'लॉकडाउन' का दर्द बस हम बड़ों का ही नहीं, इन बच्चों का भी... 

Pain of Lockdown is not only for the elders but also for the children - Sakshi Samachar

नहीं जानता काम के बिना जिंदा कैसे रहते हैं!

वायरल हुआ रोती हुई बच्ची का वीडियो 

साझा करें 'लॉकडाउन' के अपने अनुभव 

'लॉकडाउन' का दर्द जितना दिखता है, उतना ही नहीं है। यह दर्द उससे कहीं बड़ा है। 'लॉकडाउन' को लेकर दर्द उनका भी है, जिसे हम देख पा रहे हैं और उनका भी है जिसे हम नहीं देख पा रहे। जरूरत है उनके उस दर्द को महसूस करने की। ताकि उनके साथ उनके इस दर्द को हम साझा कर पाएं। यह दर्द हमारा और आपका तो है ही, बच्चों और बड़ों का भी है। आइए, एक-एक कर इन सभी के इसी दर्द को महसूस करने की कोशिश करें। वादा कीजिए, आप इन सभी के साथ उनका दर्द बांटने में हमारे साथ खड़े होंगे क्योंकि आपका साथ ही हमारा संबल है। 

मुझसे यह नहीं हो पाएगा

"क्या? कोई काम नहीं करना है? खाली बैठे रहना है बस! नहीं, नहीं। मुझसे यह नहीं हो पाएगा। प्लीज, आप मुझे इतनी बड़ी सजा न दीजिए। मैं कितनी भी बड़ी सजा काटने को तैयार हूं पर यह नहीं। आप बेशक मुझे 'क्वारंटाइन' में भेज दें, लेकिन काम से दूर न करें। काम के बिना जिंदा कैसे रहते हैं, मैं नहीं जानता। आपसे इल्तजा है कि प्लीज, मुझे इतनी बड़ी सजा न दें।" , कहना है लंबे समय से एक एमएनसी में कार्यरत श्रीधर का। यह महज़ श्रीधर की ही कहानी नहीं है, बल्कि हर किसी का यही हाल है। हर किसी का दर्द 'लॉकडाउन' के आज के हालात में कुछ ऐसे ही उबाल मार रहा है। हम बड़े हैं, समझदार हैं, अपना और अपनों का ही नहीं, सभी का भला-बुरा समझ सकते हैं, इसके बावजूद इस दौर में अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पा रहे हैं। खुद पर कंट्रोल नहीं रख पा रहे। ऐसे में हमारे बच्चों का क्या हाल है, यह जानना चाहते हैं तो प्लीज एक नजर इस वीडियो पर भी डालिए।

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वायरल हुआ रोती हुई बच्ची का वीडियो 
वीडियो विदेश में रहने वाली एक बच्ची का है। इस वीडियो में दिखाया गया है कि 'लॉकडाउन' का ऐसे बच्चों पर कितना बुरा असर पड़ रहा है। इन दिनों बच्चों को उनकी पसंद की चीजें खाने को नहीं मिल पा रही हैं। हम सभी जानते हैं कि चाउमीन, बर्गर और पिज्जा जैसे फास्ट फूड्स खाने का चस्का आज के बच्चों पर कितना ज्यादा है। खासकर ऐसे बच्चों में वह ज्यादा देखने को मिलता है, जिनके पैरेंट्स यानि माता-पिता दोनों ही वर्किंग हैं। अक्सर समय से खाना न पका पाने की वजह से ऐसे वर्किंग पैरेंट्स अपने बच्चों को पैक्ड या फास्ट फूड्स खिलाना शुरू कर देते हैं। धीरे-धीरे बच्चे ऐसे ही खाने के आदि हो जाते हैं और हो भी चुके हैं। ऐसे में अब जब उन्हें वही पैक्ड फास्ट फूड खाने को नहीं मिल पा रहा है तो उनकी बेचैनी बढ़ती ही जा रही है, और रोना-धोना बंद ही नहीं हो रहा।

डिलीवरी भी बंद है क्या?
इस वायरल वीडियो में भी ऐसी ही एक बच्ची लायला का दर्द बयां हो रहा है। लायला से उसकी मम्मी पूछ रही है कि तुम्हें और क्या खाना है? जवाब में लायला ऐसे ही फास्ट फ़ूड 'नैन्डोज' का नाम लेती है। ना सुनकर लायला रोने लगती है। वह पूछती है, "चाइनीज मिल जाएगा?" उसकी मम्मी फिर से मना कर देती है। ऐसे में लायला एक बार फिर पूछती है, "डिलीवरी भी बंद है क्या?" मम्मी उसका भी जवाब 'हां' में देती है। साथ ही कहती है कि अब तुम्हें मां के हाथ का बना हुआ ही खाना होगा। ऐसे में लायला का रोना और भी तेज हो जाता है। बच्ची फिर से पूछती है कि मैकडॉनाल्ड और केएफसी से भी कुछ नहीं मिल सकता क्या? बच्ची की मां फिर से कहती है, "सब बंद है बेटा।'' बस फिर क्या... लायला का रोना रूकता ही नहीं। बस, वीडियो यहीं खत्म हो जाता है। 

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साझा करें 'लॉकडाउन' के अनुभव 
बेशक वीडियो यहीं खत्म हो जाता है, लेकिन यह किसी एक बच्ची की कहानी नहीं है। यह रोना हर घर और हर बच्चे का है। यानि यह साफ हो जाता है कि 'लॉकडाउन' का असर हम जैसे बड़ों ही नहीं, बच्चों पर भी देखने को मिल रहा है। हर कोई दुखी है। लेकिन हम सभी मजबूर हैं। यह सच है कि कोरोना के संक्रमण का खतरा आज अगर हमने न रोका तो आने वाले समय में कब तक हमें इसका हर्जाना भुगतना पड़ेगा, कहा नहीं जा सकता। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि 'लॉकडाउन' की जरूरत को हम भली-भांति समझ सकें। साथ ही जरूरत इस बात की भी है कि 'लॉकडाउन' के दिनों में कुछ बेहतर करने की कोशिश करें। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए 'साक्षी' आपके लिए लेकर आ रहा है, 'लॉकडाउन' के दौरान के अनुभवों और कुछ नया करने की चाहत को सबके साथ साझा करने का एक खूबसूरत मौका। तो आइए, जुड़िए हमसे और साझा करिए अपने अनुभव हमारे साथ...

हमारा  whatsapp No. है.... 9133958800

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- सुषमाश्री 

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