50 साल बाद आज भी प्रासंगिक है 'चिपको आंदोलन', इस बार महाराष्ट्र के सांगली में दिखी इसकी मिसाल

Chipko Andolan in Maharashtra Sangli for saving 400 years old Tree - Sakshi Samachar

पेड़ बचाने के लिए 'चिपको आंदोलन'

सोशल मीडिया कैंपेन और ऑनलाइन पिटीशन

पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे ने केंद्रीय मंत्री गडकरी को लिखी चिट्‌ठी

मुंबई : महाराष्ट्र के सांगली के भोसे गांव के लोगों ने 400 साल पुराने बरगद के पेड़ को कटने से बचा लिया। यह स्टेट हाईवे के बीच में आ रहा था। गांव वालों को पता चला तो वे पेड़ को घेर कर खड़े हो गए और 'चिपको आंदोलन' शुरू कर दिया। खबर केंद्र तक पहुंची तो लोगों की भावनाओं को देखते हुए सरकार को सड़क का नक्शा बदलने का फैसला करना पड़ा।

रत्नागिरी-सोलापुर हाईवे पर यह पेड़ येलम्मा मंदिर के पास है। यह करीब 400 वर्गमीटर में फैला है। यह पेड़ यहां के लोगों की परंपरा से जुड़ा है। इस पर कई किस्म की चिड़ियों और जानवरों को भी देखा जाता रहा है।

पहले 20 लोगों ने ही शुरू किया विरोध

स्टेट हाईवे-166 के लिए पेड़ को काटने का काम शुरू हो गया था। सांगली के सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने विरोध किया। गांव वालों ने बताया कि उन्हें जुलाई की शुरुआत में पेड़ काटने की बात पता चली। कोरोना की वजह से एक साथ विरोध नहीं किया जा सकता था। फिर भी पेड़ को बचाने की कोशिश शुरू हुई। पहले 20 लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए पेड़ को घेर कर खड़े हो गए। इसके बाद इसे काफी समर्थन मिला।

ऑनलाइन पिटिशन को मिला 14 हजार लोगों का समर्थन

गांव वालों ने सह्याद्री संगठन नाम के एक ग्रुप की मदद से फेसबुक पर इस पेड़ का फोटो अपलोड करना शुरू किया। कई ऐसे वीडियो भी पोस्ट किए जिनमें दिखाया गया था कि पेड़ की शाखाएं कितनी फैली हुई हैं। इस ग्रुप से कुछ ऐसे वीडियो भी अपलोड किए गए जिनमें पेड़ पर बंदर उछल-कूद करते नजर आ रहे थे। इसके लिए ऑनलाइन पिटीशन भी दायर की गई थी, जिसे 14 हजार से ज्यादा लोगों का समर्थन मिला।

लोगों की भावनाओं को देखते हुए बदलाव का फैसला किया

इस बारे में राज्य के पर्यटन और पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे ने केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को चिट्ठी लिखी। लोगों की भावनाओं को देखते हुए गडकरी ने हाईवे के नक्शे में बदलाव करने को कहा है। अब यह हाईवे भोसे गांव की जगह आरेखन गांव से गुजरेगा। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने शुक्रवार को कहा कि पेड़ का तना नहीं काटा जाएगा, लेकिन इसकी कुछ शाखाओं को छांटा जाएगा।

सबसे पहले 1970 में उत्तराखंड में हुआ था 'चिपको आंदोलन'

चिपको आंदोलन 1970 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के चमोली जिले में शुरू हुआ था। करीब एक दशक में यह पूरे उत्तराखंड में फैल गया था। इसकी अगुआई पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, गोविंद सिंह रावत, चंडीप्रसाद भट्ट और गौरादेवी ने की थी। इस आंदोलन में पेड़ों को काटने से बचाने के लिए लोग उनसे चिपक जाते थे। इसलिए इसे चिपको आंदोलन नाम दिया गया। इसमें महिलाएं बड़ी संख्या में शामिल हुई थीं।

