे दुकानों को चिह्नित किया है, जो फोन पर ऑर्डर देने पर आपके घर तक जरूरी सामान पहुंचा रहे हैं। उनकी मदद लें और 'लॉकडाउन' के इन दिनों का पूरी सच्चाई के साथ पालन करें। इसी में हम सभी देशवासियों का भला है।"
 

-सुषमाश्री

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