कस्तूरबा के लिए आसान नहीं था महात्मा गांधी की पत्नी होना, जान देकर चुकानी पड़ी थी अहिंसा की कीमत

Know how non-violence of Mahatma Gandhi took away Kasturba's life - Sakshi Samachar

गजब थी कस्तूरबा गांधी की शख्सियत 

कस्तूरबा का संघर्ष गांधीजी से कम नहीं था

हर कदम पर चाहते हुए, न चाहते हुए गांधीजी का साथ दिया 

हम सब भारतीय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ऋणी है जिन्होंने देश को आजाद कराया, इसके लिए लंबी लड़ाई लड़ी और अपने जीवन व परिवार से ज्यादा जिसने देश को समझा। यही सारी बातें ही थी जिन्होंने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा बना दिया।

पर यहां हमें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि महात्मा को महात्मा बनाने में उनकी जीवनसाथी कस्तूरबा का भी बड़ा हाथ था। जीवन के हर मोड़ पर कस्तूरबा ने उनका साथ दिया, उनके साथ खड़ी रही, कई समझौते किये पर साथ नहीं छोड़ा। गांधीजी की जिद को भी कस्तूरबा झेलती रही और अंत में उनकी जान भी एक तरह से गांधीजी की जिद और अहिंसा ने ही ली। 

कुछ ऐसी थी कस्तूरबा की शख्सियत 

कस्तूरबा महात्मा गांधी की पत्नी तो थी पर उनकी अपनी भी एक अलग पहचान थी। वो एक समाज सेविका थीं।13 साल की उम्र में ही कस्तूरबा की शादी महात्मा गांधी से करा दी गई पर उनके गंभीर और स्थ‍िर स्वभाव के चलते उन्हें सभी 'बा' कहकर पुकारने लगे। हम यह तो जानते हैं कि गांधीजी ने गरीब और पिछड़े वर्ग के लिए काम किया पर क्या आप ये जानते हैं कि दक्ष‍िण अफ्रीका में अमानवीय हालात में भारतीयों को काम कराने के विरुद्ध आवाज उठाने वाली कस्तूरबा ही थीं।

सर्वप्रथम कस्तूरबा ने ही इस बात को प्रकाश में रखा और उनके लिए लड़ते हुए कस्तूरबा को तीन महीने के लिए जेल भी जाना पड़ा। जिस महात्मा गांधी से अंग्रेज डरते थे, वो खुद कस्तूरबा गांधी से ऊंची आवाज में बात नहीं कर सकते थे। कस्तूरबा कड़क स्वभाव की थीं और अनुशासन बहुत प्र‍िय था उन्हें।

साल 1922 में स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते हुए महात्मा गांधी जब जेल चले गए तब स्वाधीनता संग्राम में महिलाओं को शामिल करने और उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए कस्तूरबा ने आंदोलन चलाया और उसमें कामयाब भी रहीं। 1915 में कस्तूरबा जब महात्मा गांधी के साथ भारत लौटी तो साबरमती आश्रम में लोगों की मदद करने लगीं। आश्रम में सभी उन्हें 'बा' कहकर बुलाने लगे। दरअसल, 'बा' मां को कहते हैं।

कस्तूरबा ने जब पहली बार साल 1888 में बेटे को जन्म दिया तब महात्मा गांधी देश में नहीं थे। वो इंग्लैंड में पढ़ाई कर रहे थे। कस्तूरबा ने अकेले ही अपने बेटे हीरालाल को पाल-पोस कर बड़ा किया।

कस्तूरबा का जन्म और जीवन 

11 अप्रैल 1869 को पैदा हुई कस्तूरबा गांधी  की मृत्यु 22 फरवरी 1944 हुई थी। 14 साल की कस्तूर कपाड़िया की शादी 13 साल के मोहन से हुई थी। मोहन दास बैरिस्टर बने, विलायत गए। किसी आम पत्नी की तरह कस्तूर भी खुश हुई होंगी पर मोहन धीरे-धीरे गांधी बन गए। वो कस्तूर से कस्तूर बाई और फिर कस्तूरबा बन गईं।
 फिर गांधी महात्मा, बापू और गांधी बाबा बन गए। इसके साथ इन चीजों को निभाने की उनकी जिद भी बढ़ती गई। ये उनकी मजबूरियां भी हो सकती थीं। इन सबके बीच बा चुपचाप गांधी के साथ बनी रहीं।