कौन-कौन थे इस आंदोलन के पीछे

आज से करीब 45 साल पहले उत्तराखंड में एक आंदोलन की शुरुआत हुई थी, जिसे नाम दिया गया था चिपको आंदोलन। इस आंदोलन की शुरुआत 1970 में भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा, कामरेड गोविन्द सिंह रावत, चण्डीप्रसाद भट्ट तथा श्रीमती गौरादेवी के नेतृत्व में हुई थी। इस आंदोलन में पेड़ों को काटने से बचाने के लिए गांव के लोग पेड़ से चिपक जाते थे, इसी वजह से इस आंदोलन का नाम चिपको आंदोलन पड़ा था।

कई नारे हुए मशहूर

चिपको आंदोलन की शुरुआत प्रदेश के चमोली जिले में गोपेश्वर नाम के एक स्थान पर की गई थी। आंदोलन साल 1972 में जंगलों की अंधाधुंध और अवैध कटाई को रोकने के लिए शुरू किया गया था। इस आंदोलन में महिलाओं का भी खास योगदान रहा।

इस दौरान कई नारे भी मशहूर हुए और आंदोलन का हिस्सा बने। उनमें से एक था—
क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।।

सन 1987 में इस आन्दोलन को सम्यक जीविका पुरस्कार (Right Livelihood Award) से सम्मानित किया गया था।

तत्कालीन इंदिरा सरकार ने बनाया कानून

इस आंदोलन में वनों की कटाई को रोकने के लिए गांव के पुरुष और महिलाएं पेड़ों से लिपट जाते थे और ठेकेदारों को पेड़ नहीं काटने दिया जाता था। जिस समय यह आंदोलन चल रहा था, उस समय केंद्र की राजनीति में भी पर्यावरण एक एजेंडा बन गया था। इस आंदोलन को देखते हुए केंद्र सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम बनाया। बता दें कि इस अधिनियम के तहत वन की रक्षा करना और पर्यावरण को जीवित करने की कोशिश की जाती है। कहा जाता है कि चिपको आंदोलन की वजह से साल 1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक विधेयक बनाया था। इस विधेयक में हिमालयी क्षेत्रों के वनों को काटने पर 15 सालों का प्रतिबंध लगा दिया था। चिपको आंदोलन न सिर्फ उत्तराखंड में बल्कि पूरे देश में फैल गया था और इसका असर दिखने लगा था।

आंदोलन ने राजनीति में पर्यावरण को दी जगह

चिपको के सहभागी तथा कुमाऊँ विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डॉ.शेखर पाठक के अनुसार, “भारत में 1980 का वन संरक्षण अधिनियम, यहां तक कि केंद्र सरकार में पर्यावरण मंत्रालय का गठन भी चिपको की वजह से ही संभव हो पाया।” वह कहते हैं कि इस आंदोलन की मुख्य उपलब्धि ये रही कि इसने केंद्रीय राजनीति के एजेंडे में पर्यावरण को एक सघन मुद्दा बना दिया। उत्तर प्रदेश (वर्तमान उत्तराखण्ड) में इस आंदोलन ने 1980 में तब एक बड़ी जीत हासिल की, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने प्रदेश के हिमालयी वनों में वृक्षों की कटाई पर 15 वर्षों के लिए रोक लगा दी।

उत्तराखंड से शुरू हुआ यह आंदोलन पूरे देश में पहुंचा

बाद के वर्षों में यह आंदोलन पूर्व में बिहार, पश्चिम में राजस्थान, उत्तर में हिमाचल प्रदेश, दक्षिण में कर्नाटक और मध्य भारत में विंध्य तक फैल गया था। उत्तर प्रदेश में प्रतिबंध के अलावा यह आंदोलन पश्चिमी घाट और विंध्य पर्वतमाला में वृक्षों की कटाई को रोकने में सफल रहा। साथ ही यह लोगों की आवश्यकताओं और पर्यावरण के प्रति अधिक सचेत प्राकृतिक संसाधन नीति के लिए दबाब बनाने में भी सफल रहा। इस आंदोलन का प्रभाव आज भी यदा—कदा देखने को मिल ही जाता है। इस बार यह महाराष्ट्र में देखने को मिला।

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