भारत का वो बादशाह जिसने मुगलों को भागने के लिए कर दिया था मजबूर, जानें शेरशाह से जुड़ी दिलचस्प बातें

Know About Sher Shah Suri Interesting Facts On His Death Anniversary - Sakshi Samachar

ऐसे बिहार का गवर्नर बना शेर खान 

दिल्ली में सूर वंश की स्थापना

वास्तुकला में भी थे माहिर शेरशाह

भारतीय इतिहास में कई ऐसे मुसलमान शासक हुए हैं जिनके खिलाफ आज भी आवाज उठती रहती है। जिस अकबर को इतिहासकारों ने महान कहा है, उसे भी आज के दौर में अपमानित किया जाता है। टीपू सुल्तान के नाम पर हमेशा बवाल मचता है। लोग उसको इतिहास का पात्र मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं। ऐसा लगता है कि टीपू सुल्तान आज भी लोगों के बीच मौजूद है। इन सबके बीच एक ऐसा भी मुसलमान राजा है, जिसके नाम पर कभी बवाल नहीं मचा। उस राजा की आज बरसी है। उस राजा का नाम शेरशाह सूरी था। शेरशाह मात्र पांच साल तक ही राज कर पाया था। 

शेरशाह का जन्म 1486 के आस-पास बिहार में हुआ था। हालांकि इतिहाकारों के बीच उसके जन्म वर्ष और जगह दोनों को लेकर मतभेद है। बताया जाता है कि शेरशाह का जन्म हिसार (हरियाणा) में हुआ था। खैर अभी इसपर बहस नहीं करना है। शेरशाह का बचपन का नाम फरीद खान था। उनके पिताजी का नाम हसन खान था। हसन खान बहलोल लोदी के यहां काम करते थे। शेरशाह के दादा इब्राहिम खान सूरी नारनौल के जागीरदार हुआ करते थे। नारनौल में इब्राहिम का स्मारक भी बना है। ये लोग पश्तून अफगानी माने जाते थे। सूरी टाइटल इनके अपने समुदाय सुर से लिया गया था।

इस तरह फरीद बन गया ‘शेर खां‘

शेरशाह युवावस्था में अमीर बहार खान लोहानी की सेवा में रहा करते थे। कहा जाता है कि एक बार बहार खान ने उसे एक शेर का शिकार करने को कहा, जिसे पूरा करने कि लिए फरीद ने एक पल भी नहीं सोचा और शेर से लड़ते हुए उसके जबड़े को दो हिस्सों में फाड़कर अलग कर दिया था। उनकी इस वीरता से बहार खान बहुत प्रभावित हुआ और उसने फरीद को शेर खां की उपाधि से सम्मानित किया। जहां शेर मारा था, उस जगह का नाम शेरघाटी पड़ गया। 

ऐसे बिहार का गवर्नर बना शेर खान 

शेर खान के 8 भाई थे। सौतली मांएं भी थीं। शेर खान की घर में बनी नहीं, क्योंकि वो महत्वाकांक्षी था। वो घर छोड़कर जौनपुर के गवर्नर जमाल खान की सर्विस में चला गया। वहां से फिर वो बिहार के गवर्नर बहार खान लोहानी के यहां चला गया। यहां पर शेर खान की ताकत और बुद्धि को पहचाना गया। बहार खान से अनबन होने पर शेर खान ने बाबर की सेना में काम करना शुरू कर दिया। वहीं पर उसने नई तकनीक सीखी थी जिसके दम पर बाबर ने 1526 में बहलोल लोदी के बेटे इब्राहिम लोदी और बाद में राणा सांगा को हराया था। यहां से निकलकर फिर वो बिहार का गवर्नर बन गया।  

दिल्ली में सूर वंश की स्थापना

 शेर खान ने जब बिहार की कमान संभाली तो कोई भी बिहार को पावर सेंटर मानने को तैयार नहीं था। शेर खान ने अपनी ताकत बढ़ानी शुरू कर दी। अपनी सेना तैयार करने लगा। बाबर की मौत के बाद हुमायूं बादशाह बना। जब हुमायूं बंगाल रवाना हुआ तो शेर खान ने उससे लड़ने का मन बना लिया। 1539 में बक्सर के पास चौसा में दोनों की भिड़ंत हुई। हुमायूं को जान बचा के भागना पड़ा। 1540 में फिर दोनों की भिड़ंत कन्नौज में हुई।  वहां भी हुमायूं को हारना पड़ा. बंगाल, बिहार और पंजाब तीनों छोड़ के हुमायूं देश से ही भाग गया। शेर खान ने दिल्ली में सूर वंश की स्थापना कर दी। धीरे-धीरे उसने मालवा, मुल्तान, सिंध, मारवाड़ और मेवाड़ भी जीत लिया। उन्होंनेअपना नाम शेरशाह रख लिया।

