23 मई : इसी दिन चीन ने तिब्बत पर किया था कब्जा, जानिए कई बातें

 May 23: China captured Tibet on this day, know many things - Sakshi Samachar

नई दिल्ली : 23 मई। तिब्बत पर चीन के औपचारिक कब्जे का दिन। चीन के इस कदम का तिब्बत और दुनिया के कई देशों में जमकर विरोध हुआ। इसके बावजूद इतिहास के पन्नों पर दर्ज यह दिन चीन के लिए बेहद खुशहाली भरा रहा है। हालांकि, पिछले कई दशकों से दलाई लामा के प्रयासों से यहां स्वतंत्रता की अलख जगाई जा रही है और देश की आजादी हासिल करने की जद्दोजहद अब भी जारी है। 

मध्य एशिया की उच्च पर्वत श्रेणियों, कुनलुन एवं हिमालय के मध्य स्थित 16,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित तिब्बत का ऐतिहासिक वृतांत लगभग 7वीं शताब्दी से मिलता है। 8वीं शताब्दी से ही यहां बौद्ध धर्म का प्रचार प्रांरभ हुआ। 1013 ई0 में नेपाल से धर्मपाल तथा अन्य बौद्ध विद्वान तिब्बत गए। 1042 ई0 में दीपंकर श्रीज्ञान अतिशा और विवेक बिलैया तिब्बत पहुंचे और बौद्ध धर्म का प्रचार किया। शाक्यवंशियों का शासनकाल 1207 ई0 में प्रारंभ हुआ। वहीं, मंगोलों का अंत 1720 ई0 में चीन के मांछु प्रशासन द्वारा हुआ। 

दक्षिण पूर्व एशिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफलता प्राप्त करते जा रहे तत्कालीन साम्राज्यवादी अंग्रेजों ने यहां भी अपनी सत्ता स्थापित करनी चाही, पर 1788-1792 ई0 के गुरखों के युद्ध के कारण उनके पैर यहां नहीं जम सके। परिणामस्वरूप 19वीं शताब्दी तक तिब्बत ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थिर रखी। हालांकि इसी बीच लद्दाख़ पर कश्मीर के शासक ने तथा सिक्किम पर अंग्रेजों ने आधिपत्य जमा लिया। अंग्रेजों ने अपनी व्यापारिक चौकियों की स्थापना के लिए कई असफल प्रयत्न किया।

इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि तिब्बत को दक्षिण में नेपाल से भी कई बार युद्ध करना पड़ा और नेपाल ने इसे हराया। नेपाल और तिब्बत की संधि के मुताबिक तिब्बत को हर साल नेपाल को पांच हजार नेपाली रुपये हरज़ाना भरना पड़ा। इससे परेशान होकर नेपाल से युद्ध करने के तिब्बत ने चीन से सहायता मांगी। चीन के सहायता से उसने नेपाल से छुटकारा तो पा लिया, लेकिन इसके बाद 1906-7 ई0 में तिब्बत पर चीन ने अपना अधिकार जमा लिया और याटुंग ग्याड्से एवं गरटोक में अपनी चौकियां स्थापित कर लीं।

1912 ई0 में चीन से मांछु शासन अंत होने के साथ ही तिब्बत ने खुद को पुन: स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया। सन् 1913-14 में चीन, भारत एवं तिब्बत के प्रतिनिधियों की बैठक शिमला में हुई, जिसमें इस विशाल पठारी राज्य को भी दो भागों में विभाजित कर दिया गया।

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सन् 1933 ई0 में 13वें दलाई लामा की मृत्यु के बाद से बाह्य तिब्बत भी धीरे-धीरे चीनी घेरे में आने लगा। चीनी भूमि पर लालित-पालित 14वें दलाई लामा ने 1940 ई0 में शासन भार संभाला। 1950 ई0 में जब ये सार्वभौम सत्ता में आए तो पंछेण लामा के चुनाव में दोनों देशों में शक्तिप्रदर्शन की नौबत तक आ गई एवं चीन को आक्रमण करने का बहाना मिल गया। 1951 की संधि के अनुसार यह साम्यवादी चीन के प्रशासन में एक स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया।

इसी समय से भूमिसुधार कानून एवं दलाई लामा के अधिकारों में हस्तक्षेप एवं कटौती होने के कारण असंतोष की आग सुलगने लगी, जो क्रमश: 1956 एवं 1959 ई0 में जोरों से भड़क उठी। हालांकि बलप्रयोग द्वारा चीन ने इसे दबा दिया। अत्याचारों, हत्याओं आदि से किसी प्रकार बचकर दलाई लामा नेपाल पहुंच सके। इन दिनों वे भारत में रहकर चीन से तिब्बत को अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। अब सर्वतोभावेन चीन के अनुगत पंछेण लामा यहाँ के नाममात्र के प्रशासक हैं।

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