"एनेस्थिसिया दिए बगैर किया गया ऑपरेशन है 'लॉकडाउन'" : आरके चतुर्वेदी, रिटायर्ड IPS ऑफिसर

Lockdown in India is like Operation done without using anesthesia: RK Chaturvedi, retired IPS - Sakshi Samachar

पहले एक दिन, फिर 21 दिन

जिसमें चिट्ठी आई है... गाना है

घर के सामने निकलता हूं टहलने

पैर-हाथ धोने की पड़ी हुई है आदत

#कोरोना की कहानी

"यह भारतीय मानसिकता है कि हम अपना अच्छा-बुरा अपनों के साथ ही बिताना चाहते हैं। एक बार की बात बताता हूं। 1986 में एक फिल्म आई थी- नाम। तब मेरी नई-नई पोस्टिंग हुई थी और वहां यह मूवी देखने का मौका मिला। उसमें पकज उधास का वो गीत - चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है... देखा और सुना, फिर मैं वहां रह नहीं पाया। छुट्टी ली और घर आ गया। यह होती है हम भारतीयों के अंदर की फीलिंग। हमारे अंदर का एहसास, जो हमें अपनों से दूर नहीं होने देता। लेकिन मोदी और योगी जी दोनों ही इस एहसास को महसूस नहीं कर पाए। आनन-फानन में 'लॉकडाउन' का उनका फैसला कुछ ऐसा था, जैसे बगैर 'एनेस्थिसिया' दिए किया गया 'ऑपरेशन'। दरअसल, दोनों ही परिवार के साथ नहीं रहते इसलिए हम भारतीयों की उस फीलिंग को समझ नहीं पाए, जिसमें अपनों के साथ ही सुख या दुःख में जीने-मरने का ख्वाब एक एहसास बनकर सदा हमारे साथ रहता है।"       

पहले एक दिन, फिर 21 दिन
"पुलिस अफसर रहा हूं। वैसे मैं लखनऊ का हूं लेकिन इस समय नोएडा में हूं। असल में, मेरी बेटी रहती है यहां। पत्नी भी यहीं थी। आया तो था मैं पत्नी को ले जाने के लिए, लेकिन उसी समय 'जनता कर्फ्यू' शुरू हुआ। तब मुझे अंदर कुछ ऐसा महसूस हुआ कि मानो अपना 'सिक्स्थ सेंस' कुछ एहसास कराना चाह रहा हो। मैंने अपने ड्राइवर को कहा कि तुमलोग जाओ, मैं ट्रेन से आ जाऊंगा। ...तो पहले एक, फिर 21 दिन। तब हमने तय किया कि इस समय में हम सभी साथ रहें तो ज्यादा अच्छा होगा।"

कम से कम सभी साथ तो होंगे 
"यह भारतीय मानसिकता है कि अच्छा हो या बुरा हो, सब साथ में हों। दिल्ली से बड़ी संख्या में लोगों के भागने के पीछे भी सबसे बडा कारण यही था, जो लोग दिल्ली से भागकर बिहार, यूपी और एमपी जा रहे थे, उनके भागने के पीछे सबसे बड़ी मानसिकता यही थी। भारतीयों की इस मानसिकता की ओर किसी का ध्यान नहीं है। सब एक-दूसरे को भला-बुरा कह रहे हैं पर इसके पीछे की गंभीरता और सच्चाई की ओर किसी का ध्यान नहीं है। भारतीय मानसिकता ही कुछ ऐसी है कि सामान्य दिनों को छोड़ दें तो अपने अच्छे और बुरे दिनों में तो सबसे ज्यादा लोग यही चाहते हैं कि हम अपनों के बीच में रहें। फिर चाहे जो भी हो, हम सब के सामने हो। कम से कम एक-दूसरे के साथ तो होंगे।"

यह भी पढ़ें : 'कंप्लीट लॉकडाउन' नहीं 'स्टार्टअप' है यह, यहीं से करें पॉजिटिविटी की शुरुआत

जिसमें चिट्ठी आई है... गाना है
"पुलिस की जॉब में मैं शुरू-शुरू में कहीं दूर था और मैंने वो मूवी देखी, जिसमें चिट्ठी आई है... गाना है। और अगले दिन तीन दिन की छुट्टी लेकर मिर्जापुर चला गया। मेरे बॉस ने पूछा क्या बात है? तो मैंने कहा- कुछ नहीं सर, बस घर पर बहुत जरूरी काम है। कुछ नहीं था। बस, वो गाना सुना और नहीं रह पाया। तो हर आदमी मन से तो इंसान ही होता है।"

