कोरोना संकट में कुछ इस तरह हज करेंगे मुसलमान, जानिए क्या कहते हैं धर्मगुरु

Know How Will Muslims Do Hajj In Corona Crisis - Sakshi Samachar

हज पर कोरोना संकट की मार

किसे मिलेगी हज करने की इजाजत

 जानें हज कब-कब हुआ रद्द 

दुनिया के तमाम देशों में कोरोना वायरस का खौफ बरकरार है। सऊदी अरब में कोरोना से 2.13 लाख लोग अबतक संक्रमित हो चुके हैं। 1,968 लोगों की मौत हो चुकी है। इसलिए सऊदी अरब की सरकार ने इस साल कोरोना वायरस को मद्देनज़र रखते हुए हज करने वालों की संख्या सीमित रखने का फ़ैसला किया है। सऊदी अरब ने इस साल हज के लिए दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। मक्का में होने वाले हज के लिए हर साल लाखों लोग जुटते थे, लेकिन इस बार कोरोना वायरस की वजह से हज करने की इजाजत करीब एक हजार लोगों को ही होगी। इस बार यात्रियों को हज से पहले और बाद में पृथकवास में रहना होगा और उन्हें कोरोना वायरस की जांच भी करानी होगी।

क्या होता है हज में

हज इस्लामिक कैलेंडर के 12वें महीने जिल हिज्जाह की 8वीं तारीख से 12वीं तारीख तक होता है 12 तारीख को जिस दिन हज पूरा होता है वो दिन ईद-उल-अज़हा का होता है यानी बकरीद। हज के अलावा एक और यात्रा होती है जिसे उमराह कहा जाता है। दोनों की रस्में एक जैसी होती हैं। बस फर्क ये होता है कि हज सिर्फ बकरीद के मौके पर होता है और उमराह सालभर में कभी भी किया जा सकता है। 

किसे मिलेगी हज करने की इजाजत

सऊदी अरब सरकार ने कोरोना महामारी को देखते हुए बहुत ही समिति संख्या में लोगों को हज करने की इजाजत देने का फैसला किया है।और यह पहली बार है जब देश के बाहर के हज यात्रियों को मक्का आने की अनुमति नहीं होगी। सऊदी अरब ने कहा कि देश में रह रहे विदेशियों को ही हज करने की इजाजत होगी। 70 फीसदी विदेशियों और 30 प्रतिशत सऊदी नागरिकों को हज की अनुमति दी जाएगी। साथ ही सऊदी अरब में रह रहे विदेशी नागरिकों की उम्र 20 से 50 साल के बीच होनी चाहिए और उन्होंने पहले कभी हज नहीं किया हो। उन्हें ही इस साल हज की इजाजत मिलेगी।

जीवन में एक बार हज करना फर्ज 

इस्लाम धर्म यह मानता है कि अल्लाह की रजा लिए हज करना बेहद जरूरी है। जिस प्रकार हर मुसलमान नमाज और रोजे अदा करके अल्लाह के करीब हो जाता है, ठीक इसी प्रकार वह हज करके अल्लाह के करीब हो जाते है। वह गुनाहों से पाक-साफ हो जाते हैं। इसलिए इसे पूरा करके वह मुसलमान होने का फर्ज अदा करता है और अपने जन्म को सफल मानता है। पूरे दुनिया से हज अदा करने के लिए मुसलमान मक्का में एकत्रीत होते हैं। मक्का का मतलब केंद्र। कहते हैं कि मक्का शहर दुनिया के मध्य में स्थित है। यही कारण है कि चारों दिशाओं के मुसलमान ‘हाजिर हूं, मैं हाजिर हूं’ कहते हुए मक्का पहुंचते हैं।

- मुफ्ती जाकिर नूरी, हैदराबाद 

हज करने की नीयत से सवाब 

जीवन में एक बार हज करना फर्ज माना गया है। अगर कोई व्यकिति इस साल हज करने पर नहीं जा पाता है तो वो अगले साल जाने के लिए नीयत कर सकते हैं। अगर अगले साल भी किसी कारण से वह हज पर नहीं जा पाता है और उनकी मौत हो जाती है। तो उनको हज का सवाब मिलेगा। इसलिए हज की नीयत करना भी सवाब का काम है।  

- हाफिज नौमान अहमद सिंपुर, गोड्डा

मुसलमानों के अलग-अलग वर्गों को आपस में जोड़ता है

इस्लाम के पांच बुनियादी स्तंभ हैं, जिसमें सबसे आख़िरी हज माना जाता है। शारीरिक रूप से ठीक और आर्थिक रूप से संपन्न मुसलमान जीवन में कम से एक बार हज करना चाहिए। हज न सिर्फ गुनाहों की माफी का मौका देता है बल्कि मुसलमानों के अलग-अलग वर्गों को आपस में भी जोड़ने का काम करता है। 

- मौलाना जावेद निजामी, हैदराबाद 

इस बार हाजियों को साथ में लाना होगा ये समान

सऊदी अरब की सरकार ने हज यात्रियों के लिए एक दिशा निर्देश जारी कर दिया है। इस बार हाजी को जमजम कुएं का मुकद्दस (पवित्र) पानी ही पीने को मिलेगा और यह भी प्लास्टिक की बोतल में पैक होगा। वहीं शैतान को मरने के लिए जमा की जाने वाली कंकड़ियों को सेनेटाइज किया जाएगा और वक्त से पहले ही इकट्ठा किया जाएगा। इसके अलावा नमाज़ पढ़ने के लिए मुसल्ले (जिसे बिछाकर नमाज़ पढ़ते हैं) भी खुद ही लाने होंगे। 

