'कंप्लीट लॉकडाउन' नहीं 'स्टार्टअप' है यह, यहीं से करें पॉजिटिविटी की शुरुआत

This is not complete lockdown it is the like statup for positivity - Sakshi Samachar

लॉकडाउन के लिए मोदी जिम्मेदार

सभी को समझनी होगी जिम्मेदारी

लॉकडाउन के साथ करें कदमताल

सकारात्मक कार्यों से करें आगाज

खुद के साथ बिताएं क्वालिटी टाइम

हैदराबाद : कोरोना की वजह से हुए 'जनता कर्फ्यू' के बाद 'लॉकडाउन' की स्थिति ने पहले ही देशवासियों को परेशान कर दिया था, ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंगलवार रात 8 बजे की अपील ने तो मानो सबके होश ही उड़ा दिए। जो लोग 31 मार्च तक ही घरों में बंद रहने को राजी नहीं थे, उन्हें अचानक से 14 अप्रैल तक 'कंप्लीट लॉकडाउन' या कहें कि 'कर्फ्यू' लागू होने की सूचना ने अंदर तक हिला दिया है। हालत यह है कि कईयों ने इसके लिए पीएम मोदी को ही जिम्मेदार बताना शुरू कर दिया है।

लॉकडाउन के लिए मोदी जिम्मेदार
हैदराबाद के पंजागुट्टा स्थित 'श्री सांई दीप्ति वर्किंग वूमेन होस्टल' में फंसी 23 वर्षीया कीर्ति (बदला हुआ नाम) पीएम मोदी की इस घोषणा के बाद फूट-फूट कर रोती दिखी। उसकी आंखों से आंसू रूकने का नाम नहीं ले रहे थे। बार-बार उसके मुंह से एक ही बात बाहर आ रही थी, "मुझे घर जाना है... मुझे घर जाना है।" पीएम मोदी को भला-बुरा कहती हुई कीर्ति इन सबके लिए मोदी को दोषी बता रही है। उसके मुताबिक, "ऐसा कुछ भी करने से पहले लोगों को कुछ समय तो जरूर मिलना चाहिए था। अब इतने दिनों तक मैं यहां कैसे रहूं? मुझे अपने घरवालों के पास जाना है। इतने दिनों तक मैं यहां नहीं रह सकती।" हैदराबाद के एक एमएनसी में कार्यरत कीर्ति खुद को अस्थमा पेशेंट बताती है। उसका कहना है कि होस्टल के बंद दरवाजों के पीछे इतने दिन बिता पाना उसके लिए आसान नहीं है। उसके मुताबिक, "पीएम को हम जैसी लड़कियों के बारे में भी सोचना चाहिए था, जो ऐसे होस्टल्स में फंसी हुई हैं। यहां हमें खाने के लिए प्रॉपर फूड भी नहीं दिया जा रहा। ऐसे में इतने दिनों तक यहां रहने का क्या मतलब। पीएम को सोचना चाहिए था कि वे हमें हमारे घरों तक सुरक्षित भेज दें।"

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अपनों के बीच ही मानते हैं सुरक्षित
बहरहाल, कीर्ति एक नहीं है। उसके साथ तकरीबन 15-20 लड़कियां ऐसी हैं, जो इस हॉस्टल में फंसी हुई हैं। बेशक कीर्ति की तरह वे आंखों से आंसू नहीं बहा रहीं, पर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उनकी आंखें उनका हाल-ए-दिल बयां कर रही हैं। वे सभी अपने-अपने घर जाने की जुगत में लगी हैं। किसी भी तरह से वे मम्मी-पापा के पास जाना चाहती हैं। अपने घर जाकर अपनों के बीच रहना चाहती हैं। उन्हें इस बात से कतई भी फर्क नहीं पड़ता कि इन दिनों घर पर भी वे सुरक्षित नहीं हैं! वे तो खुद को बस अपनों के बीच ही सुरक्षित पाती हैं। 

डर के साये में जीने को हैं मजबूर
ये हालात केवल इस एक हॉस्टल के नहीं हैं बल्कि घर से दूर रह रहे लड़कों का भी यही हाल है। घर से बाहर पढ़ने या काम करने के लिए ब्वॉयज होस्टल्स या अलग रूम लेकर रह रहे युवकों की कहानी भी इससे इतर नहीं है। अपनों से दूर वे भी खुद को हेल्पलेस और फंसा हुआ मान रहे हैं। परिवार से दूर न चाहते हुए भी उन्हें रहना पड़ रहा है। मन में यह डर सता रहा है कि जाने फिर कभी उनका परिवार वालों से मिलना हो भी पाएगा या नहीं। ऐसी ही मनोस्थिति आज हर इंसान के अंदर घर कर रही है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि हम मनोविज्ञानी की मदद लें। ऐसे किसी भी हालात से बाहर निकालने में वे काफी मददगार होते हैं। ऐसी ही मनोदशा से गुजर रहे लोगों के लिए हम लेकर आ रहे हैं एक सीरीज, जिसमें आपको पढ़ने को मिलेगा हैदराबाद की साइकोलोजिस्ट आदि साईं लक्ष्मी के टिप्स। तो आइए जानते हैं कि अकेले फंसे ऐसे हॉस्टल गर्ल्स या ब्वॉयज का संबल वह किस तरह बढ़ाती हैं...

