BJP Foundation Day : ऐसे बदलता व बढ़ता जा रहा है भाजपा का स्वरूप, इनको दिया जा रहा 'श्रेय'

Changing And Increasing BJP with Leadership and Personalty in 40 Years - Sakshi Samachar

भाजपा की स्थापना के 40 साल पूरे

समय के साथ पार्टी में हुए बदलाव 

अटल-आडवाणी से मोदी-शाह तक पार्टी का विकास

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की स्थापना के 40 साल पूरे हो गए हैं। संघर्ष से निकली पार्टी आज इतिहास रच रही है। तीन सीट से शुरू हुआ सफर आज 300 तक पहुंच गया है। अटल-आडवाणी का बोया बीज अब एक वट वृक्ष बन गया है, जिसे आगे बढ़ाने का काम अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं। आइए जानते हैं समय के साथ भारतीय जनता पार्टी का स्वरूप कितना बदला है। क्या अटल-आडवाणी की भाजपा में अब कुछ बदलाव हुआ या फिर आज भी पार्टी उन्हीं सिद्धांतों पर कायम है।

भारतीय जनसंघ की स्थापना

कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष राजनीति के जवाब में राष्ट्रवाद के समर्थन में श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी। जनसंघ ने समाजवादी एवं अन्य पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव भी लड़ा। 1951 से 1977 तक भारतीय जनसंघ के नाम से जाने वाला यह संघठन अपने उग्र राष्ट्रवाद के लिए जाना जाता था।

भारतीय जनता पार्टी का गठन

भारतीय जनता पार्टी का गठन 1980 में उस वक्त हुआ, जब देश में गठबंधन की सरकार दो साल ही चल सकी। अब तक भारतीय राजनीति में समाजवादी और राष्ट्रवादी दो धड़ बन चुके थे। समाजवादियों और हिन्दू राष्ट्रवादियों का मिश्रण जनता पार्टी 1979 में विभाजित हो गई।

भारतीय जनसंघ के दो बड़े चेहरे अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी को छोड़ दिया और अलग पार्टी बनाने का फैसला किया। दिसंबर 1980 में मुंबई में भारतीय जनता पार्टी का पहला अधिवेशन हुआ। हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को आधार बनाते हुए भारतीय जनता पार्टी पहली बार 1984 के लोकसभा चुनाव में मैदान में उतरी। हालांकि उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली और पार्टी को सिर्फ दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा था।

अटल बिहारी की भाजपा

जनता पार्टी से अलग होने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने भाजपा की स्थापना की थी। नतीजा यह हुआ कि एमसी छागला, शांति भूषण, राम जेठमलानी, सिकंदर बख्त, सुषमा स्वराज और जसवंत सिंह जैसे बहुत से नेता पार्टी में शरीक हुए जिनकी पृष्ठभूमि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नहीं थी।

पार्टी में सिर्फ वाजपेयी और आडवाणी की नहीं चलती थी, बल्कि सभी नेताओं की राय ली जाती थी। इतना ही नहीं विपक्ष के नेता भी अटल बिहारी का सम्मान करते थे और उनकी राय लेते थे। 

मोदी-शाह की पार्टी
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री और अमित शाह के पार्टी अध्यक्ष बनने के साथ ही भाजपा की तीन धरोहर अटल, आडवाणी, मुरली मनोहर के युग की समाप्ति हो गई थी। इसे भाजपा का मोदी युग कहा गया। पार्टी का नेता ही नहीं संगठन, चुनाव लड़ने का तरीका, सरकार चलाने का तौर तरीका, फैसले लेने और उन्हें शिद्दत से लागू करने की तत्तपरता, पार्टी की नई पहचना बन गई।

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नरेंद्र मोदी के नाम पर जुड़ रहे लोग
2014 के बाद की भाजपा मोदी और शाह की भाजपा है। यहां फैसले पार्टी नहीं नेता लेता है और पार्टी उसे लागू करती है। इसे आप सत्ता का केंद्रीयकरण भी कह सकते हैं। कहा जाता है कि अब पार्टी में फैसला सिर्फ नरेंद्र मोदी और अमित शाह लेते हैं। जबकि अन्य नेताओं को सिर्फ बताया जाता है। पार्टी में टिकट बंटवारे से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री तक यही दोनों नेता तय करते हैं।

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