असरारुल हक मजाज : तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था...

Special Story On Asrar ul Haq Majaz  Birth Anniversary - Sakshi Samachar

लड़कियां मजाज़ की दीवानी थी 

तरक्कीपसंद शायर थे मजाज

हैदराबाद : असरारुल हक मजाज उर्दू शायरी के वो नायाब हीरे हैं जिनका नाम जब भी लिया जाएगा, बड़े ही अदब और इज्जत से लिया जाएगा। मजाज सिर्फ एक शायर नही थे, बल्कि उन्होंने उस ज़िन्दगी को चुना, जिसको उन्होंने अपनी गजलों और नज़्मों का सहारा लेकर लोगों के सामने रखा। 

मजाज का जन्म उत्तर प्रदेश के रुदौली में 19 अक्टूबर 1911 को हुआ था। उनके वालिद चौधरी सिराज उल हक इलाके के पहले वकालत की पढ़ाई करने वाले शख्स थे। मजाज ने अपनी शुरुआती पढ़ाई लखनऊ और आगरा से पूरी की। उसके बाद 1931 में  स्नातक की पढ़ाई के लिए अलीगढ़ विश्वविद्यालय गए और इसी शहर में उनका राब्ता मंटो, चुगताई, अली सरदार जाफरी और जां निसार अख्तर जैसे शख्सियतों से हुआ। 

लड़कियां मजाज़ की दीवानी थी 

बताया जाता है कि अलीगढ़ विश्वविद्यालय में मजाज ने अपनी शायरियों के दम पर ऐसी पहचान हासिल की, जिससे वह पूरी यूनिवर्सिटी में नामचीन हो गए। क्योंकि मजाज बेहद खूबसूरत भी थे। इसलिए मजाज का जादू पूरे कैंपस में जोरों पर था। इतना ही नहीं लड़कियां मजाज की दीवानी थी। उनकी दीवानगी इस कदर थी कि वे मजाज की लिखी शायरियों और नज़्मों को अपने तकिये के नीचे रखकर सोती थी। बावजूद इसके वो ताउम्र प्यार के तलबगार रहे। इसलिए उन्होंने लिखा भी है। 

                                         ”ख़ूब पहचान लो असरार हूं मैं
                                       जिन्स-ए-उल्फ़त का तलबगार हूं मैं”

अलीगढ़ से पढ़ाई पूरी करने के बाद मजाज 1935 में दिल्ली गए। यहां पर वो ‘ऑल इंडिया रेडियो’ में असिस्टेंट एडिटर होकर आये थे। लेकिन इस शहर ने उन्हें नाकाम इश्क का दर्द दे दिया और इस इश्क ने उन्हें बर्बाद करके ही दम लिया। जोहरा उनकी न हो सकती, जिसके बाद उन्हें शराब की ऐसी लत लगी कि लोग कहने लगे, मजाज शराब को नहीं, शराब मजाज़ को पी रही है। दिल्ली से विदा लेते हुए उन्होंने कहा..

                                    “रूख्सत ए दिल्ली, तेरी महफिल से अब जाता हूं मैं
                                          नौहागर जाता हूं मैं नाला-ब-लब जाता हूं मैं”

मजाज के कुछ किस्से भी हैं, जिसमें पहला किस्सा मशहूर अदाकारा नर्गिस के साथ है। एक बार जब नर्गिस लखनऊ आईं तो मजाज का ऑटोग्राफ लेने पहुंचीं। उस वक़्त नर्गिस के सर पर सफेद दुपट्टा था और तब उन्होंने नर्गिस की डायरी पर दस्तख़त करते हुए ये मशहूर शेर लिखा.. 

                                                “तेरे माथे पे ये आंचल तो बहुत ही ख़ूब है लेकिन
                                             तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था”

 दूसरा किस्सा उनका जोश मलीहाबादी के साथ है। दरअसल, कुछ शायर मजाज की शराब की लत को लेकर फिक्रमंद रहते थे। एक बार जब जोश मलीहाबादी ने एक बार उन्हें सामने घड़ी रखकर पीने की सलाह दी तो जवाब मिला, ‘आप घड़ी रख के पीते हैं, मैं घड़ा रख के पीता हूं।’ इस पर उनका एक मशहूर शे’र याद आता है।

                                       “उस मेहफिले कैफो मस्ती में ,उस अंजुमने इरफानी में
                                         सब जाम बक़फ बैठे ही रहे ,हम पी भी गये छलका भी गये”

फिर आती है 5 दिसंबर 1955 की वो शाम, जब वो शराब लगभग छोड़ चुके थे, लेकिन उनके कुछ दोस्त उन्हें एक जाम पकड़ाकर नशे की हालत में लखनऊ के एक शराबखाने की छत पर छोड़कर चले आए। सुबह हुई और अस्पताल पहुंचने तक वे इस दुनिया से जा चुके थे। मजाज़ वो शायर थे जिनका इंतकाल 44 वर्ष की उम्र में हो गया था। वो एक जिंदादिल और तरक्कीपसंद शायर थे। उन्होंने अपने बारे में पहले ही कह रखा था......... 

दिल को महव-ए-ग़म-ए-दिलदार किए बैठे हैं
रिंद बनते हैं मगर ज़हर पिए बैठे हैं
चाहते हैं कि हर इक ज़र्रा शगूफ़ा बन जाए
और ख़ुद दिल ही में इक ख़ार लिए बैठे हैं

“ये रूपहली छांव ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफी का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने दिल का हाल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं

रास्ते में रुक के दम लूं, ये मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊं मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाए ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं।”

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