                                                          आदि साईं लक्ष्मी, साइकोलोजिस्ट

सभी को समझनी होगी जिम्मेदारी
कीर्ति जैसी सोच रखने वालों को ध्यान में रखकर मनोविज्ञानी आदि साईं कहती हैं, "आज पूरी दुनिया इस लॉकडाउन की वजह से प्रभावित है। यह समय एक-दूसरे को दोषी बताने का नहीं है। संकट की इस घड़ी में देश को बचाने के लिए हम सभी को समान रूप से अपनी-अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। इस बुरे वक़्त में शारीरिक ही नहीं, हमारी मानसिक स्थिति भी दयनीय हो चुकी है। अपने और अपनों के लिए हम चिंताग्रस्त हैं। इस चिंता की वजह महज स्वास्थ्य और जॉब सिक्योरिटी ही नहीं है, बल्कि इसके आगे बढ़कर 'हमारी एक अलग ही मानसिक दशा है'। यह दशा है- 'जीने के हमारे स्तर का बदल जाना या कहें कि उसका गिर जाना।'। यह बात हम सभी को समझनी होगी कि आज हम 'लिविंग' से 'सरवाइवल कंडीशन' पर पहुंच चुके हैं। ऐसे में जरूरी है कि हम एक-दूसरे के लिए इमोशनल सपोर्ट बनें।"

लॉकडाउन के साथ करें कदमताल
वह कहती हैं, "इस मुश्किल हालात से लड़ने के लिए जरूरी है कि इस वक़्त आप उनसे बात करें, जिनके साथ आपका जुड़ाव ज्यादा हो। मुश्किल की इस घड़ी में भी कुछ सकारात्मक करने की कोशिश करें। बेहतर होगा कि आप आत्मनिरीक्षण करें। इस सच्चाई को न भूलें कि आज हमारे पास दूसरा कोई रास्ता नहीं है। इसलिए बेहतर यही होगा कि हम इस सच को मान लें कि हमें इस 'लॉकडाउन' के साथ कदमताल करते हुए चलना है। जब हम खुद इसे स्वीकारना शुरू कर देंगे, तभी तो दूसरों को भी इसके लिए मना पाएंगे!"

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सकारात्मक कार्यों से करें आगाज
आदि साईं आगे कहती हैं, "बेहतर होगा कि इस दौरान आप ऐसे काम करें जिससे आपको खुशी मिलती हो। अपने अंदर की क्रिएटिविटी को समझें। अपनी लाइफस्टाइल में बदलाव लाएं। यह न भूलें कि किसी भी चीज को अपनी आदत में शुमार करने के लिए जरूरी होता है कि कम से कम 21 दिनों तक उसे लगातार बिना किसी ब्रेक के करते रहा जाए। इन 21 दिनों को ऐसे ही किसी सकारात्मक कार्यों के लिए चुनें। यह मान लें कि आपको एक मौका मिला है ताकि आप अपने अंदर कोई नया और अच्छा बदलाव लाने के लिए पूरी तरह से खुद को तैयार कर पाएं। इसे ऐसा ही एक बेहतर समय मानकर आगे बढ़ें। सबसे जरूरी है कि आप सकारात्मक बने रहें। इससे आपको हर स्थिति से खुद को उबारने में मदद मिलेगी।"

खुद के साथ बिताएं क्वालिटी टाइम
साइकोलोजिस्ट आदि साईं इस वाक्य के साथ अपनी बात पूरी करती दिखती हैं कि सामान्यतः हम किसी न किसी काम में इतने व्यस्त रहते हैं कि खुद के लिए समय निकाल ही नहीं पाते। समझ लें कि यह वक्त आज आपको यह मौका दे रहा है कि आप खुद के साथ क्वालिटी टाइम गुजार सकें। इसी सोच के साथ आप आगे बढ़ें और इस 'कंप्लीट लॉकडाउन' के दिनों को खुद को समझने में लगाएं।"

- सुषमाश्री 
(इस सीरीज में हमारी अगली स्टोरी होगी बच्चों पर, तो इंतज़ार कीजिए हमारे अगले आर्टिकल का )

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