7वीं शताब्दी से हज पैगंबर मुहम्मद की जिंदगी के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन मुसलमान मानते हैं कि मक्का की तीर्थयात्रा की यह रस्म हजारों सालों से यानि कि अल्लाह के नबी इब्राहीम के ज़माने से चली आ रही है। हर साल दुनियाभर के मुसलमान यहां हज करने के लिए पहुंचते हैं। हज के दौरान पांच तरह की रस्में निभाई जाती हैं। 

इहराम बांधना

हज यात्री पहले दिन सुबह (फज्र) की नमाज पढ़ कर मक्का से 5 किलोमीटर दूर मीना पहुंचते हैं। यहां हाजियों को अहराम पहनना होता है। यह हज या उमराह करने का पहला चरण होता है। इसके तहत एक खास तरह की पोशाक पहनी जाती है। इस पोशाक में दो चादरें होती हैं जो जिस्म से लपेट ली जाती हैं।और फिर इबादत करने की नीयत कर ली जाती है। ऐसा करने के बाद बहुत सी चीज़ों से परहेज़ करना होता है। जैसे बदन के किसी भाग से बाल कटवाना, सुगंध लगान आदि। इसलिए इहराम बांधने से पहले ही अपने जिस्म की पूरी सफाई कर लेनी होती है। इसके बाद कुरआन की खास आयतों को पढ़ते रहना होता है। मीना में हाजी पूरा दिन बिताते हैं, और यहां बाकी की चार नमाजें अदा करते हैं।

अराफात की पहाड़ी पर जाना जरूरी

मीना से लगभग 10 किलोमीटर दूर अराफात की पहाड़ी से पहुंचते हैं। यहां नमाज अदा करते हैं। अराफात की पहाड़ी पर जाना जरूरी है। नहीं तो हज अधूरा माना जाता है।यहां पहुंच जायरीन तिलावत करते हैं। अराफात की पहाड़ी को जबाल अल-रहम भी कहा जाता है। पैगंबर हजरत मुहम्मद ने अपना आखिरी प्रवचन इसी पहाड़ी पर दिया था।सूरज ढलने के बाद हाजी अराफात की पहाड़ी व मीना के बीच स्थित मुजदलफा जाते हैं। यहां हाजी आधी रात तक रहते हैं। साथ ही जायरीन यहां से शैतान को मारने के लिए पत्थर जमा करते चलते हैं। जो शैतान को मारने के लिए होते हैं।

काबा का तवाफ़

इहराम बांधने के बाद काबा पहुंचना होता है। यहां नमाज़ पढ़नी होती है और फिर काबा का तवाफ़ करना होता है। काबा सारे मुसलमानों की एकता का प्रतीक है। काबा ही वो इमारत है, जिसकी तरफ रुख करके दुनियाभर के मुसलमान नमाज़ पढ़ते हैं। 

 सफा और मरवा पर जाना 

सफा और मरवा दो पहाड़ियों के नाम हैं, जिनके बीच चक्कर लगाने होते हैं। और दुआएं पढ़नी होती हैं। इन दोनों पहाड़ियों के बीच सात चक्कर लगाने होते हैं। ये वो जगह है जहां हज़रत इब्राहीम की बीवी अपने बेटे इस्माइल के लिए पानी की तलाश में गई थीं। मक्का से करीब पांच किलोमीटर दूरी पर मीना नाम की जगह है। जहां सारे हाजी जमा होते हैं, और शाम तक नमाज़ें पढ़ते हैं। फिर अगले दिन अराफात नाम की जगह पर पहुंचते हैं और एक बहुत बड़े मैदान में खड़े होकर अल्लाह से दुआ मांगते हैं। 

सफा और मरवा के बाद सिर का बालों का कटवाना होता है। मर्दों को पूरे सर के बाल छोटे कराने होते हैं, जबकि औरतें थोड़े से बाल कटवाती हैं। और ऐसा करना ज़रूरी होता है, नहीं तो हज या उमराह पूरा नहीं होता।

शैतान को पत्थर मारना

इस रस्म को अदा करने के बाद सारे हाजी मीना में लौटते हैं और वहां शैतान को पत्थर मारते हैं। बताया जाता है कि शैतान को दर्शाने के लिए यहां तीन खंभे बने हैं। जिन पर हाजी सात कंकड़ मारते हैं। अरबी में इसे रमीजमारात भी कहा जाता है। कहा जाता है कि यह वह जगह है, जहां शैतान ने हजरत इब्राहीम को बहकाने की कोशिश की। उसने कहा कि हजरत इब्राहीमअल्लाह का आदेश न मानें। बाद में इन पत्थरों या कंकड़ों को फिर से जमा करके रीसाइकल किया जाता है। कोरोना वायरस के कारण इस बार इन पत्थरों को सैनिटाइज किया जाएगा। 

जानवर की कुर्बानी

शैतान को पत्थर मारने के बाद जानवर की कुर्बानी दी जाती है। कहा जाता है कि ऐसा अल्लाह की राह में अपने बेटे इस्माइल को कुर्बान करने की हजरत इब्राहीम की कुर्बानी की याद में किया जाता है। इसके बाद फिर हाजी तवाफ़ की रस्म निभाते हैं। और इसी के साथ हज यात्रा पूरी हो जाती है। तवाफ़ यानी काबे की सात चक्कर (परिक्रमा) लगाई जाती है। इस रस्म के पूरा होते ही हज यात्रा पूरी मान ली जाती है।

मु0. जहांगीर आलम, उप संपादक 

Advertisement
Back to Top