घर के सामने निकलता हूं टहलने
"मैं सुबह जल्दी उठता हूं। 6 बजे तक तैयार हो जाता हूं। नॉर्मल दिनों में लखनऊ के लोहिया पार्क में सवेरे 5 से 6 किमी लगभग एक घंटे टहलता था। यहां उतना सब तो नहीं कर सकता फिर भी घर के सामने टहलने निकलता हूं। नोएडा 31 में रहता हूं। हमारा सेक्टर क्लोज सेक्टर है। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए हम दो-चार लोग ही बाहर टहलने निकलते हैं। उठकर करीब एक घंटे मैं सड़क पर इधर से उधर टहलता हूं। फिर लौटता हूं तो मेरे पास तीन अखबार आते हैं, उन्हें पढ़ता हूं। सैनिटाइजर मैं घर की गेट के पास रखता हूं। बाहर निकलता हूं तो हाथ में लगाकर जाता हूं। अंदर आता हूं तो लगाकर आता हूं।"

पैर-हाथ धोने की पड़ी हुई है आदत
"ट्रेडिशनल फैमिली का होने के नाते पैर-हाथ धोने की भी आदत पड़ी हुई है। कुछ टाइम से ये आदत छूट गई थी, तो वो अब फिर से शुरू हो गई है। घर के दरवाजे पर पानी रखा रहता है। बाहर से आता हूं तो पैर साफ करता हूं फिर पेपर लेकर बैठ जाता हूं। फिर पेपर पढ़ता नहीं हूं बल्कि पूरा चाट जाता हूं, समझ लीजिए। संपादकीय से लेकर चुटकुलों तक कुछ भी नहीं छोड़ता। इंटरनेशनल, लोकल सारी खबरें पढ़ने के बाद जैसे ही फ्री होता हूं, पत्नी की आयुर्वेदिक दवाएं देने का सिलसिला शुरू हो जाता है।"

यह भी पढ़ें : 'आज अपने उस क्षमता का इस्तेमाल करें जिसने बुरी स्थिति का सामना करने में पहले भी आपकी मदद की हो'

गिलॉय का काढ़ा पीने को मिलता है
"सबसे पहले वह मुझे गिलॉय देती हैं। आयुर्वेद में इसे एक बेहतरीन इम्यूनिटी बूस्टर माना जाता है। आंवले में कुछ पांच-सात चीजें मिलाकर इसे तैयार किया जाता है। खाने में कड़वा लगता है लेकिन इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है। तो सबसे पहले मुझे एक कप गिलॉय का काढ़ा पीने को मिलता है।"
गिलॉय (गुडुची) आंवला, तुलसी जैसी चीजों का काढ़ा मुझे सुबह सवेरे पिलाया जाता है। गिलॉय अगर नीम के पेड़ पर चढी हुई हो तो फिर तो उसे प्रकृति का वरदान माना जाता है। इन दिनों कुछ ज्यादा ही यह सब पिलाया जाता है। इसके बाद पौष्टिक चीजें जैसे- बादाम वगैरह खाता हूं। फिर चाय पीकर नाश्ता पूरा कर लेता हूं। तब लगभग साढे नौ बज जाते हैं।" 

कभी-कभी कुछ लिख लेता हूं
इसी बीच फेसबुक पर कभी-कभी कुछ लिख लेता हूं। अभी मैंने लिखा है कि किस तरह से इन दिनों पुलिस का चेहरा बदल गया है। पहले दो दिन पुलिस थी लठैतों की भूमिका में लेकिन अब वह 'देवदूत' की भूमिका में उतर आई है। इसी पर मैंने काफी कुछ लिखा है। लोगों ने उसे काफी पसंद भी किया। खूब सराहा।"

10-12 डायरी मिल गई मुझे
इसके अलावा हर दिन मैं कुछ न कुछ अलग भी करता रहता हूं। जैसे एक दिन मैंने पुरानी डायरी निकाली। पुलिस की नौकरी के दौरान इंट्रोगेशन वाली पुरानी डायरी निकालकर पलटनी शुरू कर दी। एसपी सिटी गाजियाबाद और एसपी सिटी नोएडा भी रहा हूं मैं, तो इस दौरान की सारी डायरी मैंने निकाली और उस पीरियड की चीजें उसमें देखने को मिलीं। इसके अलावा चंदौली में मैं नक्सलवादी इलाकों में भी जाता रहा हूं। उस दौरान की भी 10-12 डायरी मुझे मिल गई। मैंने उन सभी को एक-एक करके पढ़ा। उनमें से जो बेमतलब की थीं, उन्हें किनारे किया और कई ऐसी घटनाएं थीं, जो वक्त के साथ मैं भूलता चला गया था, वो एक बार फिर से याद हो आईं।"

यह भी पढ़ें : 'लॉकडाउन' है अनिवार्य, वरना कोरोना से बचना मुश्किल, जानें क्यों है जरूरी 'लॉकडाउन'?

