हैदराबाद कैसे बना ओवैसी का गढ़, साल दर साल ऐसे बनाई जनता में पैठ

Know How hyderabad Became den of AIMIM Chief Asaduddin Owaisi Politics - Sakshi Samachar

1994 में हुई पॉलिटकल एंट्री

2004 में पहली बार पहुंचे लोकसभा

राष्ट्रवाद के साथ इस्लामवाद के विचारक

2009 में ओवैसी के खिलाफ मुकदमा दर्ज

हैदराबाद : असदुद्दीन ओवैसी भारत के उन गिने-चुने कद्दावर नेताओं में शुमार हैं जो अपने बयानों व विवादों के चलते हमेशा सुर्खियों में रहते हैं। 13 मई 1969 को हैदराबाद में जन्मे असदुद्दीन ओवैसी 2008 से ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM)के अध्यक्ष हैं। वह पेशे से एक बैरिस्टर हैं और लंदन से उन्होंने अपनी डिग्री हासिल की। अब जबकि वो एक बैरिस्टर हैं तो बोलने का हुनर तो उनमें होगा ही, लेकिन किसी भी मुद्दे पर बेबाकी से बोलना ये हर इंसान के बस की बात नहीं…शायद अल्लाह हर किसी को हर चीज़ से नहीं नवाज़ता। असदुद्दीन ओवैसी का बेबाकी से जवाब देना ही उनकी पहचान है जो उनको भीड़ में भी जुदा बनाती है। आज जब उनका जन्मदिन है तो उनके राजनीतिक सफर के बारे में बात करना जरूरी है। 

1994 में हुई पॉलिटकल एंट्री

वर्ष 1994 में पहली बार राजनीति में कदम रखने वाले असदुद्दीन ओवैसी ने कभी पीछे मुडकर नहीं देखा। 1994 में उन्होंने चारमीनार विधानसभा सीट (जो 1967 से एमआईएम की गढ़ है) से चुनाव जीता। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी मजलिस बचाओ तहरीक के उम्मीदवार को करीब 40 हजार वोट से हराया। 1999 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने इसी सीट से तेलुगु देशम पार्टी के सैयद शाह नूर हक खादरी को करीब 90 हजार वोट से हराया। 

2004 में पहली बार पहुंचे लोकसभा

वर्ष 2004 में पहली बार हैदराबाद लोकसभा सीट से चुनाव जीतने वाले ओवैसी उसके बाद हुए सभी लोकसभा चुनाव में हैदराबाद सीट पर लगातार जीत के साथ बहुमत का अंतर बढ़ाते आ रहे हैं। हैदराबाद लोकसभा सीट से असदुद्दीन ओवैसी 2004, 2009, 2014 और 2019 के (चार बार) चुनाव जीत चुके हैं, जबकि इसी सीट से लगातार 6 बार चुनाव जीतने का रिकार्ड उनके पिता सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी के नाम दर्ज है। असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी की राजनीति अल्पसंख्यकों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ओवैसी उस वक्त सुर्खियों व विवादों में आए जब उन्होंने अल्पसंख्यक (मुसलमानों) पर राजनीति करनी शुरू की है। 

वर्ष 2004 में जब सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी ने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए लोकसभा चुनाव लड़ने से मना कर दिया, तो उनकी जगह असदुद्दीन ओवैसी पहली बार लोकसभा चुनाव लड़े और भाजपा के उम्मीदवार जी. सुभाष चंद्रजी को करीब 1,00,145 वोट से हराकर लोकसभा पहुंचे।
ओवैसी ने 2009 के लोकसभा चुनाव में तेलुगु देशम पार्टी के उम्मीदवार जाहिद अली खान को 1,31,865 वोट से हराया, जबकि 2014 के चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार डॉ. भगवंत राव को 2,00,254 वोट से हराया। इसी तरह, पिछले साल यानी 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में ओवैसी ने एक बार भाजपा के उम्मीदवार डॉ. भगवंत राव को करीब 2,82 हजार वोट से हराया।

जनता में ऐसे बनाई पैठ

 इन सब आकंड़ों को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि हैदराबाद पर ओवैसी की पकड़ दिनों-दिन मजबूत होती जा रही है और हर चुनाव में जीत का अंतर बढ़ता जा रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने महाराष्ट्र के औरंगाबाद लोकसभा सीट से चुनाव जीता है। वर्ष 1984 से 2019 तक एमआईएम का केवल एक ही सांसद था, लेकिन 2019 में पहली बार उसके दो सांसद संसद पहुंचे।

इस तरह, धीरे-धीरे हैदराबाद लोकसभा सीट और उसके अंतर्गत आने वाले सात विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम वोटरों की संख्या तेजी से बढ़ती गई। यही वजह है कि आज हैदराबाद एआईएमआईएम का गढ़ बन गया है। पिछले तीन-चार चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालेंगे तो पता चलेगा कि ओवैसी हैदराबाद में किस तरह अपनी पार्टी को बढ़ा रहे हैं। 

पिछले तीन चुनाव में हैदराबाद लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाले विधानसभा सीटों चारमीनार, डबीरपुरा, मलकपेट, आसिफनगर, चंद्रायणगुट्टा, कारवान, नामपल्ली में एमआईएम के विधायक हैं। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हैदराबाद लोकसभा सीट से असदुद्दीन ओवैसी को हराना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन हैं। इसकी मुख्य वजह यहां 50 फीसदी से अधिक वोटर मुस्लिम हैं और इसे आमतौर पर एमआईएम का वोट बैंक माना जाता है। पिछले 10 से 15 वर्षों में हैदराबाद के पुराने शहर में एमआईएम का ग्राफ तेजी से बढ़ा है।

इस कार्यकाल के दौरान वे स्‍थानीय क्षेत्र विकास और सामाजिक न्‍याय और अधिकार तथा रक्षा समितियों के सदस्‍य रहे। 2009 लोकसभा चुनाव में वे दोबारा निर्वाचित हुए और रक्षा समिति एवं आचारनीति समिति के सदस्‍य बनाए गए। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भी वे हैदराबाद निर्वाचित हुए। उनका राष्ट्रवाद के साथ इस्लामवाद का विचार हैदराबाद के साथ-साथ देश के अन्य भागों में भी काफी लोकप्रिय हो रहा है।

ओवैसी सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में पिछड़े मुसलमानों के लिए आरक्षण का समर्थन करते हैं। वह यह भी कहते हैं कि वह हिंदुत्ववादी विचारधारा के खिलाफ हैं, लेकिन हिंदुओं के खिलाफ नहीं हैं। 2008 के मुंबई के हमलों के बाद, ओवैसी ने निर्दोष लोगों की हत्या के लिए जकीउर रहमान लखवी और हाफिज सईद के खिलाफ कार्रवाई की मांग की उन्होंने कहा कि देश के दुश्मन मुसलमानों के दुश्मन हैं।

2009 में ओवैसी के खिलाफ मुकदमा दर्ज
असदुद्दीन ओवैसी अक्सर अपने भाषणों के चलते विवादों में घिरते चले आएं हैं। वर्ष 2009 में, मुगलपुरा इलाके की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के एक मतदान एजेंट सैयद सलीमुद्दीन का पीछा करने और उसे मारने के लिए भारत के निर्वाचन आयोग ने ओवैसी के खिलाफ एक मुकदमा दर्ज किया था। 2016 के एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने ये बयान दिया था कि वो किसी भी सूरत में भारत माता की जय नहीं कहेंगे। इसके बाद उनकी बहुत आलोचना हुई थी।
 

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