आखिर जवाहर लाल नेहरू ने मौलाना आजाद को ही क्यों बनाया शिक्षा मंत्री

Special Story On Maulana Abul Kalam Azad Birth Anniversary  - Sakshi Samachar

शिक्षा मंत्री के रूप में आजाद के काम  

अबुल कलाम की रचनाएं

 मौलाना आजाद गंभीर विचारक थे

हैदराबाद : भारतीय इतिहास के एक महान ‘राष्ट्रवादी’ और देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद वो नाम है जो अपने वतन से बेइंतेहा मोहब्ब्त करते थे। वो इस्लाम धर्म के अजीम आलिम, देशभक्ति और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए जज़्बा रखने वाले एक मुन्फरिद शख्सियत थे। मौलाना आजाद की आज जयंती है। उनके जयंती के मौके पर 11 नवंबर को राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाता है।  

आजाद का जन्म 11 नवंबर 1888 को सऊदी अरब के पवित्र स्थल मक्का में हुआ था। फिर वह कोलकाता आ गए। देश की आज़ादी की लड़ाई में मौलाना साहब हमेशा तत्पर रहे थे। उन्होंने इस लड़ाई में अपना हथियार कलम को बनाया। कलम की मदद से वह अक्सर ब्रिटिश राज की कड़ी आलोचना करते थे। साथ ही वह अपने द्वारा लिखे गए लेखों की मदद से भारतीय राष्ट्रीयता का समर्थन करने से पीछे नहीं हटते थे। 

मौलाना आजाद को ही क्यों शिक्षा मंत्री बनाया

देश की आजादी के बाद मौलाना आजाद को शिक्षा मंत्री बनाया गया। वे 15 अगस्त 1947 के बाद से 2 फरवरी 1958 तक पहले शिक्षा मंत्री रहे थे। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने मौलाना आजाद को ही क्यों शिक्षा मंत्री बनाया। जबकि उनके कैबिनेट में कई विद्वान थे। जिसमें प्रमुख नाम डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे।  

 मौलाना आजाद गंभीर विचारक थे

बताया जाता है कि मौलाना आजाद गंभीर विचारक थे और दुनिया भर में खासे पढ़े लिखे नेताओं में एक थे। धार्मिक मामलों के ज्ञानी होने के कारण उन्हें मौलाना भी कहा जाता है। उन्होंने क़ुरान को सहज और सरल शब्दों में लिखा, जिसे भारत और पाकिस्तान के मौलवी पढ़ते हैं। इतना ही नहीं इतिहास और साहित्य की मौलाना आजाद को जितनी जानकारी थी, उतनी उस दौर में कांग्रेस में किसी के पास नहीं थी।  इतना ही नहीं नेहरू और मौलाना आजाद केवल अच्छे दोस्त ही नहीं थे बल्कि एक दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। नेहरू ने कई भाषाओं पर मौलाना की महारत हासिल करने और उनकी इल्मी सलाहियत पर शानदार खिराजे तहसीन पेश की है।

कहा जाता है कि 1931 में नेहरू जेल में बंद रहने के दौरान 900 पन्नों की बेहद रोचक 'विश्व इतिहास की झलक' किताब लिखी थी। उस वक्त उनके पास तथ्यों और संदर्भों को जांचने के लिए कोई रेफरेंस लाइब्रेरी या सामाग्री नहीं थी, लेकिन उनके साथ आजाद थे। आज़ाद के पास प्राचीन मिस्र, यूनान और रोम के इतिहास से लेकर चीन की चाय तक की पूरी जानकारी थी। जिनकी मदद से नेहरू ने तथ्यों की जांच की।  

अबुल कलाम की रचनाएं

अबुल कलाम ने भी इंडिया विन्स फ्रीडम या भारत की आज़ादी की जीत नामक की किताब लिखी थी जो बहुत प्रसिद्ध हुई। इसके अलावा उन्होंने अपनी राजनीतिक आत्मकथा की भी रचना की। लेखन के अलावा उन्हें अनुवाद में भी महारत हासिल थी। उन्होंने कई पुस्तकों का उर्दू से अंग्रेज़ी में अनुवाद किया। साथ ही गुबारे-ए-खातिर, हिज्र-ओ-वसल, खतबात-ल-आज़ाद, हमारी आज़ादी और तजकरा उनकी कुछ प्रमुख पुस्तकें रही हैं। साथ ही उन्होंने अंजमने-तारीकी-ए-हिन्द भी लिखी थी।

मुस्लिम लीग को दो कैबिनेट पद देने पर सहमत नहीं थे मौलाना 

मौलाना आजाद 1937 में उत्तर प्रदेश में मुस्लिम लीग को दो कैबिनेट पद देने से इंकार करने के जवाहर लाल नेहरू के फैसले से सहमत नहीं थे। इन चुनावों में मुस्लिम लीग को भारी विफलता हाथ लगी थी। मौलाना आजाद ने नेहरू को सलाह दिया कि वह मुस्लिम लीग के द्वारा नामित दो मंत्रियों को सरकार में शामिल कर लें क्योंकि इससे इन्कार का दूरगामी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगें और इस मामले में मौलाना सही साबित हुए। जिन्ना इस पर नाराज़ हो गए और कांग्रेस सरकार को ‘हिंदू सरकार’ कह कर निंदा करनी शुरू कर दी, और कहा कि जिसमें मुसलमानों को कभी न्याय नहीं मिलेगा।

आजादी के समय उन्होंने बंटवारे का समर्थन नहीं किया और इसके खिलाफ खड़े हुए। हालांकि कई लोग आज भी मानते हैं कि जिस तरह गांधी जी ने बंटवारे के समय हालात को समझने में देर लगाई उसी तरह मौलान अबुल कलाम आजाद ने भी उस समय एकता के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए।

शिक्षा मंत्री के रूप में आजाद के काम  

शिक्षा मंत्री रहने के दौरान उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र कई उल्लेखनीय कार्य किए थे। 22 फरवरी, 1958 को हार्ट अटैक से उनका देहांत हो गया था। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। देश में इस समय सभी बड़ी संस्थाएं जैसे आईआईटी, आईआईएम और यूजीसी (यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन) उनके प्रयासों का ही फल है। उनके योगदानों को देखते हुए 1992 में उनको भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनके उल्लेखनीय कार्यों को देखते हुए उनका जन्मदिवस राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाता है।  

मौलाना अबुल कलाम आजाद न केवल आपसी भाई चारे के प्रतीक थे बल्कि राष्ट्रीय सौहार्द का जीता जागता उदाहरण थे। उन्होंने देश में एकता बढ़ाने के लिए जो भी काम किए उन्हें यह देश हमेशा याद रखेगा। 

                                                                     "दिलोजिगर में जरा हौसला तो पैदा कर, 
                                                                        मिलेगी मंजिल तू रास्ता तो पैदा कर।"

                                                                  "हर एक जुल्म की जन्जीर टूट जायेगी, 
                                                                  तू अपने वीन कोई रहनुमा तो पैदा कर"

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