'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' पर कोरोना की तिरछी नजर...

Survey Report Says, Girl Child will effect more due to Corona - Sakshi Samachar

प्रमिला प्रजापति ने इस मुद्दे पर जताई चिंता

कमज़ोर परिवारों की लड़कियां पहले से ही इस जद में

कोरोना संक्रमित न होने के बावजूद खतरे में लड़कियां

नई दिल्ली: 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' (Save Girl Child) का नारा हमारे देश में सबसे ज्यादा चर्चित है। बेटियों की शिक्षा (Girl Education) पर आज हम सबसे ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। हमारी पूरी कोशिश होती है कि हर घर में बेटियां अवश्य शिक्षित हों। कहा भी जाता है कि एक बेटी को पढ़ाने का अर्थ है, एक पूरे परिवार को पढ़ाना। लेकिन कोरोना (COVID-19) काल ने हमारी इस सोच और पहल को काफी पीछे धकेल दिया है। कोरोना का असर सबसे ज्यादा बेटियों की शिक्षा पर दिख रहा है।

एक स्टडी के मुताबिक, कोरोना की मार खासतौर पर स्कूली लड़कियों की पढ़ाई पर भी दिख रही है। हो सकता है कि सेकेंडरी स्कूल में पढ़ रही लगभग 20 मिलियन लड़कियां कभी स्कूल न लौट सकें। राइट टू एजुकेशन फोरम (RTE Forum) ने सेंटर फॉर बजट एंड पॉलिसी स्टडीज (CBPS) और चैंपियंस फॉर गर्ल्स एजुकेशन (Champions for Girls' Education) के साथ मिलकर देश के 5 राज्यों में ये स्टडी की, जिसके नतीजे डराते हैं।

प्रमिला प्रजापति ने इस मुद्दे पर जताई चिंता

‘मैपिंग द इंपैक्ट ऑफ कोविड-19’ नाम से हुई ये स्टडी 26 नवंबर को रिलीज हुई, जिसमें यूनिसेफ के एजुकेशन प्रमुख टेरी डर्नियन के अलावा बिहार स्टेट कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (SCPCR) की अध्यक्ष प्रमिला कुमारी प्रजापति ने इस मुद्दे पर चिंता जताई। जून में 3176 परिवारों पर हुए सर्वे में उत्तर प्रदेश के 11 जिलों, बिहार के 8 जिलों, जबकि असम के 5 जिलों को शामिल किया गया। वहीं, तेलंगाना के 4 और दिल्ली का भी एक जिला इसमें शामिल रहे। आर्थिक तौर पर कमज़ोर तबके के परिवारों से बातचीत के दौरान लगभग 70% लोगों ने माना कि उनके पास खाने को भी पर्याप्त नहीं है। ऐसे हालातों में पढ़ाई और उसमें भी लड़कियों की पढ़ाई सबसे ज्यादा ख़तरे में है।

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कमज़ोर परिवारों की लड़कियां पहले से ही इस जद में

स्टडी में दिखा कि किशोरावस्था की लगभग 37% लड़कियां इस बात पर निश्चित नहीं कि वे स्कूल लौट सकेंगी। बता दें कि ग्रामीण और आर्थिक तौर पर कमज़ोर परिवारों की लड़कियां पहले से ही इस जद में हैं। लड़कों की बजाए दोगुनी लड़कियां कुल मिलाकर 4 साल से भी कम समय तक स्कूल जा पाती हैं। वैसे राइट टू एजुकेशन (RTE) के तहत 6 से 14 साल तक की आयु के बच्चों के लिए 1 से 8 कक्षा तक की निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था है। स्कूल के इन 8 सालों में से लड़कियां 4 साल भी पूरे नहीं कर पाती हैं।

डिजिटल माध्यम भी एक समस्या

इसके अलावा स्कूल बंद होने पर डिजिटल माध्यम से पढ़ाने की कोशिश हो रही है। फायदे की बजाय इससे भी लड़कियों को नुकसान ही हुआ। दरअसल, हो ये रहा है कि मोबाइल और इंटरनेट की सुविधा अगर किसी घर में एक ही शख्स के पास है और पढ़ने वाले लड़के और लड़की दोनों ही हैं, तो लड़के की पढ़ाई को प्राथमिकता मिलती है। ऐसे में लड़कियों का यह सत्र एक तरह से बेकार जा रहा है। स्टडी में भी इसका अंदाजा मिला। 37% लड़कों की तुलना में महज 26% लड़कियों ने माना कि उन्हें पढ़ाई के लिए फोन मिल पाता है।

लड़कियां कोरोना संक्रमित न होने के बावजूद खतरे में

कोविड के कारण लड़कियों की पढ़ाई एक बार रुकने से उनकी जल्दी शादी के खतरे भी बढ़ सकते हैं। ऐसा ही असर दुनिया के दूसरे हिस्सों, जैसे अफ्रीका में इबोला महामारी के दौरान भी दिखा था कि किशोरियों की जल्दी शादी हो गई और स्कूल से नाता पूरी तरह से छूट गया। यानी कोरोना के बाद लड़कियों की पढ़ाई पर अलग से ध्यान देने की जरूरत है, वरना इसके दीर्घकालिक निगेटिव परिणाम होंगे।

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आयरन-फॉलिक एसिड की खुराक भी नहीं पहुंच पा रही

लड़कियां कोरोना संक्रमित न होने के बाद भी खतरे में हैं। ये इस तरह से कि फिलहाल स्कूल बंद होने के लड़कियों तक आयरन-फॉलिक एसिड की खुराक नियमित तौर पर नहीं पहुंच पा रही। ऐसे में एनीमिया या खून की कमी का खतरा बढ़ जाता है। यहां बता दें कि हाल ही में मेट्रोपॉलिस हेल्थकेयर ने देश के 36 शहरों में इसपर एक सर्वे किया, जिसमें पाया गया कि हर 10 में 6 लड़कियां और महिलाएं (15 से 48 आयुवर्ग) अलग-अलग स्तर के एनीमिया का शिकार हैं। स्कूल बंदी के कारण लड़कियों की सेहत पर इस खतरे को देखते हुए हालांकि कई राज्यों में आंगनबाड़ी वर्कर्स आईएफए टेबलेट बांटने का काम कर रही हैं, लेकिन ये काफी नहीं।

कुल मिलाकर कोरोना के दौरान और इसके खत्म होने के बाद भी ये तय करने की जरूरत है कि लड़कियां स्कूल लौट सकें। वरना फिलहाल हुई स्टडी के नतीजे आगे और डरावने हो सकते हैं।

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