 
कस्तूरबा और गांधी की शादीशुदा ज़िंदगी में ऐसे कई मौके आए जब महात्मा गांधी तो जीत गए मगर पति गांधी अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी नहीं कर पाए। पर कस्तूरबा अपने सारे फर्ज निभाते हुए आगे बढ़ती रही। 

पति और बेटे के बीच पिसती रही बा 

गांधीजी के बड़े बेटे हरिलाल ने बचपन में गांधी का अमीरी वाला दौर देखा था मगर कुछ ही सालों में गांधी सत्याग्रह के रास्ते पर चल पड़े। हरिलाल का स्कूल छुड़वाकर उन्हें घर पर ही पढ़ाया जाने लगा।
 हरिलाल को ब्रिटेन जाकर पढ़ने के लिए स्कॉलरशिप मिली तो गांधी ने मना कर दिया। कहा गांधी के लड़के की जगह किसी ज़रूरतमंद को मिले ये जगह। 
इसके अलावा एक और बात हुई थी। बा अफ्रीका में रहना चाहती थीं और गांधी भारत आना चाहते थे। ज़ाहिर है कि गांधी की ही चली और बा को मन मारना पड़ा। इन दो घटनाओं के बाद हरिलाल और गांधी के बीच की दूरी बढ़ती चली गई, जो कभी खत्म नहीं हुई। कस्तूरबा इसके बीच में पिसती रहीं। इसके चलते उनका बेटा उनसे हमेशा के लिए दूर हो गया।

यूं गांधीजी की अहिंसा ने ही ली कस्तूरबा की जान 

यह उस समय की बात है जब भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था। उसी दौरान गिरफ्तार हुए महादेव देसाई की 15 अगस्त 1942 को दिल के दौरे से आगा खां महल में मौत हो गई। बा को इससे बड़ा सदमा पहुंचा। वो देसाई की समाधि पर रोज़ जाकर दिया जलाती थीं। कहती रहतीं, “जाना तो मुझे था महादेव कैसे चला गया”।
 कस्तूरबा को ब्रॉन्काइटिस की शिकायत थी। फिर उन्हें दो दिल के दौरे पड़े और इसके बाद निमोनिया हो गया। इन तीन बीमारियों के चलते बा की हालत बहुत खराब हो गई।

डॉक्टर चाहते थे बा को पेंसिलिन का इंजेक्शन दिया जाए। गांधी इसके खिलाफ थे। गांधी इलाज के इस तरीके को हिंसा मानते थे और प्राकृतिक तरीकों पर ही भरोसा करते थे।
 बा ने कहा कि अगर बापू कह दें तो वो इंजेक्शन ले लेंगी। गांधी ने कहा कि वो नहीं कहेंगे, अगर बा चाहें तो अपनी मर्ज़ी से इलाज ले सकती हैं।
 गांधी के बेटे देवदास गांधी भी इलाज के पक्ष में थे वो पेंसिलिन का इंजेक्शन लेकर भी आए। तब बा बेहोश थीं और गांधी ने उनकी मर्ज़ी के बिना इंजेक्शन लगाने से मना कर दिया। एक समय के बाद गांधी ने सारी चीज़ें ऊपरवाले पर छोड़ दीं। 22 फरवरी 1944 को महाशिवरात्रि के दिन कस्तूरबा गांधी इस दुनिया से चली गईं।

तो इस तरह कस्तूरबा की जान बापू की अहिंसा ने ली। वहीं बा के लिए भी आसान नहीं था महात्मा की पत्नी होना, उन्हें हर मोड़ पर समझौते करने पड़े यहां तक कि अपना बड़ा बेटा भी खोना पड़ा गांधीजी का साथ देने के लिए। पर वे अपने अंत समय तक बनी रही गांधीजी के साथ। उनका संघर्ष और त्याग भी गांधीजी से कम नहीं था। 

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