उसका भी वर्क फ्रॉम होम है
बिटिया भी खाली है इन दिनों। सैमसंग में लीगल ऑफिसर है। उसका भी वर्क फ्रॉम होम है। कभी वह मिल जाती है तो उसको भी मैं अपना ज्ञान पिलाता हूं कि बैठो, देखो कभी हम ये करते थे, कभी वो करते थे। हालांकि उसको बहुत मजा नहीं आता लेकिन पिता हैं तो जो भी करेंगे वो सुनना तो पड़ेगा ही।"

बहुत पुरानी फोटो मिल गई
आज मैंने अपनी सारी पुरानी एलबम्स अलग कर लीं। ढेर सारे। लगभग 18-20 एलबम्स में से कुछ को छांटा, छांटकर अलग किया। जॉब से जुड़ी फोटोग्राफ्स अलग की। फैमिली की अलग कर ली। पिताजी की बहुत पुरानी तस्वीर मिल गई। मुझे अपनी एक 1984 की वर्दी पहनी हुई बहुत पुरानी फोटो मिल गई, जिसमें मैं तब के एक मुख्यमंत्री से अवार्ड ले रहा हूं। तो आज फोटो का मेला रहा। एक दिन डायरी के एक-एक पन्ने पढ़ता गया।"

दादी का बनाया हुआ अचार
इसी तरह से एक दिन घर की सारी आलमारियां साफ कर डालीं। साल 2007 में मां का देहांत हुआ था। आलमारियां साफ करते-करते उस रोज़ मुझे एक डिब्बा मिला। बिटिया ने कहा कि पापा ये तो दादी का बनाया हुआ अचार है। बनाकर रखा था, फिर वह सामान में कहीं पीछे दब गया। आज हमने जब दो-तीन आलमारियां साफ कर डालीं तब जाकर वह मिला। पुरानी यादों में खो गया जब माँ के हाथ का बनाया अचार खाने को मिलता था। अब तो बस बाजार का ही खाने को मिलता है।"

टारगेट बनाकर की घर की सफाई
एक दिन हमने पुराने सारे कागज निकाले। मकान बनाते समय के, मकान की पर्ची और दूसरी अन्य चीजें। अब जाकर उन्हें हमने फाड़कर फेंका क्योंकि अब उनकी कोई जरूरत नहीं रह गई थी। इस तरह से एक टारगेट बनाकर हमने घर की सफाई पर ध्यान दिया। एक दिन बिटिया के साथ खाना बनाने में उसकी मदद की। ऐसे ही हर दिन कुछ न कुछ ऐसा करते रहते हैं ताकि दिमाग इंगेज रहे। फिर मित्रों से फेसबुक, व्हाट्सऐप और फोन पर बातचीत करते रहना, उनका जवाब देते रहना, हाल-चाल लेना... यह सब भी चलता रहता है।"

यह भी पढ़ें : 'लॉकडाउन' दे रहा है हमें क्षमता को परखने का एक मौका, मैंने तो यह है आजमाया...​

वहां अमिताभ बच्चन आए थे
इलाहाबाद के नैनी जेल में बतौर जेल सुपरिटेंडेंट भी मैंने सर्विस की है। एक दिन वहां अमिताभ बच्चन आए थे। जब उन्होंने कांग्रेस से टिकट जीती थी, उसके बाद (शायद जीतने के बाद) जेल आकर उन्होंने कैदियों को संबोधित किया था, वो फोटोग्राफ्स मिली। इसी तरह की कई ऐतिहासिक तस्वीरें मिल रही हैं।" ऐसे कई काम निपटाने के बाद मैं खाना खाता हूं। फिर ऐसे ही कुछ न कुछ चलता रहता है। शाम को परिवार के साथ बातचीत करता हूं। हमारे ठीक ऊपर भाभी-भैया रहते हैं, उनसे गप्प वगैरह करते हैं। कल भाभी का जन्मदिन था तो हम सभी घर के सदस्यों ने मिलकर सेलिब्रेट कर लिया।"