वास्तुकला में भी थे माहिर शेरशाह

कहा जाता है कि शेरशाह सूरी सिर्फ एक अच्छे योद्धा ही नहीं, बल्कि एक अच्छे वास्तुकार भी थे। अपने जीवनकाल में उन्होंने कई बार वास्तुकला का काम किया, पर झेलम में बने उनके रोहतास किले को उनके द्वारा की गयी सबसे अच्छी कारीगरी कहा जाता है। शेरशाह को इस किले को बनने में करीब आठ साल का वक्त लगा। दिल्ली में स्थित पुराना किला का नए तरीके से निर्माण करने में भी शेरशाह का हाथ था। 

शेरशाह ने पहली बार पोस्टल विभाग की नींव डाली

इतिहासकारों की मानें तो ‘रुपया’ का चलन शेरशाह सूरी ने ही शुरु किया था। जिस समय वह सत्ता में आए उस वक्त ‘टनका’ नाम की मुद्रा का चलन था। सोने व चांदी के सिक्कों का चलन शुरू करने के साथ शेरशाह सूरी ने पोस्टल विभाग की स्थापना की। 

शेरशाह ने ग्रैंड ट्रंक रोड’ का निर्माण कराया 

शेरशाह ने अपने शासनकाल में विशाल ग्रैंड ट्रंक रोड रोड का निर्माण करवाया था, जिसका आज तक उदाहरण दिया जाता है। शेरशाह चाहते थे कि एक ऐसा रास्ता बने, जो दक्षिणी भारत को उत्तर के राज्यों से जोड़ सके। उनकी यह रोड बांग्लादेश से होती हुई दिल्ली और वहां से काबुल तक होकर जाती थी। रोड का सफर आरामदायक बनाने के लिए शेरशाह ने जगह-जगह पर कुंए और विश्रामगृहों का निर्माण भी करवाया था। यह रोड आज भी है। 

शेरशाह से जुड़ी मशहूर बातें..... 

 - शेरशाह ने अपना प्रशासन हाई लेवल का रखा था. उसके रेवेन्यू मिनिस्टर टोडरमल को बाद में अकबर ने भी नियुक्त किया था। वो अकबर को नवरत्नों में से एक थे। 

शेरशाह ने खावस खान को अपना कमांडर बनाया था। कहा जाता है कि खान बेहद गरीब व्यक्ति था। वो जंगल में लोमड़ियों का शिकार करता था, पर शेरशाह ने उसकी प्रतिभा को पहचाना और अपना कमांडर बना लिया था। 

- शेरशाह राज करने के मामले में अकबर से भी आगे थे। क्योंकि अकबर के चलते मुस्लिम नाराज थे क्योंकि वो हिंदुओं को प्रश्रय देता था।औरंगजेब के चलते हिंदू-मुस्लिम दोनों परेशान थे। पर शेरशाह ने सबको साध के रखा था। उसकी महत्वाकांक्षा सबसे अलग थी। 

- अकबर के एक अफसर ने लिखा था कि शेरशाह के राज में कोई सोने से भरा थैला लेकर रेगिस्तान में भी सो जाए तो चोरी-छिनैती नहीं होती थी। 

अकबर को शेरशाह का बनाया राज्य मिला था। शेरशाह की असमय मौत नहीं हुई होती तो कुछ और ही इतिहास देखने को मिलता। 1545 में कालिंजर फतह के दौरान शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गई थी। नवंबर 1544 में शेरशाह ने कालिंजर पर घेरा डाला था। महीनों तक घेराबंदी लगी रही। कालिंजर का किला बहुत मजबूत था। अंत में शेरशाह ने गोला-बारूद के प्रयोग का आदेश दिया। वो खुद भी तोप चलाता था। कहते हैं कि एक गोला किले की दीवार से टकराकर इसके खेमे में विस्फोट कर गया। जिसकी वजह से उसकी मौत हो गई। इस तरह  शेरशाह सूरी ने 22 मई, 1545 को ये दुनिया छोड़ दी। शेरशाह का मकबरा बिहार के सासाराम में स्थित है। 

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