डर लगने लगता है
शाम को चाय पीकर आधा-एक घंटा फिर से टहलने निकल जाते हैं। कभी कभार टीवी देख लेते हैं हालांकि इन दिनों खबरें देखने का दिल नहीं करता। देर तक ऐसी खबरें देखो तो बड़ा मनहूसियत जैसा महसूस होता है, डर लगने लगता है। कम से कम देखो तो ठीक है वरना ऐसा लगता है, जैसे- कोरोना हमारे ही घर आने वाला है। वैसे भी हम पुलिस वाले पूर्वानुमान बहुत ज्यादा करते हैं। जैसे ही थोड़ी सी खांसी या छींक आ जाए, ऐसा महसूस होने लगता है जैसे कि अब हमें कोरोना ही होने वाला है।"

हर हालात में हमेशा पूरी तरह तैयार
दरअसल, यह पुलिस का बेसिक नेचर है। पुलिस की नौकरी में पहले दिन ही सिखाया जाता है, 'थिंक फोर बेस्ट एंड प्रीपेयर फॉर वर्स्ट'। अगर आप वर्स्ट के लिए तैयार रहें तो आपकी प्लानिंग बहुत दूर तक की रहेगी। यही वजह है कि हम हर हालात में हमेशा पूरी तरह तैयार होते हैं। किसी भी पुलिस ऑफिसर के पूरी तरह से सक्सेसफुल होने के लिए जरूरी है कि वह हर वक्त इसी तरह से खुद को तैयार रखे।" 

प्रोफेशनलिज्म
मैं खुद को बहुत सफल पुलिस वाला मानता हूं। 14-15 जिलों में एसएसपी रहा हूं। "लखनऊ, नोएडा, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, मथुरा, ऐटा, इटावा, फैजाबाद, फतेहपुर। इसके बाद डीआईजी लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर, आई जी- इलाहाबाद, गोरखपुर, आई इंटेलिजेंट ऑफ द स्टेट"। मैं आत्मसंतुष्ट हूं। इसका सबसे बड़ा कारण मैं मानता हूं- 'डेडिकेशन टू द जॉब, क्रेडिबिलिटी और प्रोफेशनलिज्म' को। 'प्रोफेशनलिज्म' में जो सबसे बड़ी चीज होती है, वह यही होती है कि आपको हमेशा वर्स्ट सिचुएशन के लिए भी तैयार रहना चाहिए। यानि आपके दिमाग में यह अंदेशा क्लियर होना चाहिए कि बुरी से बुरी स्थिति में भी क्या हो सकता है? जैसे मैं कहूंगा कि तब के गाजियाबाद अफसरों की यह चूक थी कि इतनी बड़ी संख्या में लोग बॉर्डर पर उस रोज पहुंचे।"

'लॉकडाउन' के लिए नहीं थी कोई तैयारी
लोग मानें या न मानें पर सच यह है कि 'लॉकडाउन' के लिए कोई तैयारी नहीं थी। फिर दिहाड़ी मजदूरों को भी कॉन्ट्रैक्टर्स ने मेहनताना दिए बगैर अपने-अपने घर लौट जाने को कहा था। यही वजह थी कि उस रोज़ इतनी बड़ी संख्या में लोग दिल्ली-ग़ाज़ियाबाद बॉर्डर पर पहुंचे। इसमें सरकारों की भी मौन हामी थी। वो सोच रहे थे कि बेहतर होगा, बला टलेगी। पुलिस भी कुछ ऐसा ही सोच रही थी। फिर लालकुआं से बस और खाने के पैकेट मिलेंगे, लिखकर किया गया संबंधित अफसर के ट्वीट ने और भी बवाल खड़ा कर दिया। लोग किसी भी कीमत पर घर लौटने की कोशिश करने लगे। बस इसी मानसिकता ने इतना दुखद दृश्य तैयार कर दिया।"     

- आरके चतुर्वेदी, रिटायर्ड आईपीएस ऑफिसर 
(जैसा कि सुषमाश्री से बातचीत के क्रम में कहा)
(नोट : साक्षात्कार 'लॉकडाउन' के आठवें दिन लिया गया है)                                                                                                                                         
यह भी पढ़ें : नये अंदाज़ और मस्ती के साथ कट रहा है 'लॉकडाउन', ये है अपना स्टाइल​

Advertisement
Back to Top